पूर्व और पश्चिम का सांस्कृतिक सेतु ‘जगन्नाथ-पुरी’: यात्रा-संस्मरण - 1

01-11-2019

पूर्व और पश्चिम का सांस्कृतिक सेतु ‘जगन्नाथ-पुरी’: यात्रा-संस्मरण - 1

दिनेश कुमार माली

होटल ट्रिबो किंग, भुवनेश्वर में डॉ. विमला भंडारी, डॉ. सरोजिनी साहू, नंदिता मोहंती, उदय नाथ बेहेरा, दिनेश कुमार माली और जगदीश भंडारी

यह भी कितना विचित्र संयोग था कि पहली बार दो विख्यात महिला साहित्यकारों का ओड़िशा की धरती पर मिलन हो रहा था, 26.5.2019 को भुवनेश्वर के ट्रिबो किंग होटल में। दोनों ही अलग-अलग संस्कृति और अलग-अलग परिवेश में पलीं-बढ़ीं। दोनों के वैचारिक धरातल में कुछ जगह साम्य तो कुछ जगह असाम्य, मगर मिलने का अवसर कुछ ऐसा ही था मोनों बचपन की बिछुड़ी हुई बहिनें पहली बार मिल रही हों, सारे धार्मिक, सांस्कृतिक, पारिवारिक, वैचारिक मतभेदों को एक तरफ़ ताक़ पर रखकर।

पहली केन्द्रीय साहित्य अकादमी से पुरस्कृत हिन्दी की वरिष्ठ साहित्यकार श्रीमती विमला भंडारी, तो दूसरी अंतरराष्ट्रीय ख्याति-लब्ध नारीवादी लेखिका- ओड़िया औपन्यासिक एवं कहानीकार श्रीमती सरोजनी साहू। इस मुलाक़ात का अवसर भले ही साहित्यक उद्देश्य नहीं था, पर मांगलिक कार्यक्रम अवश्य था। ऐसे विमलाजी मेरी साहित्यिक गुरु भी हैं और राजस्थान के मेवाड़ अंचल के पारंपरिक परिवेश में पली-बड़ी होने के कारण उनके वात्सल्यता से परिपूर्ण चेहरे पर बड़ी बहिन की तस्वीर देखता हूँ। कहने का वही प्रशांत सौम्य अंदाज़, नेतृत्व की अद्भुत क्षमता और दैदीप्यमान चेहरे पर वही सुकान्ति- जो मुझे उन्हें ‘दीदी’ कहने के लिए प्रेरित करता है। कोई भी साहित्यिक आलेख लिखते समय मेरे लिए उनका नाम या दीदी का सम्बोधनसूचक शब्द चयन करने में गहन अंतर्द्वंद्व पैदा होता है। एक तरफ़ नाम से साहित्यिक गरिमा तो दूसरी तरफ़ दीदी शब्द की आत्मीयता, इसलिए जहाँ साहित्य की बात आ जाती है, वहाँ उनका नाम ‘विमला जी’ और जहाँ अन्तर्मन आत्मीयता की हिलोरें खाने लगता है, वहाँ ‘दीदी’ शब्द का प्रयोग करता हूँ। ऐसा ही डॉ. सरोजिनी साहू के नाम से जुड़ा हुआ दृष्टिकोण है। एक तरफ़ ईब घाटी कोयलांचल में एक दशक से ज़्यादा पड़ोसी रहने के कारण और वय में डेढ़ दशक का अंतर होने के कारण अलग-अलग धरातल पर कभी उन्हें ‘भाभीजी’ के नाम से लिखता हूँ तो कभी सरोजिनी साहू के नाम से। पाठकों की सुविधा के लिए यह सब लिखना मैंने आवश्यक समझा।  

दीदी के देवर की बेटी की शादी भुवनेश्वर में हो रही थी- अतः उन्हें सपरिवार वहाँ आना ही था। यह समय की लीला ही तो है कि राजस्थानी और ओड़िया संस्कृतियों का सम्मिश्रण का उदाहरण बनती जा रही है हमारी नई पीढ़ी पुरानी पीढ़ियों द्वारा स्थापति जाति-संप्रदाय, धर्म, गोत्र आदि के बंधन को तोड़कर उन्मुक्त हवा में साँस लेने के लिए बेताब होकर अपने जीवन, रहन-सहन, भाषा-शैली और वैचारिक मापदंडों को स्वयं तैयार कर रही है। 

सही में, जगदीश जी भंडारी (विमला जी के पति) के चेहरे के हाव-भावों में कुछ मायूसी ज़रूर थी। यह सही है कि प्रेम-विवाह के बिलकुल ख़िलाफ़ तो वह ख़ुद भी नज़र नहीं आ रहे थे, मगर उन्हें याद सता रही थी अपने पूर्वजों की स्मृतियाँ, उनकी ढानियाँ, रेत को थोरे, बड़े-बड़े राजप्रसाद, झीलें, राजस्थानी खान-पान और सर्जनशील कलात्मक परिवेश। मुझे कहीं से ऐसा लगा कि विमला जी भी शायद उस सांस्कृतिक विरासत को मन ही मन कहीं खोया हुआ महसूस कर रहीं थीं। यह स्वाभाविक है, मगर दो विभिन्न संस्कृतियों का समावेश अपने आप में किसी सहृदय साहित्यकार के लिए अनुपम उपहार से कम नहीं होता है। पुरानी पीढ़ी को घुटन तो तब लगती है, जब वैष्णव परिवार को शादी के भोजन में अगर अंडे या मांसाहार परोसा जाए। उससे ज़्यादा और क्या दर्दनाक अनुभूति होगी! राजस्थान के अधिकांश परिवारों के लिए यह किसी असहनीय प्रसव-वेदना से कम नहीं है। भारतीय संस्कृति को वैचित्र्य ही देखिए, राजस्थान के ब्राह्मण परिवार जन्मजात शाकाहारी होते हैं तो ओड़िशा के ब्राह्मण परिवार जन्मजात मांसाहारी। कहने को तो दोनों ही ब्राह्मण! ओड़िया शादियों में अगर बारातियों को मछली खाने को नहीं दी जाएगी, तो वे रूठकर चले जाएँगे और उस शादी को ‘घासफूस’ वाली शादी कहेंगे। मेरा उद्देश्य अलग-अलग प्रान्तों के भोजन-शैली का वर्णन करना नहीं है, बल्कि साहित्यकारों में मन में उठ रही जिज्ञासाओं, उनकी धारणाओं, जीवन-शैली और वैचारिक दृष्टिकोण को अपने नज़रिए से सामने रखना है। यह तो पूर्णतया सही है, साहित्यकार की परिधि भी समाज होती है अतः सामाजिक संरचनाएँ उन्हें अवश्य प्रभावित करती है, उसके उपरांत भी, उनका अपना वैचारिक दायरा बहुत फैला हुआ होता है, जिसमें उनके अर्जित अनुभवों के अरण्य, कल्पना-शक्ति की सरिताएँ और निरीक्षण शक्ति की सूक्ष्म-अनुभूतियों के विभिन्न क्षेत्र देखने को मिलते हैं। बाहरी दुनिया की घटनाओं से अविचलित हुए अपने मन की दुनिया में क्या हलचल हो रही है, उन्हें शब्दों में पिरोना किसी मनोवैज्ञानिक लेखक के लिए भी किसी चुनौती से कम नहीं होता है। या तो शब्द कम पड़ जाते हैं या फिर अभिव्यक्ति की शैली लड़खड़ाने लगती है।

ओड़िया साहित्य से विमला जी से पूर्व परिचित थी, उन्होंने मेरे कई ओड़िया कृतियों के हिन्दी अनुवाद पढ़ रखे थे। यहाँ तक कि सरोजिनी साहू की कई कहानियों, उपन्यासों और आलेखों पर उन्होंने अपने अभिमत भी दिये थे। ‘पक्षीवास’  उपन्यास पर तो उन्होंने प्राक्कथन तक लिखा था। यह पहला प्राक्कथन था, जिसने मुझे साहित्य लेखन के प्रति सचेत किया। मैं यह अच्छी तरह जानता हूँ कि उनके अंतस में ओड़िया संस्कृति और साहित्य के प्रति अगाध श्रद्धा पैदा हो चुकी थी। यह भी भाग्य की बात है, उन्हें केंद्रीय साहित्य अकादमी का पुरस्कार मिला तो वह भी ओड़िया-अँग्रेज़ी के विश्व-विख्यात लेखक मनोज दास के हाथों से। उन्हें ओड़िया लेखकों में सीताकांत महापात्र, रमाकांत रथ, जगदीश मोहंती, प्रतिभा राय, गोपीनाथ मोहंती तथा सरोजिनी साहू आदि अतिप्रिय हैं और मेरे साहित्यिक मित्रों में डॉ. प्रसन्न कुमार बराल, उदयमान बेहेरा और हरिराम पंसारी जी। नंदिता मोहंती ने उनकी प्रसिद्ध कहानी ‘नभ के पक्षी'  का ओड़िया में अनुवाद तक किया था। इतनी गहरी पैठ वाली साहित्यिक पृष्ठभूमि लिए अगर विमला जी का ओड़िशा की धरती पर पर्दापण होता है तो समन्वय सेतु के रूप में काम रहे लेखकों को विशेष प्रेरणादायक महत्वपूर्ण अवसर प्राप्त होता है। 

मेरे लिए तो अत्यंत ही हर्ष का विषय था कि डॉ. सरोजिनी साहू और डॉ. विमला भंडारी की मुलाक़ात अपने आप में एक अविस्मरणीय यादगार बन जाएगी, क्योंकि दोनों लेखिकाओं पर मैंने गवेषणात्मक काम किया है। विमला जी के समग्र साहित्य पर मैंने ‘डॉ. विमला भंडारी की रचनाधर्मिता’ अपनी आलोचना-कृति की रचना की तो सरोजिनी साहू की अनेक ओड़िया कहानी-संग्रहों जैसे ‘रेप तथा अन्य कहानियाँ’, ‘सरोजिनी साहू की दलित कहानियाँ’, उनके उपन्यास ‘बंद कमरा’, ‘पक्षीवास’, ‘विषादेश्वरी’ आदि का हिन्दी अनुवाद और उनके स्वर्गीय पति जगदीश मोहंती की श्रेष्ठ कहानियों और उपन्यासों का भी मैंने अनुवाद किया था। इस प्रकार पूर्व-पश्चिम की लेखिकाओं को जोड़ने के लिए पुल का काम कर रहीं थीं मेरी अनूदित कृतियाँ।

ओड़िशा के पौराणिक उत्कल और कलिंग का अविस्मरणीय इतिहास देश के कोने-कोने में विख्यात है। यहाँ कभी पांडवों ने द्रौपदी समेत उत्कल के धूल-धूसरित जंगलों में विचरण किया और अपने कर्मों के प्रायश्चित के लिए जाजपुर की वैतरणी तथा पुरी के महोदधि में गोते लगाए थे। यह वह धरती है, जहाँ कभी शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, माधवाचार्य, वल्लभाचार्य, चैतन्य महाप्रभु, नानक और कबीर की वाणी मुखरित हुआ करती थी। अद्भुत धार्मिक समन्वय की धरती है यह! महात्मा गाँधी के पद भी यहाँ पड़े थे, कस्तूरबा के साथ। सन् 1933 या 34 की बात रही होगी। भले ही, कस्तूरबा का जगन्नाथ-दर्शन महात्मा गाँधी को रास नहीं आया। उनके दृष्टिकोण में अगर वे जगत के नाथ होते तो निचली जातियाँ उनके दर्शन के लिए वंचित क्यों रहती? क्या निचली जातियाँ समाज का हिस्सा नहीं है? मलेच्छ और विदेशी जातियों को उनके दर्शन के अधिकार क्यों नहीं है? भीमभोई जैसे महिमापंथी संत भी इसी धरती पर पैदा हुए। भौतिक आँखों से, भले ही अंधे रहे हो, मगर आत्मा की आँखों से उन्होंने अध्यात्म का प्रकाश देखा। मूर्तिपूजा का घोर-विरोध किया और निराकार ईश्वरीय सत्ता को मानने का आह्वान। 

धार्मिक उथल-पुथल वाली इस जगह में दिनांक 25.5.19 को विमला जी अपने पति जगदीश जी भंडारी के साथ भुवनेश्वर नीलाद्री चैराहे के पास ट्रिबो किंग होटल में दो दिन रुकीं।

पहले दिन ही सुबह हम यानी उदयनाथ बेहेरा, डॉ. सरोजिनी साहू और नंदिता मोहंती उन्हें मिलने गए तथा शॉल एवं पुष्पगुच्छ से इस सारस्वत दंपति का अभिवादन किया। नंदिता ओड़िया कहानीकार है और हिन्दी से ओड़िया भाषा की अनुवादिका। मृदुभाषी है, भारतीय डाक विभाग में कार्यरत। उनके कई ओड़िया अनुवाद प्रकाशित हो चुके है और मौलिक कृतियाँ भी।

मैं विमला जी को मिलने ट्रेन में तालचेर से भुवनेश्वर गया और वहाँ मेरा इंतज़ार कर रहे थे उदयनाथ बेहेरा, एम.सी.एल. के सेवानिवृत्त प्रबंधक (राजभाषा), ओड़िया कवि, अनुवादक। यह अलग बात है कि कविता-संग्रह छपवाने में उनकी कभी दिलचस्पी नहीं रही। केवल पठन-पाठन, चिंतन-मनन और सरस-सरल जीवन-यापन में सदैव उनका अटूट विश्वास रहा। साई भक्त होने के कारण जीवन में पूरी तरह सीधा-सादा। 

डॉ. सरोजिनी साहू किसी परिचय की मोहताज नहीं है। उनका फ्लैट ‘ट्रिबो किंग’ होटल के सामने से गुज़रने वाली गली के दाहिनी ओर वाले मोड़ पर था। इसलिए इन्हें इस होटल में आने में ज़्यादा समय नहीं लगा। इस अवसर पर उन्होंने अपनी पुस्तक ‘विषादेश्वरी’ की प्रति नंदिता जी भेंट की तो दूसरी प्रति ‘विमला जी’ को। विमला जी के पास भी कई अपनी पुस्तकें थी। हम सभी ने होटल के गलियारे में विशिष्ट भित्तिचित्र के सामने किताबों को अपने हाथों में पकड़कर दर्शकों को दिखाने की मुद्रा में रखते हुए तस्वीरें खिंचवाईं, मानो हमारी पुस्तकों का सचमुच विमोचन पर्व हो। 
कुछ समय इधर-उधर की बातें करने के बाद हमारा सफर शुरू होता है:- 

भुवनेश्वर से पुरी (अगले अंक में)

1 टिप्पणियाँ

  • 2 Nov, 2019 12:17 PM

    पेशे से माइनिंग इंजीनियर दिनेश कुमार माली का लेखन कौशल अद्भुत है। वह इतनी बारीकी से शब्द चित्र खींचते हैं कि सारा परिवेश जीवंत हो उठता है। उनका सूक्ष्म निरक्षण शक्ति तो कमाल की है। नहीं दिखाई देने वाली चीजों को भी वह बहुत गहराई से पकड़ते हैं और शब्दों के माध्यम से बखूबी प्रस्तुत करते हैं। अनदेखा, अनजना इतना कुछ अपने संस्मरण को रोचक बनाकर प्रस्तुत करते हैं कि पढ़ने वाले को भी उसका पूरा आनंद आता है

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