पूर्व और पश्चिम का सांस्कृतिक सेतु ‘जगन्नाथ-पुरी’: यात्रा-संस्मरण - 3

01-12-2019

पूर्व और पश्चिम का सांस्कृतिक सेतु ‘जगन्नाथ-पुरी’: यात्रा-संस्मरण - 3

दिनेश कुमार माली

बेहेरा साहब की लोक-कथा सुनकर जगन्नाथ पूजा की प्रारंभिक चेतना के बारे में ज्ञान हुआ, मगर अचानक नीले पत्थर की एक प्रतिमा तीन अपाद-अहस्त के स्वरूप में कैसे बदल गई? 

इस प्रश्न पर सरोजिनी जी ने प्रकाश डाला, "बेहेरा साहब की कहानी मध्ययुग तक सही है। मगर उसके बाद विप्र नीलांबर (देऊल तोला सौंगा) यानी मंदिर निर्माण के बारे में उल्लेख आता है। सारला महाभारत की कहानी में कुछ बदलाव हो जाता है, ब्राह्मण विश्ववसु विद्यापति बन जाता है और शबर मुखिया जारा, विश्ववसु। ऐसे भी शबर का नाम विश्ववसु होना असंगत है मगर तत्कालीन समान में हो रही ब्राह्मणीकरण को दर्शाता है। उसके बाद कहानी में जो बदलाव हुए, वे इस प्रकार है। शबर मालवा के राजा इन्द्रद्युम्न को नए अन्वेषित शबर देवता की पूजा करने की अनुमति इसी शर्त पर देते हैं कि वह उनके लिए एक भव्य मंदिर बनाएँगे। राजा यह शर्त मान लेता है और एक सुंदर मंदिर का निर्माण करता है। मगर शास्त्रोक्त रीति से मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा कैसे होगी-यह सोचकर वह स्वयं ब्रह्मलोक में ब्रह्मा जी को आमंत्रित करने जाता है। ब्रह्माजी उस समय ध्यान मग्न होते हैं और इन्द्रद्युम्न को इन्तज़ार करना पड़ता है। ब्रह्मा जी का एक दिन पृथ्वी के कितने युगों के बराबर होता है, यह बताने की आवश्यकता नहीं है। इतने युगों में राजा का नव-निर्मित मंदिर रेत के टीबों से ढक जाता है। नए-नए शासक पैदा हो जाते है, जिन्हें इन्द्रद्युम्न की इस स्थापत्य उपलब्धि के बारे में पता नहीं होता है। एक बार गाल माधव राजा वहाँ से गुज़रता है तो रेत के टीबों में उसके घोड़े के खुर किसी ठोस चीज़ से टकरा जाते है। राजा उतरकर बालू हटाने लगता है तो मंदिर का शूल नज़र आने लगता है। फिर वह खुदाई शुरू करवाता है तो सामने प्रकट होता है- इन्द्रद्युम्न का निर्मित भव्य मंदिर।"

इसी समय, स्वर्ग के इन्द्रद्युम्न और ब्रह्माजी उतरकर नीचे वहाँ पहुँचते है। उन्हें अपरिचित मान लिया जाता है और सारा क्रेडिट गाल माधव लेना चाहता है। मगर वहाँ काम करने वाले मज़दूर कछुआ बनकर पास वाले तालाब में रहने लगते है। वे साक्षी देकर इस मंदिर को इंद्रद्युम्न का बताते हैं। आज भी पुरी में बड़े-बड़े कछुओं वाले तालाब को ‘इंद्रद्युम्न तालाब’ कहा जाता है।

इस प्रकार गाल माधव और इंद्रद्युम्न का विवाद ख़त्म हो जाता है। ब्रह्मा जी मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा करने के लिए तैयार हो जाते है। मगर मूर्ति कहाँ? सारला महाभारत की कहानी फिर से यहाँ दोहराई जाती है, मगर प्रस्तर प्रतिमा काष्ठ प्रतिमा का रूप ले लेती है। दारू ब्रह्म (लकड़ी का लट्ठा) वास्तव में प्रस्तर युग से काष्ठ युग में परिवर्तन का संकेत करती है। इस कहानी में लकड़ी का लट्ठा इतना भारी होता है कि राजा और उसकी सेना उसे नहीं खींच पाती है, मगर उनके भक्त ब्राह्मण विद्यापति और शबर विश्ववसु के एक-एक किनारे को पकड़ने से उठ जाता है और किनारे पर लाया जाता है। मगर इंद्रद्युम्न की रानी गुंडिचा सही मायने में नारीवादी और कला-अनुरागी स्त्री थी, जहाँ तक मैं सोचता हूँ क्योंकि वह इस लकड़े की जगह कुछ यथार्थ वस्तु चाहती थी। वह चाहती थी, इससे कुछ मूर्तियाँ बनाई जाए। राजा ने कई सुथारों को बुलवाया, मगर लकड़ी इतनी कठोर थी कि उनके सारे औज़ार ख़राब हो गए। अंत में, बूढ़े सुथार के रूप में विश्वकर्मा जी वहाँ आते है और एक शर्त पर मूर्तियाँ बनाना स्वीकार करते हैं। पहली शर्त, वह बंद मंदिर में मूर्तियाँ बनाएँगे। दूसरी शर्त, इक्कीस दिन लगेंगे। तीसरी शर्त, इस दौरान किसी भी प्रकार का उन्हें व्यवधान नहीं पहुँचाया जाए। सभी शर्तें मान ली गईं। शुरू-शुरू में औज़ारों की आवाज़ सुनाई देती थी, मगर धीरे-धीरे कम होती गई। आवाज़ नहीं सुनकर रानी अधीर हो उठी और इक्कीस दिन पूरे हुए बिना ही मंदिर का दरवाज़ा खोल दिया तो देखा कि तीन मूर्तियाँ वहाँ थीं, मगर वह सुथार ग़ायब। ये तीन मूर्तियाँ ही कृष्ण, सुभद्रा और बलभद्र की हैं। ओड़िया में कहावत आती है- “It is for listening to a women that even the lord remains mutilated" 

यह कहते हुए डॉ. सरोजिनी साहू के चेहरे पर स्वतः स्मित खिलने लगी, शायद उन्हें लगा होगा कि एक नारीवादी लेखिका होने के बाद भी वह इस कहावत दुहरा रही है, जिसमें नारी-निंदा है।

विमला जी दोनों की कहानियों को सुनकर अपने इतिहास-बोध का सहारा लेते हुए आश्वस्त स्वर में कहने लगी, "मुझे लगता है कि पुराने ज़माने में जितने भी काम हुए हो, चाहे स्थापत्य के हो, पेंटिंग के हो, या फिर किसी भी कलात्मक सौंदर्य के हो, चाहे कविता, कहानी, काव्य, महाकाव्य, नाटक, दर्शन। सभी चीज़ों को किसी भी तरह अध्यात्म से जोड़ दिया गया है, ताकि मनुष्यों के आध्यात्मिक-विकास के साथ-साथ तत्कालीन समाज में किसी भी प्रकार की विशृंखलता पैदा नहीं हो।"

मुझे विमला जी के इस व्यक्तव्य में नृतत्व-विज्ञान की धुन सुनाई दे रही थी कि शायद वह मानव जीवन के क्रमिक विकास से इन लोक-कथाओं, मिथकों, सांस्कृतिक-उपादानों और जीवन-चर्या को जोड़कर देखना चाहती हैं। आधुनिक भारतीय समाज इन परिवर्तनों से गुज़रते हुए इस मुक़ाम पर पहुँचा है कि अपनी विकसित चेतना से पूर्वजों की कृतियों, कथानकों, स्थापत्य-कलाओं और मिथकों का स्वतंत्र-भाव से विवेचन कर सके। डॉ. सरोजिनी साहू, उदयनाथ बेहेरा जी की किंवंदतियों अथवा लोक-कथाओं पर विमला जी की निष्पक्ष टिप्पणी सुनकर भी मेरा मन शांत नहीं हुआ। इतिहास-मिथकों में दूध का दूध और पानी का पानी करना आधुनिक युग में इतना सहज नहीं है, जबकि हज़ार साल से ज़्यादा का समय पार हो गया है। इतने दीर्घ समय में न केवल पृथ्वी पर अनेक परिवर्तन हुए होंगे, वरन् मनुष्य की भाषा और चेतना के भी कई स्तर बदल चुके होंगे। जहाँ ‘भाषा बहता नीर’ है तो चेतना भी किसी बहते महासागर से कम नहीं है, जिसमें कितने ज्वार-भाटा आए होंगे, कितने ज्वालामुखी फूटे होंगे-अनगिनत। युग-युग के हिसाब से मनुष्य की चेतना भी मूलाधार से सहस्रार तक पहुँचने लगी होगी, तभी तो महर्षि अरविंद ने अपनी पुस्तक ‘डिवाइन लाइफ़’ में ‘मैन से सुपरमैन’ यानी मानव से अति मानव की कल्पना की है। 

डॉ. मायाधर मानसिंह अपनी पुस्तक ‘The saga of the land of jagannath’  में नीलमलई के शिवलिंग को जैन तीर्थकर जिननाथ को जिनेश्वर में परिवर्तित होते देखते हैं कि गाल माधव और कोई नहीं, बल्कि खारवेल का राजा था, जो मगध से जैन प्रतिमा को लाकर समुद्र के किनारे प्रतिष्ठापित करते हैं। ऐसे भी जैन धर्म में पार्श्वनाथ, ऋषभनाथ जैसे तीर्थकरों के नाम आते है। हटीगुफा का यह वर्णन पुरी से मेल खाता है। खारवेल नरेश ने अपने ओडिशा राज्य में बौद्ध धर्म को हटाकर जैन धर्म स्थापित किया था, जो उनके सौ साल के बाद फिर से बुद्ध धर्म में बदल गया और जैन प्रतिमा बुद्ध ट्रिनटी (त्रिरत्न) बुद्ध, धम्म और संघ में विभाजित हो गई। इस समय जैनों के जिननाथ, जगन्नाथ में बदल गए। इससे पूर्व उन्हें ‘नील माधव’ ही कहा जाता था। बुद्ध धर्म की शाखा महायान के प्रचार के समय पूरे भारत में मूर्तिपूजा का प्रचलन बढ़ गया था और कुछ सदियों तक शायद जगन्नाथ मंदिर में बुद्ध, धम्म और संघ तीनों मूर्तियों की पूजा होती थी। अरुण जोशी ‘ओड़िशा रिव्यू’ (1968) में अपने आलेख ‘ओरिजन ऑफ़ लार्ड जगन्नाथ एंड कार फेस्टिवल’ में लिखते हैं,

“भुवनेश्वर के ओड़िशा स्टेट म्यूज़ियम में हमने देखा कि दो पहियों वाली कार को दो बैल खींच रहे हैं। ड्राइवर आगे बैठा है और एक आदमी पीछे। कार में तीन कमल के फूल जैसी वस्तुएँ रखी हुई है, जो बौद्ध धर्म के त्रिरत्न है- बुद्ध, संघ, धम्म।"

बौद्ध धर्म के ये त्रिरत्न ही आगे जाकर जगन्नाथ के त्रिरत्न यानी जगन्नाथ, बलराम और सुभद्रा बन गए।

यह भी आश्चर्यजनक बात है कि बौद्ध धर्म की माहियान शाखा के महिमा (लेख) संप्रदाय के कुछ धर्मावलंबियों ने जगन्नाथ मंदिर पर आक्रमण किया था, यह कहते हुए कि जगन्नाथ बुद्ध के अवतार हैं, न कि हिन्दु पंडों के जगन्नाथ। इसमें काफ़ी लोग हताहत भी हुए थे। मंदिर में कई दुर्घटनाएँ भी हुईं, कभी रथ-यात्रा के समय मंदिर की दीवारों से बड़े-बड़े पत्थर गिर गए तो कभी भगदड़ में कई लोगों की जानें चली गईं, इसके बावजूद भी लोगों की आस्था में कोई कमी नहीं आई, वरन दिन-दूनी रात चौगुनी गति से न केवल अशिक्षित बल्कि शिक्षित वर्ग को भी अपने अंध-विश्वास के घेरे में लपेटता चला गया। अंग्रेज़ों ने भी तत्कालीन अँधेरे में डूबे भारतीय समाज का ख़ूब फ़ायदा उठाया, वे स्वयं भी जगन्नाथ मंदिर से मूर्ति पूजा समाप्त करना चाहते थे। बाइबिल के अनुसार मूर्तिपूजा सबसे बड़ा अपराध है, मगर अंग्रेज़ पक्के व्यापारी थे, जैसे-तैसे लोगों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाए बिना अपना मुनाफ़ा कमाना ही उनकी कंपनी का मुख्य उद्देश्य था। इसके बाद भी उनका मानना था – “Blow at Idolatry, blow at root"

उनके लिए अगर भारत को मूर्तिपूजा से मुक्त करना था तो जगन्नाथ मंदिर से ही मूर्तिपूजा पर प्रहार करना ज़रूरी था। बहुत प्रयास के बाद भी उन्हें सफलता नहीं मिली। उन्होंने यात्रीकर समाप्त कर दिया और जगन्नाथ मंदिर के प्रबंधन की डोर खुर्दा के राजा को सौंप दी, बाद में पुरी के राजा को और जब पुरी का राजा रामचन्द्र देव मुसलमान बन गया तो उनके पोते को राजा की पदवी देकर मंदिर का भार सौंप दिया गया। उस मुसलमान राजा के लिए बाहर में मूर्ति लगवाई गई। वह मूर्ति पथभ्रष्ट राजा के लिए ‘पतितपावन’ बनी। ऐसा ही माहौल गया और इलाहाबाद के मंदिरों में था। 

सर हेन्स सिंगर की पुस्तक ‘द हिस्ट्री ऑफ़ जगन्नाथ टेंपल’ में राम शंकर भारती का दृष्टांत मिलता है। भारती जी आदि गुरु शंकराचार्य के अनुयायी थे, अतः वे भैरव की मूर्ति यानी शिव की लीलामूर्ति को जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के रत्नवेदी के पास स्थापित करना चाहते थे, इसके लिए उन्होंने सन् 1806 में अंग्रेज़ सरकार को उचित कार्रवाई हेतु पत्र लिखा था, मगर आगे जाकर यह मूर्ति कहीं ‘भैरवी चक्र’ का प्रतीक न बन जाए- इस हेतु अनेक हिंदु विद्वानों ने राय-मशविरा करने के बाद अंग्रेज़ों से उस दरख़ास्त को नामंज़ूर करवा दिया। यह घटना पुरी के जगन्नाथ मंदिर को बुद्ध मंदिर का संशोधित रूप मानने के लिए मजबूर करती है। 

विमला जी और जगदीश जी को ये सारी किंवदंतियाँ अच्छी लग रहीं थीं, चाहे ऐतिहासिक हो, या पौराणिक या श्रुति आधारित लोक-कथाएँ। इन कहानियों में उन्हें रस आ रहा था, अध्यात्म का पुट लिए इन कहानियों में जगन्नाथ मंदिर पर शैव मत, बौद्ध और जैन संप्रदायों, यहाँ तक कि महिमा धर्म, सनातन हिन्दु धर्मावलंबियों का संघर्ष साफ़ नज़र आ रहा था। एक अनार सौ बीमार! सारे धर्म वाले आख़िरकार इस भव्य मंदिर पर अपनी छाप क्यों छोड़ना चाहते हैं? 

मैं विमला जी के चेहरे के हाव-भाव देखकर इस अनुत्तरित प्रश्न को सहजता से समझ पा रहा था। पुरी के ‘ड्रिस्ट्रिक्ट गज़ट’ में जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियों को बौद्ध धर्म से उत्पन्न माना हैं। ‘द एनसिएंट ज्योग्रॉफी ऑफ़ इंडिया’ के जनरल कनिंघम भी इन तीनों मूर्तियों को बौद्ध धर्म के त्रिरत्नों की प्रतिच्छाया मानते है, जो बुद्ध का ब्राह्मणिक अवतार हैं। नवकलवेर के दौरान इन मूर्तियों में से बुद्ध का दाँत स्थानांतरित किया जाता है, कहीं ब्राह्मण लोग बुद्ध के अवशेष को नष्ट नहीं कर दें, इसलिए रेशम की गठरी में रखे बुद्ध के दाँत को ब्रह्म कहकर पुकारते हैं- वह ब्रह्म, जो सारे ब्रह्मांड का कर्ता-धर्ता है। जगन्नाथ मंदिर की जाति-हीनता, रथ-यात्रा और मंदिर के भीतर सामान बेचने की प्रक्रिया रंगून के प्रसिद्ध शवे डेगन पैगोडा से मिलती-जुलती है। इतना ही नहीं, जिस चबूतरे पर जगन्नाथ मंदिर की तीनों मूर्तियाँ रखी जाती है, उसे ‘रत्नवेदी’ कहा जाता है, जबकि इस चबूतरे में कहीं कोई रत्न नज़र नहीं आता है। भाषाविदों का मानना कि ‘त्रिरत्न वेदी’ शब्द धीरे-धीरे ह्रास होते हुए ‘रत्नवेदी’ में बदल गया होगा, जो कि बुद्ध के त्रिरत्नों का आसन है। 

एक तथ्य में नारीवादी लेखिका डॉ. सरोजिनी साहू के सामने रखना चाहता था कि विप्र नीलांबर के बैलेड-लिजेंड के अनुसार ब्रह्मा द्वारा प्रतिष्ठापित तीनों अपूर्ण मूर्तियों की सेवा के लिए राजा इंद्रद्युम्न को निम्न आदेश दिए गए थे।
    • पहला, हर साल रथ-यात्रा के नौ दिन में शबर मुखिया के वंशज उनकी सेवा करेंगे, जो शुरू में ‘नील माधव’ के रूप में उनकी पूजा करते थे। इस दौरान वे उन्हें कच्चे फल और अनपकी दाल चढ़ाएँगे।
    • दूसरा, विद्यापित और उनकी ब्राह्मण पत्नी के संतति उनके पुजारी होंगे।
    • तीसरा, विद्यापति और उनकी शबर पत्नी की संतति रसोई तैयार करेंगे।

मंदिर के सेवक आज भी इन आदेशों का पूर्णतया पालन करते हैं, मगर मेरे मन में, जो सवाल उठा था, ब्राह्मण पत्नी की संतति और शबर पत्नी के लिए ब्रह्मा ने पक्षपातपूर्ण आदेश क्यों दिया, जबकि जगन्नाथ का प्रारंभिक स्वरूप तो शबरों के हाथों में था? जो जगन्नाथ मंदिर में जातिहीनता की बातें करते हैं, उनका ध्यान इन सेवकों की ओर क्यों नहीं जाता है? क्या शबरी की संतति के साथ भेदभाव नहीं किया गया? क्या दोनों पत्नियों में विद्यापति ने भेदभाव नहीं किया? क्या ‘मनुसंहिता’ का प्रचलन उस समय भी था?

 इन प्रश्नों के उत्तर न तो सरोजिनी जी के पास थे, न विमला जी के पास और न ही बेहेरा साहब, भंडारी साहब या मेरे पास। एक लोक-कथा और मुझे उस समय याद आ गई- "जब जगन्नाथ प्रभु ने राजा इंद्रद्युम्न को वरदान दिया तो हाथ जोड़कर उन्होंने विनती की- ‘हे प्रभु! मेरा परिवार पूरी तरह समाप्त हो जाए, ताकि पीछे कोई ऐसा नहीं कह सके कि मेरे पूर्वजों ने यह मंदिर बनवाया था।’ 

राजा की यह प्रार्थना स्वीकार कर ली गई और उस दिन से राजा इंद्रद्युम्न एक पहेली बनकर रह गए। राजा इंद्रद्युम्न की प्रार्थना, मेरी नज़रों में बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि ईश्वर के आगे संपूर्ण समर्पण, अपने अहंकार का हनन और अपनी व्यक्तिगत चेतना को परम चेतना में देखना ही मनुष्य जीवन का सही उद्देश्य हैं। भगवत गीता में भी मनुष्य का ईश्वर के प्रति समर्पण ही ईश्वर प्राप्ति का प्रथम क़दम है। वह ईश्वर ही पुरुषोत्तम है और वह ही जगन्नाथ। इस प्रकार जगन्नाथ, जहाँ भगवत-गीता में पुरुषोत्तम है, वहीं बुद्ध भी महायान शाखा में दुखियों का दुखहर्ता-पतित पावन। कहाँ पुरुषों में उत्तम और कहाँ पतितों में पावन। ठीक ऐसा ही, कहाँ राजा भोज और कहाँ गंगू तेली! 

ऐसी ही विडंबना एक और है, सूक्ष्म नक्काशी और कलाकृतियों से भरे पूरे इस मंदिर में ईश्वर की आकारहीनता के पीछे क्या राज है? क्या यह इस बात का द्योतक है कि मनुष्य कभी भी ईश्वर को अपने आकारों में बाँध नहीं सकता, सिवाय प्रतीकात्मक चिह्नों के? 

जब मैंने विरंचि महापात्र के कविता-संग्रह ‘चकाडोला की ज़्यामिति’ का अनुवाद किया था, ओड़िया से हिन्दी में, तब मुझे प्रतीकों के बारे कुल जानने का अवसर मिला था। प्रतीक था- चकाडोला यानी जगन्नाथ की गोल आँखें वैज्ञानिक दृष्टिकोण लिए उनका उत्तर था, जिस तरह किसी गोले का एक केन्द्र बिंदु होता है और दूसरा उसकी परिधि। केन्द्र बिंदु से परिधि के सारे बिंदु समान दूरी पर होते है- इसी तरह जगन्नाथ की गोलाकार आँखों का केन्द्र बिंदु सृष्टि में हर जगह अनुभव किया जा सकता है और उसकी परिधि पर सारे प्राणी उसके लिए बराबर दूरी पर है। न कोई जात, न कोई पात। सब बराबर है, न कोई ऊँचा, न कोई नीचा। जगत के सारे जीव-जंतु, स्थावर या जंगम, सब बराबर है उसके लिए, समतुल्य हैं। विवेकानंद ने भी ठीक ही परिभाषित किया कि सृष्टि के हर कण में ईश्वर की अनुभूति प्राप्त की जा सकती है, मगर ईश्वरीय वृत्त की परिधि असीम है। 

‘The centre of god is everywhere, but the circumference is nowhere’ 

इस प्रकार एक-दूसरे से जगन्नाथ जी से संबंधित कथाओं, कहानियों और किंवदंतियों पर बातचीत करते हुए हम सभी जगन्नाथ मंदिर की चार-दीवारी का चक्कर लगाने लगे। इस चार-दीवारी के भीतर वेणुगोपाल, दामोदर लक्ष्मी, राधा-कृष्णा, मंगला, शिव आदि देवताओं के छोटे-छोटे मंदिर भी है। इस प्रकार जगन्नाथ ने ‘लॉर्ड ऑफ़ यूनिवर्स’ होने की भूमिका निभाई है और इस्कान ने तो जगन्नाथ-संस्कृति और परंपरा को विश्वव्यापी बनाने में अहम भूमिका अदा की है।

मंदिर के प्रांगण से बाहर जाते समय मुझे यह महसूस होने लगा था कि हमारे पूर्वजों ने जगन्नाथ के रूप में भगवान का मानवीकरण किया है। तभी तो ओड़िशा के निर्धनतम वर्ग के लोगों की सब्जी-चावल का बना पीढ़ा उन्हें चढ़ाया जाता है। उनके रसोई में चीनी-आलू आज भी वर्जित है, क्योंकि विदेशों से उन्हें मँगवाया जाता है। उनका प्रतिदिन का खाना नाप से तैयार किया जाता है ताकि यह संदेश जा सके कि खाने को उबालने से उनके विटामिन्स चले जाते हैं। इस प्रकार जन सामान्य को संतुलित आहार करने का संदेश देते हैं। फिर उनका बीमार पड़ना, मौसी के घर जाना, दवाई-दारू करना, उनकी पत्नी लक्ष्मी का रूठना आदि बहुत कुछ ऐसे प्रसंग हैं, जो भगवान को मानवीकरण के द्योतक हैं।

‘सत्यार्थ प्रकाश’ में स्वामी दयानंद सरस्वती ने दो भाइयों के बीच सुभद्रा की मूर्ति रखने पर भी प्रश्नवाचक उठाया कि दो भाइयों के बीच या तो माँ का स्थान होता है या फिर पत्नी का, बीच में बहिन को बिठाना क्या भैरवी-तंत्र की ओर तो संकेत नहीं कर रहा था या फिर incestuous relationship की ओर? 

चार-दीवारी का परिभ्रमण करने के बाद हम उस स्थान पर गए- जिसे सामान्य भाषा में ‘श्मशान घाट’ कहेंगे। मंदिर के अंदर ही बारह साल के बाद जिस साल दो आषाढ़ अर्थात् मलमास आते हैं, उस समय पुरानी मूर्तियों को समाधि दी जाती है और पहले से निर्मिति नई मूर्तियों को उस आसन पर आरूढ़ किया जाता है, इस प्रक्रिया को ‘नवकलेवर’ कहते हैं और समाधि स्थल को ‘कोइलि बैकुंठ’। इसका अर्थ भगवान भी मरते हैं और उनकी आयु होती है केवल बारह साल, जबकि मनुष्य की औसत उम्र होती है साठ-सत्तर साल। जो जगत का नाथ है, वह तो सनातन है, अव्यक्त है, आकार में निराकार, निराकार में आकार है, केवल बारह साल में उनकी समाधि? क्या यह लकड़ी की आयु है या चिरायु, परमायु ब्रह्म की? जन्म-मरण तो मनुष्य का होता है, भगवान का नहीं। इसका अर्थ जगन्नाथ भगवान नहीं है, मनुष्य है यानी उनका मानवीकरण किया गया है, क्षणायु, क्षण-भंगुर मनुष्य को श्रेष्ठ जीवन जीने के लिए? जगन्नाथ का मंदिर अपने आपमें किसी भंवरजाल से कम नहीं है, कहाँ से प्रवेश करेंगे और कहाँ से निकलेंगे, कहाँ से जन्म-मरण की चर्चा करेंगे और कहाँ पर ख़त्म करेंगे, अपने आप में एक अबूझ पहेली हैं। शबर जाति के घर में बनी लकड़ी की छोटी-सी प्रतिमा या खिलौना कह लें, देखते-देखते हज़ार साल के अंतराल में एक अलग संस्कृति के रूप में निखरकर सामने आएगी, जिसमें अध्यात्म होगा, साधारण जीवन जीने की शैली होगी, पारिवारिक संबंधों को निस्पृहतापूर्वक निर्वहन करने का संदेश होगा-कभी किसी प्रत्यक्षदर्शी ने सोचा तक नहीं होगा कि काष्ठ-प्रतिमा लाखों लोगों के जीवन जीने का अभिन्न अंग बन जाएगी।

जगन्नाथ मंदिर के बाहर आते ही विमला जी के मुख से एक ही स्वर निकला- "आह! कितना अच्छा मंदिर है यह! मुझे पूरे मंदिर में सकारात्मक ऊर्जा महसूस हुई।"

मुझे यह ज्ञात है कि वह विज्ञान की अध्येता है और इतिहास की भी, और ऐसे रैकी का कोर्स भी उन्होंने कर रखा था, अतः उनके शब्दों में प्रयुक्त ‘ऊर्जा’ शब्द मुझे बेहद अच्छा लग रहा था। जहाँ विज्ञान की सीमा ख़त्म होती हे, वहीं से अध्यात्म की शुरू होती है। कुछ ऐसे क्षेत्र भी होते हैं, जहाँ विज्ञान और अध्यात्म एक साथ अध्यारोपित होते है एक-दूसरे के ऊपर। वहाँ आत्मा, ऊर्जा, परमात्मा, शक्ति, संचरण, स्वर्ग, नरक, मोक्ष, सकारात्मक, नकारात्मक आदि शब्दों का बाहुल्य मिलता है। ओड़िया भाषा के प्रसिद्ध लेखक मनोज दास का भी मानना है कि मनुष्य जाति के लिए विज्ञान एवं अध्यात्म का संतुलित विकास अत्यंत आवश्यक है, अन्यथा यह सृष्टि अपना संतुलन खो देगी। यही बात तो विमला जी के वक्तव्य में हमें मिल रही थी।

मंदिर परिसर से जैसे ही हम बाहर निकले, बाईं ओर था जगन्नाथ की चमत्कारिक रसोई-घर और दाईं ओर आनंद बाज़ार। रसोईघर में हांडों में चावल पकता है। ऊपर वाले हांडे में पहले, नीचे वाले हांडे में बाद में। यहाँ विज्ञान फेल हो जाता है, मगर ‘सत्यार्थ-प्रकाश’ चावल पकने की इस चमत्कारिक क्रिया को केवल गपोड़ा कहती  है। मगर आनंद बाज़ार में तो आनंद ही आनंद है, चावल के पानी में नींबू डालकर जो तरी बनाई जाती है, एक के बाद एक श्रद्धालु एक-दूसरे का जूठा पीते हैं। न कोई जाति है, न कोई धर्म और न ही कोई वर्ण। क्या ‘आनंद बाज़ार’ वर्ण-वर्ग-जाति विच्छेद करने के लिए बनाया गया है या एक-दूसरे को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से संक्रमित करने के लिए? ‘आनंद बाज़ार’ में बहुत सारा सूख़ा प्रसाद, दूसरे शब्दों में महाप्रसाद, चावल की हांडी, गजा और अनेक प्रकार के व्यंजन और मिठाइयाँ भी मिलती हैं, मगर स्वच्छता के दृष्टिकोण से तो इतना साफ़-सुथरा बाज़ार नहीं है, मक्खियों की भिनभिनाहट ही आपको वहाँ से तुरंत जाने का आग्रह करती है।

‘आनंद बाज़ार’ से बाहर निकलते ही हम पहुँच गए बाईस सीढ़ियों पर। जगन्नाथ जी का मंदिर है तो बाईस सीढ़ी होने का भी तो कोई रहस्य होगा? इस रहस्य के बारे में तो मुझे कोई समझा नहीं सके, मगर मनौती मानने वालों को मैंने इन सीढ़ियों से नंगे बदन लुढ़कते देखा है, जैसे मुसलमानों के ताजिए के समय दो-तीन आदमी सड़क पर लुढ़कते हुए जाते हैं और बीच-बीच में खड़े होकर अपने शरीर पर ज़ोर-ज़ोर से चाबुक भी मारते हैं। ये आर्त-भक्त नहीं हैं तो क्या है? गीता में चार भक्तों का उल्लेख आता है- ज्ञानी, अर्थाथी, जिज्ञासु और आर्त। अपने शरीर को कष्ट देकर भगवान को रिझाना अध्यात्म की पराकाष्ठा हो सकती है या फिर आर्त-नाद? कहीं ऐसा तो नहीं, बाईस जैन तीर्थंकरों की यादगार में तो बाईस सीढ़ियाँ बनाई गई हों। 

इतना ही कहा जा सकता है कि जगन्नाथ मंदिर अपने आप में एक अनसुलझी गुत्थी है, कई रहस्यों को अपने उदर में समेटे हुए। कई पीढ़ियाँ पार हो गईं, मगर न तो इस मंदिर का कोई आदि मिला और न ही कोई अंत। जिसने जैसा सुना, जैसा देखा, वैसा कहा या वैसा लिखा; मगर यह कभी नहीं सोचा कि हम अपने आने वाली पीढ़ी को धर्म और अध्यात्म का संदेश दे रहे हैं या अंध-विश्वास के कृष्ण गह्वर में धकेलने का। 

यात्रा-संस्मरण का उद्देश्य किसी भी पाठक की भावनाओं को हताहत करना नहीं है, वरन सत्य को परखने के लिए अपनी जिज्ञासा,बुद्धि और मीमांसा का भरपूर प्रयोग करने के लिए प्रेरित करना है। तभी तो यह कहा जा सकता है- ‘सा विद्या विमुक्तये’, ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’, ‘मृत्युर्मा अमृतंगमय’। 

ओड़िशा में विगत पच्चीस सालों से रहने के कारण जगन्नाथ मंदिर में जाने का अनेक बार अवसर मिला है, मगर इस बार एक साथ असंख्य तरंग-दैधर्य मेरे मन-मस्तिष्क पर आघात कर रही थी। हो सकता है, मेरे सहयात्रियों का ऊर्जा-स्तर मेरे हृदय को आंदोलित कर रहा हो और झकझोर रहा हो सूक्ष्म निरीक्षण और नैसर्गिक कल्पना शक्ति को। ब्रिटिश साहित्य आलोचक कॉलरिज के अनुसार कल्पना शक्ति ही लेखन का मूलाधार है तो फ्रायड के अनुसार काम मनोविज्ञान और टी.एस. इलियट के अनुसार हमारी परंपराएँ। जगन्नाथ मंदिर में तो असंख्य परंपराएँ हैं। नग्न कामुक मूर्तियाँ भी हैं, काम मनोविज्ञान का आधार और असंख्य फैंटेसियाँ भी। कुल मिलाकर जगन्नाथ मंदिर का परिवेश आपके अंदर सोए हुए लेखक, कवि, समालोचक, गीतकार, दार्शनिक किसी को भी जगा सकता है, बस आवश्यकता है तो किसी उद्दीपण की, किसी उत्प्ररेक की। कौन-सा पल आपके जीवन को किस मोड़ पर ले जाएगा, आपको भी मालूम नहीं चलेगा, आपकी आस्था-विश्वास जगन्नाथ जी का आर्शीवाद या अभिशाप बनकर उभरेगा, यह सब आपके भाग्य का खेल होगा या फिर प्रारब्ध।

जगन्नाथ मंदिर की सकारात्मक ऊर्जा वाली तरंगों की अनुभूति के बाद विमला जी का मन हुआ कि हम सभी पुरी तट देखने जाए। पुरी का तट यानी ‘महोदधि’, दूसरे शब्दों में जगन्नाथ जी का ससुराल। पिता रत्नाकार और बेटी लक्ष्मी। 

हल्का-सा व्यंग्य लिए बेहेरा साहब ने कहा, "जगन्नाथ जी अपनी पत्नी लक्ष्मी से पता नहीं क्यों दूर रहते हैं? सदैव अपनी बहिन सुभद्रा के साथ रहते हैं और रथ-यात्रा के दौरान भी जब बाहर घूमने निकलते हैं तो भी अपनी बहिन के साथ ही, ऐसे भी अगर लक्ष्मी ग़ुस्सा नहीं होगी तो क्या होगी।" 

बड़ी सादगी से सरोजिनी जी ने उत्तर दिया, "ग़ुस्सा होने की बात भी है और बाहुड़ा के दिन जब जगन्नाथ घर लौटते हैं तो लक्ष्मी मंदिर के सारे झरोखे बंद कर देती है। जगन्नाथ जी को तो उनके क्षणिक ग़ुस्से की प्रवृत्ति के बारे में पता है, अतः वे उन्हें ख़ुश करने के लिए गुंडिचा मंदिर से अपने साथ लाए रसगुल्ले आगे बढ़ा देती है। इसी में वह ख़ुश हो जाती है और अपने घर में दरवाज़े-खिड़की खोल देती है।" 

यह सुनकर सब हँसते-हँसते, लोट-पोट हो गए और कार में बैठकर समुद्र की ओर हमने प्रस्थान किया।

विमला जी और जगदीश जी समुद्र-स्नान करना चाहते थे। वे इसके लिए अलग से कपड़े भी लाए थे। मगर हमारे पास कोई तैयारी नहीं थी। इसलिए मैं और बेहेरा साहब आस-पास की दुकानों पर छोटी-मोटी ख़रीददारी करने लगे और भाभीजी को छोड़ दिया, उनके समुद्र-स्नान का साक्षी बनने के साथ-साथ कैमरे में उनके फोटो क़ैद करने के लिए।

जब वे समुद्र तट से कार की ओर लौटे और भाभी जी ने मुस्कारते हुए हमारी तरफ़ देखते हुए कहा, "कितनी ज़िंदादिल ख़ुशनसीब दंपति है। हर पल ख़ुश रहना जानते हैं। एक-दूसरे की ख़ुशी इससे बढ़कर और क्या हो सकती है?"

वाक़ई पति-पत्नी का प्यार एक-दूसरे का समर्थन एवं एक-दूसरे का समर्पण ही तो सब-कुछ है। कभी-कभी लक्ष्मी जी और जगन्नाथ जी भी एक-दूसरे से नाराज़ हो जाते हैं, मगर एक-दूसरे की ग़लतियों को नज़र अंदाज़ कर फिर से प्यार के बंधन में बँध जाते हैं। भले ही, बेहेरा साहब और सरोजिनी भाभी जी ने मज़ाक-मज़ाक में जगन्नाथ जी और लक्ष्मी जी के एक-दूसरे के पृथक रहने पर हल्का कटाक्ष किया हो, मगर मुझे ऐसा लग रहा था कि यह भारतीय समाज में यूनिवर्सल-सा हो गया है। आधुनिक युग में बाल-बच्चों की पढ़ाई के लिए बच्चों को दूर छोड़ते है या फिर आपस में अनबन, मनमुटाव हो जाने पर साथ रहना नहीं चाहते है। क्या हमारे पूर्वजों को इस परिपाटी का पूर्व में ही अहसास हो गया था या फिर पुरुष-सत्ता वाले परिवार को श्रेष्ठ मानकर केवल सम्मान के योग्य उसके घर के सदस्य भाई और बहिन ही रहेंगे, और दूसरे घर से आई पत्नी सदैव समुद्र के गर्भ में सोई रहेगी? यह तथ्य भी भारतीय समाज में नारीवादी लेखन के लिए विषय-वस्तु बनना चाहिए। मगर जिन लोक-कथाओं में, या यूँ कहें लोक-साहित्य में, या फिर मिथकीय शास्त्रों में नारी की हीनग्रंथि को धर्म का आवरण ओढ़ा दिया गया हो तो उसे हटाने के लिए सरोजिनी भाभी जी जैसे गिने-चुने साहित्यकार ही साहस करेंगे। आज भी दूसरे शब्दों में, हम पहले से ज़्यादा धर्मभीरू हैं। हमारे व्यवहार में पूरी तरह कृत्रिमता आ गई है, नैसर्गिकता का दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं रहा।

अब हमारी कार का अगला गंतव्य-स्थल कोणार्क। 

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