पूर्व और पश्चिम का सांस्कृतिक सेतु ‘जगन्नाथ-पुरी’: यात्रा-संस्मरण - 5

01-01-2020

पूर्व और पश्चिम का सांस्कृतिक सेतु ‘जगन्नाथ-पुरी’: यात्रा-संस्मरण - 5

दिनेश कुमार माली

भुवनेश्वर के सैंडी टॉवर होटल में दूसरे दिन विमला दीदी के देवर की बेटी की शादी राजस्थानी और ओड़िया संस्कृतियों का सेतु बन रही थी, वहीं विमला दीदी का कला-बोध उत्कल संस्कृति को नज़दीक से जानने का प्रयास कर रहा था और हम बन रहे थे उनके इस पुनीत कार्य में निमित्त-मात्र। आज के दिन हमारे साथ न तो सरोजिनी भाभी जी थी और न ही बेहेरा साहब। बेहेरा साहब थे तो सही, मगर शादी की रस्मों के समय मात्र एकाध घंटे के लिए नज़र आए। अब मेरे पास और कोई साधन नहीं बचा था, सिवाय नालकों के राजभाषा अधिकारी हरिराम पंसारी जी को इस बचे हुए सफ़र में साथ देने और साथ-साथ भुवनेश्वर के इर्द-गिर्द ऐतिहासिक धरोहरों और धार्मिक मंदिरों की व्याख्या करने के लिए आमंत्रित करने का। 

हरिराम पंसारी जी ने मेरी बात को माना तो ज़रूर, मगर ज़्यादा साथ देने में असामर्थ्य जताया अपनी पारिवारिक समस्याओं के चलते। कम ही सही, मगर जितना भी उनका साथ मिला, अपने आप में किसी प्रोफ़ेशनल टूरिस्ट गाइड से कम नहीं था। चूँकि उनका बचपन भुवनेश्वर में ही बीता था और हिंदू धर्म में अगाध-आस्था, विश्वास और अनुराग के कारण धार्मिक-स्थलों की विशेष जानकारी थी। विमला दीदी ने कार के अंदर ही अपने मोबाइल पर उनकी आवाज़ रिकॉर्ड करनी शुरू की, ताकि संस्मरण लिखते समय पाठकों को आधिकारिक जानकारी दी जा सके और साथ ही साथ, लोक-कथाओं और किंवदंतियों का अर्काइव भी तैयार हो जाए।

सबसे पहले वे हमें मुक्तेश्वर मंदिर की तरफ़ ले गये। 10वीं सदी का शिव मंदिर। वास्तुकला के आधार पर बना हुआ यह ख़ूबसूरत मंदिर आज जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है। मंदिर की दीवारों पर पंचतंत्र की कहानियों में ‘बंदर और मगरमच्छ’ की कहानी पंसारी जी ने हमें दिखाई और एक गौतम बुद्ध की। शायद उस समय हिन्दु और बुद्ध धर्म में समन्वय होना शुरू हो गया, तभी तो शिव मंदिर में बुद्ध की प्रतिमा स्थापित की गई होगी। वहाँ चार कुंड भी थे, जैसे किसी वाटर फिल्टर प्लांट में बनाए जाते है। जल-शुद्धीकरण के लिए यह सब किया गया होगा। एक जगह कुंड में गंदेला पानी दिख रहा था, पंसारी जी के अनुसार जिसे पीने से पेट की व्याधियाँ दूर हो जाती है क्योंकि वह मैग्नीशियम और कैल्शियम क्लोराइड की चट्टानों से गुज़र कर आता है। चौथे साफ़ कुंड के पानी से मंदिर की रसोई तैयार होती है, दूसरे कुंड में बिना साबुन लगाए नहाया जा सकता है। मंदिर की स्थापत्य-कला ज़्यादा मेरे समझ में नहीं आ रही थी, जैसे-जैसे पंसारी जी बता रहे थे, उन्हें सच मानूँ या झूठ, यह तो अभी भी नहीं कह सकता। मगर मुक्तेश्वर का ऐतिहासिक मंदिर मेरे मन के कोने में बस गया था। आठ सौ-नौ सौ साल पुराने दीर्घ धार्मिक विप्लवों को अपने भीतर अक्षुण्ण रखने के कारण। 

शायद वहाँ जाने से कोई भी व्यक्ति मुक्त चिंता धारा से सोच सकता है, तभी तो मंदिर का नाम पड़ा होगा-मुक्तेश्वर। यह भी हो सकता है कि धार्मिक श्रद्धालुओं की राय में, कि उनके दर्शन मात्र से मोक्ष मिलता हो, मगर कभी भी मेरी चेतना ने मोक्ष वाले कंसेप्ट को स्वीकार नहीं किया। हो सकता है, मेरे भीतर अभी ऊर्ध्वगामी चेतना के बीज अंकुरित नहीं हो पा रहे होंगे।

मुक्तेश्वर मंदिर में दर्शन करवाने के बाद पंसारी जी अपने घर की ओर रवाना हो जाते हैं और हम लिंगराज मंदिर की ओर। यह वह मंदिर है, जिसके आधार पर भुवनेश्वर का नाम पड़ा है। पहले इस मंदिर को त्रिभुवनेश्वर कहा जाता था, फिर ‘त्रि‘ हट जाने से बचा रह गया भुवनेश्वर। लिंगराज मंदिर के अंदर प्रसाद लेकर जाते समय दीदी की इच्छा हुई कि किसी पंडे से भी इस मंदिर के बारे में भी ऐतिहासिक/धार्मिक जानकारी प्राप्त कर ली जाए। सोचने में देर नहीं थी कि सामने जनेऊ धारी एक पंडा खड़ा हो गया, केवल धोती पहना हुआ था और नंगे बदन से पसीना निकल रहा था। कहने लगा, "आप लोग मंदिर का दर्शन करेंगे? चलिए, मंदिर के बारे में बता भी दूँगा और अच्छी पूजा भी करवा दूँगा।"

 दीदी ने अपने पति जगदीश जी की ओर देखा और आँखों ही आँखों में सहमति का इशारा पाकर कहने लगी। "ठीक है चलो।"

वह पंडित हमें एक कोने की तरफ़ ले गया और वहाँ से मंदिर के गुंबद की तरफ़ इशारा करते हुए मंदिर के कलश पर फहर रहे ध्वज की ओर देखकर कहने लगा, "माता जी, आप देख रही है। मंदिर के ऊपर वह पताका फहर रही है। उसके नीचे एक गोल-सा चक्र है। यह कोई सामान्य चक्र नहीं है, यह सुदर्शन चक्र है अर्थात् महादेव के साथ-साथ विष्णु भगवान भी यहाँ पूजा पाते हैं। ऐसा पूरे भारत वर्ष में और कोई मंदिर नहीं है। इसलिए इस मंदिर को हरिहर मंदिर कहते हैं। हरि मतलब विष्णु और हर मतलब महादेव। आप सभी हाथ जोड़कर उस सुदर्शन चक्र और पताका को मन ही मन प्रणाम कर लीजिए।"

पंडे की आज्ञा का पालन करते हुए सोच रहा था कि विष्णु भगवान तो समुद्र के अंदर रहते हैं और महादेव जी कैलाश-पर्वत पर। दूर-दूर तक दोनों के साथ-साथ होने का सवाल ही नहीं उठता है। वास्तव में, यह कोई विशिष्ट मंदिर ही होगा, तभी तो दोनों व्यतिरेकी भगवान एक साथ रहते हैं। अगर विष्णु सर्जन करेंगे तो महादेव उसका नाश, फिर विष्णु सर्जन करेंगे तो महादेव उसका नाश- दोनों का यह सिलसिला विपर्यय भाव चलता ही रहेगा। मेरे आस्थाविहीन चेहरे को देखकर पंडों ने मुझे लंबी लाइन में खड़ा रहने का इशारा किया। जैसे ही हम भीतर गए, मंदिर की दीवारें बहुत मोटी-मोटी और ऊँची-ऊँची, मगर चारों कोनों में मकड़ी के जालों की तरह अलंदू के जाले साफ़ नज़र आ रहे थे। देवस्थान है, इसलिए मन ही मन मैंने इसका विरोध किया, मगर मुँह से एक भी शब्द नहीं निकाल पाया। आख़िरकर सदियों से संस्कार के बोझ से दबी मेरी हिंदू आत्मा में विद्रोह की शक्ति भी आती तो कहाँ से? धीरे-धीरे हमारी पंक्ति भी आगे बढ़ते-बढ़ते लिंगराज मंदिर के स्फुट-लिंग के सामने पहुँच गई। मेरी दृष्टि फूलों से लदे, नाग के फन से आच्छादित और चारों तरफ़ बिखरे हुए बिल्व-पत्रों की तरफ़ न जाकर दीवार पर टँगे पिपली कारीगारी वाले गंदे शामियाना पर अटक गई। इतना गंदा! छि:! क्या पंडित लोग भोली-भाली जनता का आस्था के नाम पर इकट्ठा कर रहे चढ़ावे से मंदिर के रख-रखाव और स्वच्छता पर ख़र्च नहीं कर सकते? प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का स्वच्छता अभियान तो मंदिरों में भी विफल है। जबकि अगर आपने माऊँट आबू का दिलवाड़ा जैन मंदिर देखा होगा तो आप उसकी स्वच्छता, रख-रखाव और बारीक़ नक्काशी को देखकर दाँतों तले अँगुली दबा देंगे। मंदिरों की तुलना करना मेरा मुख्य उद्देश्य नहीं है, मेरे मन की आवाज़ यह कि, जो हमारी सांस्कृतिक, धार्मिक धरोहर है, उन्हें कम से कम ऐसा बनाया जाए और सुंदर रखा जाए कि आने वाले दर्शक न केवल दर्शक, बल्कि श्रद्धालु बनकर जाए। 

जैसे मंदिर का नाम ‘लिंगराज‘ ख़ुद बताता है कि यहाँ का शिवलिंग साधारण शिवलिंग नहीं है, वरन् (King of Lings) लिंगों का राजा है। आकार में सबसे बड़ा और श्रेष्ठ, इसे ‘गुप्तकाशी’ और ‘एक्रामवन’ भी कहते हैं। यहाँ गुप्त रूप से काशी छोड़कर महादेव जी तपस्या करने आए थे। यह भी 10वीं सदी का मंदिर है, राजा ययाति केशरी ने निर्माण कार्य शुरू किया और उनके वंशज राजा उद्योत केशरी ने पूरा। यह मंदिर भी चार हिस्सों में बाँटा गया है- विमान, जगमोहन, नाट्य मंदिर और भोग मंडप। कांवड लेकर भक्त जन इस मंदिर में भी जल चढ़ाने आते हैं। इस मंदिर के पास ही एक तालाब है- बिंदु सागर। लोक इस तालाब में नहाते हैं और श्राद्ध तर्पण भी करते हैं। 

इतिहासकारों के अनुसार ओड़िशा का यह त्रिभुवनेश्वर मंदिर लिंगराज में बदल गया, इस बारे में कोई ठोस जानकारी नहीं मिल पा रही है। वेदों के पहले रूद्र, वैदिक शिव और शिव-बिन्दु की जोड़ी (हरिहर) कब वैष्णव और शैव संप्रदायों के बीच पारस्परिक सौहार्द्र संबंधों का आधार बनी, कहा नहीं जा सकता है।

पहले भुवनेश्वर एक छोट-सा गाँव हुआ करता था, पास में ही एकाम्र और तोशाली के जंगल- यह गाँव कब उजड़कर वर्तमान भुवनेश्वर की भीड़ वाला इलाक़ा बन गया, कोई जानकारी नहीं है। इस बारे में जानकारी पाने के संस्कृत साहित्य का सहारा लेना पड़ता है, जो मिथकों, लोक-कथाओं और कल्पनाओं से ओत-प्रोत है। इस मंदिर के संदर्भ में एक संस्कृत पुस्तक प्राप्त होती है- ‘एकाम्र चंद्रिका’, इसके अंदर वर्णित रीति-रिवाज़ आज पूरी तरह से बदल चुके हैं। एकाम्र चंद्रिका में उल्लेख आता है-

"ऋषियों ने शिवजी को अभिशाप दिया कि अब से तुम्हारी पूजा शूद्र लोग करेंगे। कहा जाता है कि इस मंदिर में शिव स्वयंभू के रूप में प्रकट हुए हैं और शुरू-शुरू में उनके पुजारी शबर आदिवासी हुआ करते थे। फिलहाल कोई शबर दिखाई नहीं देता है, और जब यहाँ शिव और विष्णु के मिले-जुले स्वरूप की पूजा होती है और वह भी छत्तीस जातियों द्वारा, इनमें भी कोई आदिवासी जाति के पुजारी नहीं है। इसलिए इस मंदिर में तुलसी और बेल पत्र दोनों एक साथ चढ़ाए जाते हैं।" 

इतिहासकारों के अनुसार 1960 के बाद में शूद्र सेवायतों ने जनेऊ पहनना और अपने आपको ब्राह्मण सिद्ध करने के लिए सक्रिय प्रयास किया, इस वजह आजकल केवल पंडे ही पंडे वहाँ नज़र आते हैं। शंकराचार्य ने इस मंदिर में वैदिक रीति से पूजा-पाठ करने की प्रक्रिया आरंभ की, मगर लिंगराज मंदिर में कहीं पर भी यह उत्कीर्ण किया हुआ नहीं मिलता है।

ईश्वर, धर्म, रीति-रिवाज़ों और आजीविका के प्रति मानव समाज की विचारधारा जैसे-जैसे बदलती है, वैसे-वैसे नए समाज का निर्माण होता जाता है। 10वीं सदी से 21वीं सदी तक हुए बदलाव को हम अनुभव कर रहे थे, हमारे पूर्वज किस तरह सोच रहे होंगे और हमारी आधुनिक विचारधारा कितनी बदल चुकी है कि हमारे अधिकांश शिक्षित वर्ग शिवलिंग को सृष्टि की उत्पत्ति का प्रतीक मानते हैं, कल्पना की उड़ान मानते हैं, जिसके आगे समर्पण करने से मन में सात्विक भाव पैदा होते हैं और मनुष्य जीवन जीने का उद्देश्य मिलता है।

पंडित जी ने विमला दीदी और जगदीश जी को सपरिवार ‘ऊँ त्रयम्बंक यजामहे’ मंत्र के साथ शिवलिंग का जलाभिषेक करवाया और उनके द्वारा चढ़ाई गई पूजा-सामग्री में तुलसी के कुछ पत्ते और टूटे नारियल का एक टुकड़ा दिया, प्रसाद के रूप में। उसके बाद मैंने भी जलाभिषेक किया और प्रणिपात भी।

इसके बाद मंदिर से बाहर निकलकर हमारी यात्रा का अंतिम पड़ाव शुरू होता है धौलीगिरि की ओर। मुझे धौलीगिरि की तुलना में इन पहाड़ियों को धवलगिरि कहना ज़्यादा अच्छा लगता है, शायद मुख सुख या कोमल स्वरों के कारण। ये पहाड़ियाँ 8 किलोमीटर दूर है भुवनेश्वर से और दयानदी के किनारे पर स्थित हैं। दयानदी का नाम आते ही सीताकांत महापात्र की कविता ओड़िशा की कुछ पंक्तियाँ अपने आप होठों पर उभर आती हैं-

"रक्त रंजित दया नदी के किनारे
पश्चाताप में डूबे सम्राट के निद्रा विहिन प्रहर"

यह सम्राट और कोई नहीं अशोक है और कलिंग-युद्ध के कारण यह नदी रक्तरंजित हो गई थी। सैकड़ों लोगों की लाशों को देखकर अशोक सम्राट का हृदय बदल गया। एक बुढ़िया ने जब अपने मृतक जवान बेटे को ज़िंदा करने की अशोक सम्राट से प्रार्थना की तो वह शर्म से पसीज गया और मन ही मन क्रंदन और असहायता अनुभव करने लगा। आज भी पहाड़ी के शिखर पर अशोक के शिलालेख उत्कीर्ण हैं, जिसे पूरी दुनिया के कल्याण के लिए सम्राट अशोक ने चिंता व्यक्त है। उन्हीं शिलालेखों के ऊपर चट्टानों को काटकर हाथी बनाया गया है, जो पुरानी बौद्ध मूर्तियों में एक है। यही नहीं, सन् 1970 में जापान बुद्ध संघ और कलिंग निप्पान बुद्ध संघ ने पहाड़ी के शीर्ष पर सफ़ेद चमकदार बौद्ध-स्तूप बनाया है और पास में ही एक पुराना शिव-मंदिर है। विमला दीदी और जगदीश जी स्तूप के चारों तरफ़ घूम-घूमकर बौद्ध-प्रतिमाओं का निरीक्षण करने लगे। कहीं सोते हुए बुद्ध तो कहीं ध्यान-मग्न, कहीं दयानदी के खुले मैदानों की तरफ़ अपलक निहारते जंगल के राजा शेर की एकाग्र चित्त वाली पीली प्रतिमा। 

 विमला दीदी की साँसें फूलने लगी थीं, सीढ़ियाँ चढ़ने के कारण, इसके बावजूद भी ध्यानावस्था में बैठे बुद्ध की पदमासन वाली प्रतिमा में उनकी हस्त-मुद्रा देखकर अपने एक हाथ पर दूसरा हाथ रखकर वैसी ही हस्त-मुद्रा बनाने की कोशिश करने लगीं। अवश्य ही, सुबह जब वह ध्यान-धारणा करेंगी तो उनकी वह मुद्रा उन्हें याद आएगी और वह अपनी साधना में भी उसका प्रयोग करेंगी। स्तूप के नीचे गन्ना रस बेचने वालों की कुछ दुकानें नज़र आ रही थीं, हमारे चेहरे पर थकान की मुद्रा देखकर जगदीश जी ने सभी को दो-तीन गिलास गन्ना जूस पिलाया। शरीर के भीतर ग्लूकोज़ की मात्रा बढ़ते ही फिर से चेहरे पर रौनक़ लौट आयी थी। 

लगभग तीन-साढ़े तीन बज चुके थे, अभी तक पेट में चावल का एक दाना या रोटी का एक टुकड़ा नहीं पड़ा था। सुबह का होटल में किया गया नाश्ता कहाँ विलय हो गया था, बिल्कुल ही पता नहीं चला। हमने वहाँ से तुरंत होटल की तरफ़ लौटने का निश्चय किया, क्योंकि एक घंटे बाद मुझे भुवनेश्वर से तालचेर के लिए ट्रेन भी पकड़नी थी। फिर से हमारी कार तेज़ गति से पहाड़ी इलाक़ों को पार करते हुए मुख्य सड़क पर आकर अपने गंतव्य स्थान की तरफ़ दौड़ने लगी। सारे रास्ते भर मुझे धवलगिरि की पहाड़ियों की प्रतिध्वनियाँ सुनाई देने लगीं। आज धवलगिरि मौन क्यों है? क्या है इसके अतीत का राज़? क्यों धवलगिरि अपने रूखे मुख पर दुख पोतकर तपस्वी की तरह बैठी हुई है? क्या प्रायश्चित अभी ख़त्म नहीं हुआ। अरे! धौलगिरि तुम्हीं तो वह गुरू थी, जिसने ख़ून के फव्वारे बहाने वाले नरभक्षियों जो, नरमुंड गिराने में माहिर थे, उनका हृदय बदल दिया। तुम्हारे आंगन में उनकी तलवार उठ न सकी। समझ गए होंगे वे हिंसक पशु कि धौलगिरि कोई साधारण पहाड़ी नहीं है, यह देवताओं की लीलाभूमि है। जिसके जाल में फँस गए योद्धा और सम्राट अशोक। यह कैसा युद्ध! यह कैसा युद्ध! क्यों मैंने खून की नदियाँ बहाई? क्या मिला मुझे? सारा जीवन मेरा व्यर्थ हुआ? पूरा पापी हो गया हूँ मैं? कभी तुम्हारे सुंदर गोधूलि गगन में सिंदूरी तरंग बिखेर कर पश्चिम में तेज़ी से बढ़ रहा होगा अस्तांचल, कभी तुम्हारे शीर्ष पर सुमधुर विहंग गीत कानों में असंख्य युगों की दुंदुभि बजा रहे होंगे। दयानदी के गर्भ में समा रहे होंगे दया, क्षमा और कलिंग की पुरानी गौरव महिमा। भावावेश के उच्च धरातल पर पहुँचने पर मुझे धौलगिरि कविता (पदमचरण पटनायक जी) की विस्मृत पंक्तियाँ रह-रहकर हृदय में आघात करने लगीं, मानों कई युग पीछे छोड़ आए हैं हम, और न कभी कलिंग-युद्ध होगा और न ही कभी कोई विश्व-युद्ध। शायद दयानदी की सूनी रेत याद दिला रही है-

"राजघराने खत्म हो गए
बह गए सारे दयानदी में
परछाई तक नज़र नहीं आई
विलीन हो गए सारे महाशून्य में
धवलचूल में!
लिंगराज विशाल मंदिर बचा है
बची है धवलगिरि
बची है पास में खंडगिरि
बेगाना बनकर हतशिरी!
चुपचाप अनकही हृदय विदारक
कलिंग-पुराण महिमा कथा
अतीत काल के गौरव बखान 
असंख्य प्राणों की दारुण व्यथा!
प्रत्येक चट्टान के लटके मुँह पर
लिखा हुआ कीर्ति का राज
सपनों पर गिर न जाए गाज।
कहो, तब, तुम मुझे धवलगिरि
कहो भला, मेरा मुँह देखकर
धवली देश में अतीत का

जीवन लौटेगा या नहीं।" कुछ ही समय बाद होटल ‘सैंडी टॉवर’ आने वाला था। मैंने विमला दीदी को प्रसिद्ध ओड़िया कवि डॉ. सीताराम महापात्र की कविता ‘ओड़िशा’ सुनाना चाहा, जो कि दो दिन की इस धार्मिक, साहित्यिक या यूँ कहें गवेषण दृष्टि से महत्वपूर्ण यात्रा का संक्षिप्त में पूरा निचोड़ प्रस्तुत करती है। यद्यपि कविता पुरानी थी, सन् 1970-75 की रही होगी, उस समय का ओड़िशा और आज के ओड़िशा में रात-दिन का फ़र्क हो गया है। अब छपरीले घरों की जगह गगनचुंबी इमारतें नज़र आ रही हैं। घर के आगे पुरवाई पवन के हिलोरे खाने वाले मंजरी से लदे आम्रवृक्षों में किसी सपने की तरह लुकाछिपी खोलने वाली हल्दी बसंत दूर-दूर तक नहीं दिखाई देती है। जब आम के पेड़ ही काटे जा चुके हैं तो हल्दी बसंत चिड़ियों की चहचहाहट कहाँ से सुनाई देगी? अब ओड़िशा इतना निर्धन नहीं रहा है कि रास्ते में नारियाल की खोल से खोलते हुए छोटे-छोटे मासूम बच्चों की उदास आँखें दिखाई पड़ेंगी या टूटी कुर्सी का विकेट बनाकर दोपहर की तपती धूप में क्रिकेट खेलने वाले किशोर के चमकते चेहरे या धान के खेतों में गीली मिट्टी को रोलते हुए झुकी कमर वाले ‘कुशा डेरा’, ‘रघुमलिक’ का अनिश्चित अंधकारमय भविष्य नज़र आएगा। सब कुछ बदल चुका है, विगत पचास सालों में, मगर जो नहीं बदला है कवि की अंतरात्मा में बसी हुई अतीत की स्मृतियाँ। तभी तो कवि सीताकांत जी कहते हैं- 

"अपने साथ ले जाता हूँ
सूर्योदय की पूर्व बेला में
कजलपाती, कौआ या कोयल की कूक
सुनाई देने से पहले
खंडगिरि की गुफाओं से सुनाई देने वाले
जैन मुनियों की प्रार्थना के उदात्त स्वर,
रक्त-रंजित दयानदी के किनारे
पश्चाताप में निमग्न सम्राट के निद्राहीन प्रहर
सांझ के अंधियारे में पिता को पहली बार
मिलने आए पुत्र के आत्म-विर्सजन से
पैदा हुई शोक-लहर
चित्रोत्पला घाट से 
स्नान-तर्पण करके लौटते 
दादा जी की खड़ाऊं के
प्रभात बेला में मधुर स्वर"

आज भी सीताकांत महापात्र अपने भीतर एक सीधे-साधे ओड़िया इंसान, एक साधारण ओड़िया परिवार का अन्वेषण करते है। उनकी स्मृतियों में हल्दी-पत्र की सुगंध, काकरा, चकुली पीठा, रंगोली, दशहरे के मिष्ठान, द्वार से दहलीज़ तक बने लक्ष्मी पद के छोटे-छोटे निशान और गोधूलि बेला में बरामदे में सहारा लेकर बैठी हुई दादी माँ का चेहरा उभर आता है, तो कभी उनकी निगाहें भागवत की छोटी-छोटी पंक्तियों पर तो कभी निर्माल्य कणिका और अभय वरदान देती हुई चक्राकार आँखों की तरफ़ चली जाती है, तो कभी उन्हें तुलसी चौरा के सामने अपने दुख को छुपाकर मुस्काराहट बिखेरती गृहलक्ष्मी की नीरव प्रार्थना सुनाई पड़ने लगती है। तभी तो उनका हृदय कह उठता है- ‘इतना ही बस मेरे लिए ओड़िशा।’

और मैं भी इन पंक्तियों पर अपना अधिकार जमाते हुए दोहराने लगता हूँ, आधुनिक परिवेश, परिदृश्य और परिप्रेक्ष्य को ध्यान में रखते हुए-
"यही है मेरा ओड़िशा,
इतना ही मेरे लिए ओड़िशा।"

‘इतना ही मेरे लिए ओड़िशा’ पंक्ति की दो-तीन आवृत्ति करते हुए मैंने विमला दीदी और भंडारी साहब से रेलवे स्टेशन जाने की अनुमति माँगी। दीदी की आँखों में स्नेह-वात्सल्य और अपनापन साफ़ नज़र आने लगा था, मानों उन्हें ऐसा लग रहा था कि उनका कोई सगा भाई बिछुड़ रहा हो। और मुझे भी ऐसा लग रहा था कि मेरी कोई बड़ी बहन मुझे मिलने के लिए, कोयलांचल के 25 साल की नौकरी करने के बाद पहली बार मिलने आई हो। 

‘अलविदा‘ शब्द कहना मानों आँखों में आँसुओं को आमंत्रित करना है, अतः केवल हाथ जोड़कर होटल ‘सैंडी टॉवर’ से मैंने उनसे विदा ली। उनका कहना था कि वह बहुत जल्दी ही एक महीने के लिए अमेरिका जाने वाली हैं। और मेरा उनसे निवेदन था, एक बार कम से कम तालचेर आ जाते तो आपको अपनी कॉलोनी और कोयले की खदानें दिखा पाता। मुस्कराते हुए उन्होंने कहा, "जिस समय शीतल भाभी आएगी तो हम सपरिवार आपके यहाँ रुकेंगे। हमारी सेवा के लिए कम से कम भाभी को होना चाहिए न।"

इतनी आत्मीयता से मुस्कुराते हुए उन्होंने कहा था कि उनकी हँसमुख छवि और ममता भरी नज़रें हमेशा के लिए मेरे मन-मस्तिष्क में एक ख़ूबसूरत अविस्मरणीय यादगार बनकर रह गई।

उन्हें राजस्थान गए हुए, ज़्यादा दिन नहीं हुए थे कि एक बार अचानक उनका फोन आया, "मैं भुवनेश्वर में जिस किसी को फोन लगा रही हूँ, कोई मेरा फोन ही नहीं उठा रहा है। मैंने टी.वी. में पुरी और भुवनेश्वर में तेज़ आँधी-तूफ़ान वाले साइक्लोन ‘फनी‘ के बारे में देखा तो मन हुआ कि आप सभी लोग किस हाल में है, पता कर लूँ।" 

उधर से मैंने उत्तर दिया, “दीदी, तालचेर में तो सबकुछ ठीक-ठाक है, सिवाय कुछ दिन तेज़ बारिश के। लेकिन पुरी और भुवनेश्वर तो काफ़ी हद तक तबाह हो गए हैं। पुरी के जगन्नाथ मंदिर में आप जिस कल्पवृक्ष पर धागे से मिट्टी का टूटा छोटा ठीकरा बाँधना चाहती थीं और जिसके बारे में पंडे लोग, उसकी उत्पत्ति सतयुग से बता रहे है, वह जड़ों से उखड़ गया है। जहाँ-तहाँ बिजली के खंभे टूट गए हैं। पुरी के समुद्र तट के सामने वाली सड़क पर जहाँ हम खड़े थे, वह तो कम से कम दो तीन फीट समुद्री बालू से ऐसी भर गई है कि कोई आदमी पैदल भी नहीं चल सकता है। चारों तरफ़ बड़े-बड़े पेड़ टूटे हुए हैं, फनी की तेज़ हवाओं और क्रोधित लहरों के कारण इंटरनेट-वंटरनेट सब कटे हुए हैं। चारों तरफ़ तबाही ही तबाही। लोगों को पीने का पानी और खाना भी नसीब नहीं हो पा रहा है। बहुत सारी कंपनियाँ, एनजीओ और मारवाड़ी युवा मंच वाले जहाँ-तहाँ जाकर भुवनेश्वर और पुरी में रिलीफ़ कार्य कर रहे हैं। मिनरल वाटर और खाने के पैकेटों के वितरण पर नंगे बदन वाले लोगों की ऐसी भीड़ उमड़ रही है कि आप सोच भी नहीं पाएँगी कि यह वही पुरी है, जहाँ कुछ दिन पूर्व हम भ्रमण पर आए थे या फिर दक्षिण अफ्रीका का नाइजीरिया या इथोपिया।

दीदी पूरा नक्शा ही बदल गया है भुवनेश्वर और पुरी का। ज़रा-सा सोचिए आज हम अपने जीवन-काल में उन जगहों पर प्राकृतिक विपदा से हो रहे विनाश के साक्षी बन रहे हैं तो युगों-युगों से पृथ्वी पर हो रहे भौगोलिक और प्राकृतिक आपदाओं को इन स्थानों से कितना सहा होगा? मुझे तो ऐसा लग रहा है कि मानों भुवनेश्वर और पुरी में किसी ने परमाणु बम फेंक दिया है, जैसे सन् 1945 में अमेरिका ने जापान के नागासाकी और हिरोशिमा पर फेंका है। सही कहूँ, आप बुरा मत मानिएगा, जिस जगन्नाथ के हमने दर्शन किए थे, उनका देहावसान हो गया है। अगर उनमें ईश्वर बचा रहता तो क्या वे अपने इन स्थानों को उजड़ते देख पाते? उनके हाथ में सुदर्शन चक्र है, अगर वे चाहते तो ‘फनी’ को सुदर्शन चक्र चलाकर दूसरी तरफ़ डायवर्ट भी कर सकते थे। मगर उन्होंने ऐसा नहीं किया, इसका मतलब साफ़ ज़ाहिर है कि जिस तरह कृष्ण ने अपने मृत्यु से पूर्व अपने वंश का समूल नाश देखा था, दुर्वासा मुनी के श्राप से पूरे साम्राज्य में ‘कोकुआ भय’ फैला दिया था। कहीं ईश्वर इस युग में ऐसी मंशा तो नहीं है ?"

एक दीर्घ साँस में मेरे मन में जो कुछ भी आया मैंने उन्हें कह दिया। बाद में मुझे लगा कि जर्मन दार्शनिक नीत्शे का कहीं मुझ पर प्रभाव तो नहीं पड़ रहा है, जो हमेशा कहते थे, ‘गॉड इज़ डेड’ और मैं कह रहा हूँ, ‘जगन्नाथ जी का देहावसान’ हो गया है। कहीं मेरे मन-मानस पर काम्यू, काफ़्का, सात्रे, हेडगर, मार्सल, कार्ल जास्पर आदि अस्तित्ववादियों का प्रभाव तो नहीं पड़ रहा है। वास्तव में, मैं भी यही अनुभव कर रहा हूँ। न आगे की सोच रहा हूँ और न ही पीछे की। जन्म और मृत्यु में बीच में जितनी साँसें लेना लिखा है, उतना ही लेना होगा। फिर क्या आगे और क्या पीछे? क्या लोक और क्या परलोक? सैमुअल ब्रेकेट के नोबेल पुरस्कार से नवाज़े गए नाटक ‘वेटिंग फॉर गोडोट’ ने मेरे जीवन के प्रति सोचने का सारा दृष्टिकोण ही बदल दिया, नाटक के पहले दृश्य में पोजो मालिक है और अपने गुलाम लकी पर अत्याचार करता है, और कुछ ही समय बाद दूसरे दृश्य में वही पोजो अंधा हो जाता है और लकी गूँगा। दूसरे शब्दों में लकी मालिक हो जाता है और पोजो उसका गुलाम। परिस्थितियाँ क्या से क्या कर देती हैं-

"राजा हो जावे रंक
रंक नृप भारी
योगी हो जावे भोगी
भोगी गृह वनचारी"

हमारी इस यात्रा के समय भुवनेश्वर और पुरी खिल-खिलाकर हँस रहे थे और एक हफ़्ते बाद अचानक दारिद्रय, नैराश्य, अराजकता, असहायता, आपदा, विनाश और किन शब्दों में कहूँ, भुवनेश्वर और पुरी अपनी प्रगति के दो दशक पीछे चले गए। लोग ये स्थान छोड़-छोड़कर दूसरी जगह जाकर रहने लगे थे। परिस्थितियाँ इतनी विषम थीं कि लोगों के मुँह से एक ही शब्द निकल रहा था- या तो ईश्वर नहीं है और अगर है तो शायद ईश्वर मर चुका है, या फिर लोगों ने ईश्वर का अंत्येष्टि-कर्म कर दिया है। पाश्चात्य लोगों ने भी ‘Fureral of god’ जैसी कविताएँ लिखी थीं, निराश मन से और ‘गोडोट‘ का इंतज़ार करते-करते थक हारकर। 

गोडोट को अगर हम अवतार मान भी लेते हैं अपने हिंदू धर्म में, तो क्या अभी ईश्वर के अवतार लेने का समय नहीं आया है? चारों तरफ़ बलात्कार, लूटपाट, हत्या, रिश्वतखोरी, अविश्वास फिर कब समय आएगा कि जयदेव के ‘गीत गोविंद’ का कृष्ण फिर से अपनी बाँसुरी बजाने लगेगा और दुनिया में शांति और धर्म की स्थापना होगी। 

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