आंचलिक कहानियों के कालजयी कथाशिल्पी—फणीश्वर नाथ रेणु

15-06-2026

आंचलिक कहानियों के कालजयी कथाशिल्पी—फणीश्वर नाथ रेणु

सुरेश बाबू मिश्रा (अंक: 299, जून द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

 

फणीश्वर नाथ रेणु जिनकी कहानी , ‘मारे गए गुलफ़ाम’ पर बनी सुपरहिट फ़िल्म-तीसरी क़सम

 

हिन्दी साहित्य की कहानी यात्रा फणीश्वर नाथ रेणु का उल्लेख किए बिना पूरी नहीं होती। उन्हें आंचलिक कहानियों का बेजोड़ कथाकार माना जाता है। वे ऐसे गौरवशाली कहानीकार हैं जिन्हें कहानी के क्षेत्र में दिए गए उल्लेखनीय योगदान के लिए देश के अति प्रतिष्ठित सम्मान पद्म-श्री सम्मान से सम्मानित किया गया।

धुर ग्रामीण अंचल से निकल कर उनकी कहानियों की धूम सिनेमा जगत तक जा पहुँची। उनकी कहानी, ‘मारे गए गुल्फाम‘ पर फ़िल्म ‘तीसरी क़सम’ बनी। इस फ़िल्म के गाने बहुत लोकप्रिय हुए। इस फ़िल्म से फणीश्वर नाथ रेणु की लोकप्रियता पूरे देश में फैल गई।

फणीश्वर नाथ रेेणु का जन्म 4 मार्च सन् 1921 को बिहार के अररिया ज़िले में हिंगना गाँव में हुआ था। उस समय उनका गाँव पूर्णिया ज़िले में आता था। उनकी विद्यालयी शिक्षा नेपाल में हुई। बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी से उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की। उस बनारस विश्वविद्यालय स्वतन्त्रता आन्दोलन एक बहुत बड़ा केन्द्र था।

सन् 1942 में महात्मा गाँधी के आवाहन पर देश की आज़ादी के लिए चलाए जा रहे स्वतन्त्रता आन्दोलन में कूद पड़े। अँग्रेज़ों भारत छोड़ो आन्दालन में उन्होंने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। वे ग्रामीण क्षेत्र से आते थे इसलिए गाँवों की भोली-भाली जनता पर होने वाले अंग्रेज़ी शासकों के अत्याचारों को उन्होंने अपनी आँखों से देखा था।

उन्होंने अँग्रेज़ शासकों के अत्याचारों का विरोध करने और लोगों में स्वतन्त्रता आन्दोलन की अलख जगाने के लिए अपनी क़लम के अपना हथियार बनाया। ग्रामीण अंचल में रहने वाली जनता की समस्याओं को उन्होंने अपनी कहानियों के माध्यम से उकेरना प्रारम्भ किया। ठेठ ग्रामीण परिवेश और आंचलिक भाषा शैली में लिखी गई उनकी कहानियाँ पाठकों के मध्य बहुत लोकप्रिय हुईं।

इस प्रकार वह आंचलिक कहानियों के मुख्य सूत्रधार बने। उनमें क़िस्सागोई की क्षमता थी, इसलिए उनकी कहानियाँ पाठकों को अन्त तक बाँधे रखती हैं। उनकी कहानियों में हमें ग्रामीण परिवेश एवं आंचलिक संस्कृति की झलक स्पष्ट रूप से देखने को मिलती है। मुंशी प्रेमचन्द के बाद कहानी को ग्रामीण स्वर देने वाले वे दूसरे कहानीकार हैं।

उनकी पहली कहानी, ‘वट बाबा’ सन् 1944 में कोलकता के प्रमुख साहित्यिक समाचार पत्र ‘विश्वामित्र’ में प्रकाशित हुई। ‘विश्वामित्र’ बंगाल का एक प्रमुख साप्ताहिक समाचार पत्र था। इसमें नवोदित एवं स्थापित दोनों प्रकार के साहित्यकारों की रचनाएँ प्रकाशित हुआ करती थीं। रेणु जी की प्रारम्भिक दौर की दस कहानियाँ ‘विश्वामित्र’ में ही प्रकाशित हुई। इस साप्ताहिक समाचार पत्र ने उन्हें साहित्य जगत में आंचलिक कहानीकार के रूप में स्थापित करने में बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

बाद में उनकी कहानियाँ देश के उस समय की प्रमुख पत्रिकाओं एवं साप्ताहिक समाचार पत्रों में प्रकाशित होने लगीं। उनकी पाँच कहानियाँ ‘धर्मयुग’ में तथा चार कहानियाँ उस समय की प्रमुख साहित्यिक पत्रिका ‘सारिका’ में प्रकाशित हुईं। ‘माया’ पत्रिका में उनकी कहानी ‘आत्मसाक्षी’ प्रकाशित हुई। अब उनकी ख्याति एक आंचलिक कहानीकार के रूप में पूरे देश में फैल गई।

सन् 1959 में उनका पहला कहानी संग्रह, ‘ठुमरी’ प्रकाशित हुआ। इस संग्रह में कुल नौ कहानियाँ थीं। इन कहानियों के नाम हैं, ‘रसप्रिया’, ‘मारे गए गुलफ़ाम’, ‘लाल पान की बेगम’, ‘पंचलाइट’, ‘सिर पंचमी का सगुन’, ‘तीर्थोदक’, ‘तीन बिंदियाँ’, ‘ठेस’ और ‘नित्य लीला’ इस संग्रह की कहानियाँ बहुत लोकप्रिय हुईं—सन् 1955 से 1959 तक उनकी कहानियों का एक सुनहरा दौर रहा।

सन् 1954 में उनका उपन्यास ‘मैला आंचल’ प्रकाशित हुआ। रेणु आम आदमी की कठिनाइयों और पीड़ा को भली-भाँति जानते थे। पूरी तरह से ग्रामीण परिवेश और आम आदमी को केन्द्र बनाकर लिखा गया, उनका यह उपन्यास पाठकों के अन्तर्मन को गहराई से छू गया और वह बहुत लोकप्रिय हुआ। ‘मैला आंचल’ हिन्दी साहित्य की अनमोल धरोहर है। इसने आंचलिक उपन्यास के रूप में बहुत ख्याति अर्जित की।

फ़िल्म निर्माता एवं निर्देशक वसु भट्टाचार्य ने उनकी कहानी ‘मारे गए गुलफ़ाम’ पर ‘तीसरी क़सम’ फ़िल्म बनाई। इस फ़िल्म के नायक राजकपूर एवं नायिका वहीदा रहमान थीं। इस फ़िल्म के गीतों ने पूरे में धूम मचा दी। यह फ़िल्म सिनेमा जगत की एक यादगार फ़िल्म मानी जाती है। इस फ़िल्म ने रातों-रात फणीश्वर नाथ रेणु को बुलन्दी की ऊँचाइयों तक पहुँचा दिया।

रेणु जी का दूसरा कहानी संग्रह सन् 1966 में प्रकाशित हुआ। इस कहानी संग्रह का नाम था, ‘आदिम रात्रि की महक’ इस कहानी संग्रह में ग्यारह कहानियाँ थीं। इस संग्रह में ‘सांवरिया’, ‘आदिम रात्रि की महक’, ‘आत्मसाक्षी’, ‘जलवा’ जैसी उनकी प्रतिनिधि कहानियाँ सम्मिलित थीं। यह कहानी संग्रह भी बहुत लोकप्रिय हुआ।

रेणु जी की अन्तिम कहानी ‘अग्निखोर’ सन् 1972 में नई दिल्ली से प्रकाशित होने वाले ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान, के नवम्बर माह के प्रथम अंक में प्रकाशित हुई। इस प्रकार रेणु जी की सन् 1944 में प्रारम्भ हुई साहित्य यात्रा का सन् 1972 में समापन हुआ। 28 वर्ष की अपनी साहित्य यात्रा के दौरान उन्होंने कुल 63 बाल कहानियाँ लिखीं।

रेणु जी ने संस्मरण, उपन्यास रेखाचित्र और रिपोर्ताज भी लिखे, मगर उन्हें ख्याति एक आंचलिक कहानीकार के रूप में ही मिली। उनकी कहानी ‘परती परिकथा’, ‘पलटू बाबू रोड’, ‘पंचलाइट’, ‘जुलूस’, ‘दीर्घ तपा’, ‘मारे गए गुलफ़ाम’, ‘पहलवान की ढोलक’ आदि पाठकों द्वारा बहुत सराही गईं।

आम आदमी को केन्द्र में रखकर ग्रामीण परिवेश के ताने-बाने पर गढ़ी हुई उनकी कहानियाँ बुनावट, कसावट एवं कथ्य की दृष्टि से उत्कृष्ट हैं। उनकी सभी कहानियाँ पाठकों के मध्य ख़ासी लोकप्रिय हुईं क्योंकि वे आम आदमी के मर्म को छूती हैं। उनकी कहानियों के पात्र समाज के सामान्य लोग हैं जिससे पाठक उनके पात्रों में अपना अक्स देखता है।

रेणु जी ने अपनी कहानियों में गाँवों के लोगों की पीड़ाओं, समस्याओं एवं उनके मनोभावों को बख़ूबी बयान किया है। उनकी कहानियों में आंचलिक संस्कृति एवं ग्रामीण परिवेश की झलक स्पष्ट रूप से देखने को मिलती है। कटिहार रेलवे स्टेशन उनकी कहानियों का मुख्य लोकेशन हुआ करता था। उनकी कहानियाँ मानवीय संवेदनाओं से ओत-प्रोत। अपनी इन्हीं ख़ूबियों के कारण रेणु जी आंचलिक कहानियों के बेजोड़ कथाशिल्पी माने जाते हैं। उनकी कहानियाँ हिन्दी साहित्य की अनमोल धरोहर हैं।

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