जंगली धारा

15-09-2020

जंगली धारा

दिनेश कुमार माली

मूल अँग्रेज़ी : डॉ नंदिनी साहू 
अनुवाद : दिनेश कुमार माली 

 

उस पूरी शाम मेरी माँ बरामदे के पास लकड़ी के सख़्त तख़्ते पर बैठी हुई थी। मैंने कोयले की सिगड़ी जलाकर उनके पाँवों के पास रख दी और गर्म सरसों के तेल में लहसुन की पिसी हुई गाँठ मिलाकर पैरों की मालिश करने लगी, ताकि उनका दर्द कुछ कम हो जाए। 

मगर आज उनका दर्द हड्डियों तक बढ़ता ही जा रहा था, छोड़ने का नाम ही नहीं ले रहा था। वह एक के बाद एक अपनी नौकरानियों के बारे में शिकायत करती जा रही थी कि किस तरह उन सभी ने उसे धोखा दिया है। दुखी मन से वह कह रही थी, “मैं उन्हें अच्छा खाना खिलाती थी, मेरी बेटियों के पहनने जैसे सुंदर कपड़े देती थी, कई लोगों के मना करने के बावजूद भी। अब मैं अपनी मूर्खता का हर्जाना भर रही हूँ। इसमें किसी और की ग़लती नहीं है। वे लड़कियाँ, वह बूढ़ी औरत और सबसे बढ़कर सबसे ज़्यादा वह दुष्टा मामी, जो अपने आपको माधुरी दीक्षित से कम नहीं समझती थी। ओह!... मैं पागल हो जाऊँगी! इतने सालों तक उनसे प्यार-मोहब्बत करने का यह नतीजा मिला है कि आज पुलिस मेरे घर आई है? मेरे घर!"
 
हम सबकी उनके प्रति सहानुभूति थी मगर उनकी भावनाओं को सही ठहराना हमारी समझ से परे था। 

मामी, पूरा नाम– मामी प्रधान। मेरी माँ की सुपर स्टायलिश, सुंदर नौकरानी, जो माँ की तेल-मालिश करती थी, घर के हर कामों में हाथ बँटाती थी जैसे खाना पकाने में, गप-शप करने में, बागवानी आदि सभी कार्यों में। आज माँ उसे कोस रही थी। 
 
मगर उस कहानी की भी एक पृष्ठभूमि है। 
 
माँ के नौकरानी के रूप में मामी की माँ के आने के पूर्व या उस घटना के बाद, वेतन बढ़ाने के बाद भी, दोनों माँ-बेटी ने मेरी माँ को बहुत परेशान किया था (या कम से कम वह ऐसा सोचती थी कि उन्होंने उसे बहुत तंग किया था), जिसकी वज़ह से दिन-ब-दिन उनका वज़न घटता जा रहा था। सुकोमा हमारी पहली नौकरानी थी, बहुत ही अच्छी महिला, हम सभी के प्रति उसका अगाध समर्पण और विशेषकर मेरी छोटी बहिन, जो अभी अमेरिका में रहती है, उसके प्रति तो इतनी समर्पणशील थी कि अगर मेरी बहिन उसके प्लेट में पेशाब भी कर देती थी तो वह उसे साफ़ कर चावल खा लेती थी, उस थाली के चावल को कभी नहीं फेंकती थी, इस डर से कि कहीं बच्ची बीमार न पड़ जाए। मेरी छोटी बहिन अक़्सर ऐसा करती थी और हम लोग उस पर खूब हँसते थे। मज़ाक में कहते थे, " देखो वह गँवार औरत! अब इसे साफ़ करेगी और फिर से खाएगी।"

माँ कहती थी, "सुकोमा, ऐसा मत करो। इसे फेंक दो। दूसरी थाली में खाने के लिए ताज़े चावल ले लो।"

"माजी, तुम अपनी बेटी की इतनी बड़ी दुश्मन कैसे हो सकती हो? तुम चाहती हो कि वह बीमार पड़ जाए?"
 
अवश्य, वह उसे अपनी बेटी मानती थी। मगर सही बात यह थी कि उसके तीन बेटियाँ और अपना एक बेटा था। शकुंतला, शैला, कोइली और उसके बेटे का नाम मुझे याद नहीं आ रहा है। कोइली से उसे ख़ास लगाव था, शायद वह उसे इतना ही प्यार करती थी जितना मेरी बहिन से। इस वज़ह से दो बार गर्भपात के बाद तीसरी बार कोइली गर्भवती हुई तो सुकोमा ने हमारे घर में काम करना छोड़ दिया। 
 
मेरी माँ क्रोध से भुनभुना रही थी- ऐ, टू, सुकोमा?

"कोइली को यहाँ बुला लो, तुम काम छोड़कर वहाँ क्यों जाओगी? मैं दूसरी नौकरानी रख दूँगी तो तुम्हें इतने पैसे, खाना, साड़ी कौन देगा? तुम्हारा दामाद?"

माँ सही कह रही थी। दूसरे शब्दों में, वह अपनी नौकरानियों को फुसलाती थी। वह स्कूल में शिक्षिका थी, इसलिए वह पूरी तरह से उन पर निर्भर करती थी और नौकरानियाँ ही सही मायने में हमारी उसकी गृह-निर्माता थी। आख़िरकार सुकोमा काम छोड़ कर चली गई। हम लोग माँ को यह कहकर साँत्वना देते थे कि वह हमारे परिवार की सदस्य नहीं थी, बेहतर यही रहेगा कि उसे भूल जाए। हमें और माँ को उसका गोदा हुआ चेहरा याद आता था, टेढ़ी-मेढ़ी रेखाओं वाला और हमारे चेहरों पर उसके द्वारा किया जाने वाला चुंबन, जिससे तबले जैसा ज़ोरदार संगीत निकलता था। उसके चेहरे पर गोदने का कारण यह भी था कि दूसरे लोग उसके सुंदर चेहरे के प्रति आकृष्ट न हो। 

सुकोमा का अध्याय समाप्त हो गया। 

उसके बाद आई ज़रीना। 

वह मुसलमान बस्ती की स्मार्ट लड़की थी। उसके पाँच भाई थे, पाँचों कसाई। उसकी उम्र बीस साल होगी, काली चमड़ी वाली पहलवान लड़की। वह बागवानी के साथ-साथ रसोई का काम भी देखती थी, बिस्तर के नीचे की सफ़ाई और यहाँ तक कि घर के कोने-कोने तक उसकी पहुँच थी, जहाँ सुकोमा के बुज़ुर्ग हाथ नहीं पहुँच पाते थे। तत्काल प्रभाव से माँ ख़ुश थी, मगर हम नहीं। क्योंकि पहले दिन से ही उसकी निगाहें हमारी चूड़ियों, बिंदी, लिपस्टिक और मेकअप किटों पर थी। जब हम बाहर जाने के लिए तैयार होते थे तो वह हमारी तरफ़ घूरती थी और आहें भरकर उन सामानों की क़ीमतें पूछती थी। हम सोचते थे कि इतने महँगे सामान वह कभी भी नहीं ख़रीद पाएगी। 

मगर ऐसा नहीं था। कई महीनों बाद हमें उसके प्रभाव का पता चला, जब पहली बार सुबह-सुबह पुलिस हमारे घर आई थी। ज़रीना माँ के स्कूल बैग, जिसे वह अपना वैनिटी बैग कहती थी, से पैसा चुराने लगी थी। जब भी उसे पूछा जाता तो वह उत्तर देती थी, "क्या मैं चोर दिखती हूँ? अगर मैं दिखती भी हूँ तो चोर नहीं हूँ। मेरे भाई जान मेरे लिए तुम्हारे सामानों से से भी ज़्यादा सुंदर सामान लाते हैं। समझे?"

ज़रीना बहुत बदमाश लड़की थी। मेरी सबसे छोटी दूधमुँही बहिन, कुछ महीनों की रही होगी, हर सुबह अख़बार पर पोट्टी करती थी। माँ ज़रीना को उस अख़बार को लपेटकर गली से दूर किनारे पर बने बड़े गड्ढे में फेंकने के लिए कहती थी। मगर ज़रीना मैडम की कुछ और ही योजना होती थी। हमारे घर के पास जगा भैया की परचूनी सामानों की दुकान सटी हुई थी और वहाँ सुबह से शाम लोगों का ताँता लगा रहता था। जगा भैया दाल, गुड़ाखू, चीनी और नमक आदि के बहुत सुंदर पैकेट बनाते थे और उसे जूट के धागों से अच्छी तरह बाँध देते थे। यह पैकेट बहुत लुभावने होते थे। ज़रीना जगा भैया से माँ के नाम पर कुछ जूट के धागे माँग कर ले आई। जगा भैया का हमारे घर परिवार से अच्छा संबंध था क्योंकि उसके पास पिताजी के नाम की एक छोटी डायरी खोली हुई थी और हम उसकी दुकान से कभी किसी भी समय चॉकलेट, चावल, मिठाई, केक और मूँगफली ले सकते थे। वह डायरी में सामानों के नाम लिखकर उसके सामने क़ीमत बैठा देता था। महीने के अंत में पिताजी उसके बिल चुकता कर देते थे। इसके अलावा, माँ भी उसका सम्मान करती थी क्योंकि कभी-कभी उसे स्कूल जाने में देर होने लगती थी तो ज़रीना पीछे से कहने लगती थी, "माँ, लहसुन ख़त्म हो गई है और दाल भी।"

"ओह! यह लड़की मुझे नहीं छोड़ेगी। हर समय शिकायत करती रहती है और उधर हमारी प्रधान अध्यापिका जुमेलिया राऊत दस बजते ही स्कूल के दरवाज़े पर इंतज़ार करने लगती है। तुम जाओ, जगा भैया से जो चाहो, ले आओ।"

इस प्रकार ज़रीना उससे कुछ दाल, लहसुन और जूट के धागे माँगकर ले आती थी और उन्हीं धागों से वह मेरी छोटी बहिन के पोट्टी को अख़बार में लपेटकर बाँध देती थी और दूसरे अख़बार से सुरक्षा के लिए ढक लेती थी और जगा भैया के उन धागों से प्रोफ़ेशनल तरीक़े से बाँधकर सड़क के बीच में साफ़-सुथरे पैकेट को छोड़ देती थी। कोई यही सोचता था कि जगा भैया की दुकान के किसी ग्राहक का पैकेट सड़क पर ग़लती से गिर गया होगा और चुपके से उसे उठा लेता था। ज़रीना पैकेट को सड़क के बीच में रखकर हमें कहती थी देखने के लिए कि कौन आदमी वह पैकेट उठाता है। हमारे लिए आश्चर्य की बात थी और हँसने की भी। हर दिन कोई न कोई आदमी, ग़लती से गिरा हुआ ग्रॉसरी का पैकेट समझकर उठा ही लेता था। 

हम सभी उसकी स्मार्टनेस से प्रभावित थे। एक बार पण-संक्रांति की शाम को उसने हमारे घर के पिछले दरवाज़े पर ताला नहीं लगाया था ताकि उसके भाइयों को रात में हमारे घर डकैती करने में कोई दिक़्क़त न हो। 

अगली सुबह जब हम उठे तो देखा माँ ज़ोर-ज़ोर से रो रही थी और मेरे पिताजी डकैती के बारे में पुलिस को इत्तला कर रहे थे। हम भाँग मिला शरबत पीकर गहरी नींद सोए हुए थे, तभी ज़रीना के भाई पिछले दरवाज़े को थोड़ा-सा धक्का मारकर हमारे घर में घुस आए और हमें बेहोश करने के लिए कुछ धुआँ छोड़ दिया और पल भर में हमारे घर के सारे सामान जैसे पुराने बर्तन, कपड़े, पैसे, ज़ेवरात, माँ की पूजा-पेटी, पिताजी का पुराना ग्रामोफोन, बेडशीट, संदूक और जो कुछ उनके हाथों में आ सकता था, चोरी कर फ़रार हो गए। 
 
पुलिस ने आस-पास के इलाक़ों की तलाशी ली और केवल मेरे पिताजी का ग्रामोफोन (जो मुझे विरासत में मिलने वाला था) और मेरी माँ की गुरुबारा पेढ़ी (लक्ष्मी की पूजा-पेटी), जिन्हें झील के किनारे फेंका गया था, खोज निकाला। 

माँ कहने लगी, "मूर्ख मुसलमान चोरों ने मेरी देवी लक्ष्मी की पेटी चोरी करने की हिम्मत कैसे की? उसे तो कम से कम सही-सलामत छोड़ देते?” 

माँ-पिताजी राहत की साँस ले रहे थे कि उन्होंने कम से कम हम किसी को नुक़्सान नहीं पहुँचाया। जब लूटमार चल रही थी, तब हम आराम से गहरी नींद में सोए हुए थे। 

इस प्रकार ज़रीना के साम्राज्य का अध्याय भी समाप्त होता है। (बहुत सालों बाद जब मैं अपने पैतृक घर के वार्षिक दौरे पर थी, तब मैंने उसे टाउन में देखा था तो वह मुझसे आँखें बचाकर भाग गई।)

माँ ने दूसरी नौकरानी को खोजने के लिए एक हफ़्ते की छुट्टी ले ली। मेरी दूसरी बहिन को दसवीं बोर्ड की परीक्षा नाइट सूट पहनकर देनी पड़ी, क्योंकि ज़रीना के भाइयों ने उसकी स्कूल यूनिफ़ॉर्म तक नहीं छोड़ी थी। 
 
माँ को एक दुबली-पतली कुरूप ग़रीब महिला, मामी प्रधान की माँ नौकरानी के रूप में मिली। हमेशा उसे या तो बुखार आता था या फिर हमेशा कमर-दर्द होता था। हमेशा शिकायत करने वाली और हमेशा कुछ-न-कुछ माँगने वाली। 
 
जो भी हो, वह हमारे लिए जीवनदाता थी क्योंकि उसके कारण ही माँ स्कूल फिर से जा सकी। माँ ओड़िया स्कूल में एकमात्र हिंदी अध्यापिका थी, इसलिए उसकी हमेशा माँग बनी रहती थी। उसकी कक्षाएँ कोई दूसरा अध्यापक नहीं ले सकता था, इसलिए हम बहुत ख़ुश थे कि हमारी हिंदी कक्षाएँ पूरे सप्ताह खेलकूद की कक्षाओं में तब्दील हो गई थी। और अब माँ के पूरे सप्ताह के बचे हुए पाठ्यक्रम को पूरा कर सभी कक्षाओं का सिलेबस पूरा करना था। उसका मिज़ाज कुछ उखड़ा हुआ था। उसकी ख़ास सहेली थी उर्मिला मौसी, जो उनके साथ वाली थी, हमारी भूगोल की शिक्षिका। उससे शिकायत कर रही थी, "देख रही हो उर्मिला! इन नौकरानियों ने मेरे लिए यह संकट पैदा कर दिया है। मैं उन्हें अच्छा-ख़ासा पैसा देती थी, हर दिन खिलाती-पिलाती थी, उसके बाद भी इतने कृतघ्न!"

एक नौकरी-पेशा वाली महिला के लिए घर और ऑफ़िस के बीच तालमेल बैठाना किसी भागीरथ प्रयास से कम नहीं होता है। उर्मिला मौसी के साथ भी ऐसी ही कुछ दिक़्क़तें थी, मगर उनके केस में ससुराल की समस्याएँ ज़्यादा थी। 

"हाँ, मीरा दीदी, मैं समझ सकती हूँ। मेरी ननद और सास ने तो मेरा जीना हराम कर दिया है। वे पहले एक महीने के लिए आते थे और अब उन्हें आए हुए छह महीने हो गए हैं, जाने का नाम ही नहीं ले रहे हैं। आजकल मैं प्रधानाध्यापिका के चार्ज में भी हूँ और अगले सप्ताह तक मुझे दसवीं कक्षा का सिलेबस पूरा करना है। उनकी परीक्षाएँ सिर पर है। अगले सप्ताह तीन दिन की छुट्टी भी आने वाली है क्योंकि बीजू पटनायक का क़स्बे में दौरा है और हमारी स्कूल के खेल का मैदान उनके हेलिकॉप्टर के लिए हेलीपैड बनेगा।"

"अरे ऐसा है क्या! मेरी लड़कियाँ मुख्यमंत्री को देखकर बहुत ख़ुश होंगी।"

माँ बहुत उत्साहित थी। सोमवार को न तो हमारी कक्षाएँ थीं, न ही कक्षा-कार्य और न ही गृह-कार्य। तीन दिन स्कूल की छुट्टी! बुधवार को मुख्यमंत्री का हमारे क़स्बे में आगमन था और उन्होंने हमारे स्कूल के खेल के मैदान को हेलीपैड बनाकर गौरवान्वित किया है, न कि लड़कों की स्कूल को। हम पिताजी को चिढ़ा रहे थे क्योंकि वह लड़कों के उच्च विद्यालय के अध्यापक थे। बीजू पटनायक की पार्टी के बहुत सारे स्वयंसेवक आए हुए थे, हमारे मैदान को समतल बनाने और साफ़ करने, स्कूल भवन की सजावट करने, छोटे-मोटे गड्ढों को मिट्टी से अस्थायी तौर पर भरने और एक भव्य तंबू गाड़ने के लिए-जहाँ विराजमान होकर मुख्यमंत्री को अपना भाषण देना था। जल्दी ही मैदान में कूड़ा-करकट साफ़ किया जाने लगा, जहाँ हम आँख-मिचौनी खेलते थे, वहाँ खाने-पीने की स्टाल बनने लगी, रस्सियों पर अलग-अलग तरीक़े से रंग-बिरंगी तिकोने काग़ज़ों की सजावट होने लगी, प्रवेश-द्वार पर ताज़े काटे गए केले के पेड़ (अभी तक कच्चे केले उन पर लटक रहे थे) रोपे जाने लगे, मैदान के चारों कोनों में चारों लाउडस्पीकर लगाए जाने लगे। एक विशाल लाल रंग की सिंहासननुमा कुर्सी लाई जा रही थी, जो अक़्सर शादी में दूल्हा-दुल्हन के लिए काम आती है। उसे पंडाल के बीचों-बीच रखा गया महामहिम मुख्यमंत्री के लिए और उसके चारों तरफ़ बिछाई गई नीलकमल प्लास्टिक की कुर्सियाँ– जो द्विध्रुवीय विरोधाभास दर्शा रहीं थीं। हम सभी उत्तेजित थे। माँ ने हमारी नौकरानी की बेटी मामी को भी उस दिन पेड़ों को पानी पिलाने से छुट्टी दे दी थी। मामी हमारे घर में अपना बचपन बीता रही थी जैसे कि वह एक औरत हो और हम घर के बच्चे उसके नारीत्व को बढ़ावा दे रहे थे। उसके पास हमारे नीरस कार्यों की तरह कोई काम नहीं था। अगर किसी दिन घर के काम-काज में उसे देर भी हो जाती थी तो कोई उसे ज़बरदस्ती स्कूल नहीं भेजता था और अगर उसका मूड नहीं हुआ तब भी। उसके पास स्कूल का कोई होमवर्क भी नहीं था, वह रसोई-घर में मन ही मन गुनगुनाती हुई उबले हुए आलू छिलती थी, जबकि हमें शाम को छह से दस बजे तक पढ़ना पड़ता था। 
 
मगर सच में उसका अपना कोई रूटीन नहीं था, उसने अपनी ग़रीबी से समझौता कर लिया था हमारी ज़िंदगी बनाने के लिए। वह माँ के पेड़-पौधों को पानी पिलाती, उनके जूते पॉलिश करती, हमारी यूनिफ़ॉर्म बिस्तर पर रखती, उसकी माँ जो हमारे कपड़े धोती थी– उन्हें सुखाती और बरामदे में झाड़ू-पोंछा लगाती। 
 
मगर वह दिन उसके लिए कुछ अलग ही था। उस दिन हम उसे अपने साथ लेकर दस बजे के आस-पास स्कूल के प्रांगण में पहुँचे, यद्यपि मुख्यमंत्री ग्यारह बजे आने वाले थे। 
 
यद्यपि मामी प्रधान दस वर्षीया थी, मगर स्वाभिमान उसमें कूट-कूट कर भरा हुआ था, कुछ भी ऐसा नहीं करती थी जिससे कि समाज में उसकी इज़्ज़त पर आँच आए कि वह नौकरानी की बेटी है। वह दुबली-पतली, सपाट छाती वाली, कुपोषण का शिकार थी और बड़ी मुश्किल से छह या सात साल की लग रही थी। जितना हो सकता था, वह अच्छा दिखने की कोशिश करती थी। मेरे पुराने कपड़ों में वह हमेशा सुंदर लगती थी। एमसीडी स्कूल में पढ़ते समय वह मेरी क्लासमेट थी। यहाँ तक कि उसके कपड़े भी अच्छे लगते थे, भले ही, दूसरों को पुरानी फ़ैशन क्यों न लगे। वह भीड़ में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए हमेशा प्रयत्न करती थी कि वह दूसरों से किस तरह अलग दिखाई दे और उसमें कुछ हद तक वह सफल भी हो जाती थी। 

फूलबानी ज़िले में उदयगिरी मध्य ओड़िशा का छोटा-सा क़स्बा था। सोया हुआ शहर, जिसका अपना कोई चरित्र नहीं था। मेरे माता-पिता ने अपनी पूरी ज़िंदगी वहाँ गुज़ारी थी, चालीस साल से भी ज़्यादा, बिना किसी निश्चिंत कारण के। पहले तो वे दोनों साथ-साथ रहना चाहते थे, पिताजी लड़कों के उच्च विद्यालय में शिक्षक और माताजी लड़कियों के उच्च विद्यालय में शिक्षिका। दोनों सरकारी विद्यालय। बच्चों को माता-पिता दोनों का प्यार मिल सके। उनकी सेवानिवृत्ति के बाद हमने उनसे किसी दूसरे शहर में जाकर बसने की वकालत की, जहाँ चिकित्सा और उच्च-शिक्षा की सुविधा उपलब्ध हो, मगर वे नहीं माने। अक़्सर कहते थे, "बेटा, फूलबानी का मतलब होता है फूलों की वाणी अर्थात् जहाँ फूल इंसानों से बात करते हैं। चारों तरफ़ हरियाली देख रहे हो और उदयगिरी वह जगह है, जहाँ सूर्य उदय होता है जैसे कोई सूर्यनगरी हो।"
 
कहने के लिए पिताजी के पास बहुत बहाने थे। उन्होंने अपना सारा जीवन दाँतों के दर्द, बुखार, गठिया की पीड़ा के साथ गुज़ारा, बिना किसी चिकित्सीय सुविधा के और अब पूरी तरह से अकेले हैं। उनके बच्चे उनसे दूर हैं नगरों में, महानगरों में। मेरी दो बहिनें तो अमेरिका में है क्योंकि उदयगिरी में रहकर कोई अपना कैरियर बनाने के बारे में सोच ही नहीं सकता है, जब तक कि वह कोई किसान या फिर कोई दुकानदार न हो और ज़्यादा से ज़्यादा स्कूल टीचर। 

उदयगिरी के अधिकांश अधिवासी पहाड़ों में रहते हैं और उनमें से अधिकतर ने न तो ट्रेन देखी होगी और न ही समुद्र तट। हवाई जहाज़ और हेलीकॉप्टर देखना तो दूर की बात हैं! इसलिए उस दिन हम स्कूल के मैदान में इकट्ठे हुए थे अपनी बढ़िया से बढ़िया फ्रॉक पहन कर, पाउडर लगाकर। माँ की इमामी क्रीम भी लगा दी थी, भरसक कोशिश कर रहे थे सुंदर से सुंदर दिखने का। मामी ने भी अपना अच्छी तरह से साज-शृंगार किया था। अपने गाल पर कृत्रिम गोदा हुआ काला मस्सा और होठों पर लाल रंग के अलता लगाने से वह जोकर ज़्यादा दिख रही थी। उसने मेरा पुराना फ्रॉक पहन कर रखा था, जिसे माँ ने उसे पिछले साल उपहार में दिया था। वह उसे ख़ास अवसर पर ही पहनती थी, लोगों का ध्यानाकर्षण करने के लिए। वह भीड़ में आगे जाकर खड़ी हो गई और बिना किसी कारण से इधर-उधर झाँकने लगी। 

हेलीकॉप्टर ठीक ग्यारह बजे नीचे उतरा, जबकि समय की पाबंदी का अनुपालन राजनेताओं के लिए बहुत मुश्किल काम होता है। मगर बीजू बाबू बिल्कुल अलग थे। वह सक्रिय थे और ख़ुशमिज़ाज रहने वाले उदारमना, दिखने में भी उतने ही अच्छे जितने कि ओड़िशा के वर्तमान मुख्यमंत्री उनके पुत्र नवीन पटनायक। बीजू पटनायक का स्थानीय कॉलेज की अच्छी-ख़ासी सजी हुई, इत्र-फूलैल लगी हुई चयनित सुंदरियाँ द्वारा माल्यार्पण किया गया, उन्हें मुख्यमंत्री के साथ हाथ मिलाने का सुअवसर भी प्राप्त हुआ। 

मुख्यमंत्री सीधे मंच पर गए और श्रोताओं को संबोधित करने लगे। उन भाव-भंगिमा देखकर धीरे-धीरे इधर-उधर कानाफूसी होने लगी। बीच में उन्होंने अपने हाथ हिलाते हुए ज़ोर से कहा, " जय हो!"

"जय हो!"

"बीजू बाबू की जय हो!"

"बीजू बाबू जिंदाबाद! ज़िंदाबाद!"

"बीजू बाबू अमर रहे! अमर रहे!" 

"जय हो! जय हो! जय हो!"
 
अचानक हमारी मामी ने ज़मीन पर गिरे हुए राष्ट्रीय ध्वज को उठाया और पार्टी के कार्यकर्ताओं और मुख्यमंत्रियों की ओर देखकर ज़ोर-ज़ोर से भावावेश में आकर उस ध्वज को हिलाने लगी। मैं उसे लोगों का ध्यान हमारी तरफ़ आकर्षित करने के लिए मना कर रही थी, मगर वह मानने को तैयार नहीं थी। वह भन्नाती हुई आवाज़ में चिल्लाने लगी, “बाजू बाजू जय हो!", “बाजू बाजू जय हो!" मेरा मतलब था कि वह उन नारों से सीख कर अपना नया नारा बुलंद कर रही थी। 

बीजू बाबू के पार्टी के किसी कार्यकर्ता की दृष्टि उसकी तरफ़ गई। पाँच-छह साल की दुबली-पतली लड़की, जिसके हाथ मानो किसी चिड़िया के पाँव हो, फटे-पुराने कपड़े पहनकर झंडा हिला रही है, उछल-कूद कर रही है। वह मुख्यमंत्री के कानों में कुछ कहने लगा, “वह बीपीएल यानि ग़रीबी रेखा के नीचे वाली लड़की है, हमारे लिए अख़बारों में लोगों का ध्यान आकर्षण करने वाली मुख्य पंक्ति बन सकती है।”

अचानक मुख्यमंत्री ने असाधारण काम किया। उन्होंने अपने एक कार्यकर्ता को उस लड़की को मंच पर लाने के लिए कहा। कुछ ही क्षण में कार्यकर्ता मामी को उठाकर मुख्यमंत्री के सामने मंच पर उसे हाज़िर किया। बीजू बाबू ने उसके कंधे प्रेमपूर्वक थपथपाए और धीरे से मुस्कुराते हुए पूछने लगे, “क्या नाम है तुम्हारा बेटी?"

"मामी प्रधान,” उसने गर्व से कहा। 

बस इतना ही कहना था कि उन्होंने जनता को संबोधित करना जारी रखा। 

"भाइयों और बहनों! यह हमारा वास्तविक भारत है। यह हमारे ओडिशा का वास्तविक चेहरा है। इस बच्ची की तरफ़ देखो। मामी प्रधान। उसकी आँखों में सपने हैं, भले ही वह ग़रीब है। ग़रीब? ग़रीब कौन है? भगवान कृष्ण ने अपने सुदामा के तंदुल खाए थे और उन्होंने उसका भाग्य बदल दिया था। मामी हमारी सुदामा है। आज हम सभी शपथ खाते हैं कि हम शिक्षित लोगों को हमारे गाँव के सभी मामी प्रधान जैसी लड़कियों की सहायता करनी चाहिए। आप सभी ने अपने अमूल्य वोट हमारी पार्टी को देकर मेरे प्रति अपने अगाध प्रेम और विश्वास प्रकट किया है। अगर आप आगामी आम चुनाव में ऐसा ही प्यार प्रदर्शित करने का वायदा करते हो तो मैं भी आपको विश्वास दिलाता हूँ कि हम ओडिशा के हमारे उन सपनों को साकार करेंगे, जहाँ कोई ग़रीब नहीं होगा। ग़रीबी हटाओ!"

"जय हो! बीजू बाबू की जय हो!"
 
हवा में तालियों की गड़गड़ाहट प्रतिध्वनित होने लगी। मामी प्रधान के पतले हाथों को पकड़े हुए बीजू बाबू के फोटोग्राफ लेने के लिए पत्रकार दौड़ पड़े। वे आपस में कानों में मुस्कराते हुए फुसफुसा रहे थे। 

"भगवान! इस लड़की की तरफ़ देखो, बिल्कुल भी नर्वस नहीं हो रही है। ग़ज़ब का है उसका आत्मविश्वास!"

हमारी पड़ोसी मिनी दीदी मेरी बड़ी बहिन को कह रही थी। 

"हाँ, वह हमेशा से किसी से भी नहीं डरती है। मैं जानती थी कि आज ऐसा ही कुछ करेगी।"

ऐसा भी नहीं था कि मामी मुख्यमंत्री के भाषण का सिर या पूँछ पकड़ पाई। उसका राष्ट्रीय या राज्यीय राजनीति से कोई लेना-देना भी नहीं था, उसकी सारी राजनीति केवल उसका व्यक्तिगत मनोविज्ञान था कि किसी भी तरह से सभी का ध्यान उसकी तरफ़ कैसे आकर्षित किया जाए। मुख्यमंत्री का एक वाक्य उसे बहुत अच्छा लगा, "मामी प्रधान की आँखों में एक सपना है।" 

वास्तव में था भी। उस दिन के बाद वह हमेशा दिन में भी सपने देखने लगी। मुख्यमंत्री जाने के लिए तैयार हो रहे थे, मामी की आँखों में आँसू आ गए। 

"आप मत जाइए, मत जाइए मुझे छोड़कर, मत जाइए मेरे सपनों के सौदागर।" 

वह अपने उस भव्य-पल को खोना नहीं चाहती थी। वह उसका लाइफ़ अचीवमेंट अवार्ड था। 

मामी की माँ उस मैदान में दौड़ कर आई, जब किसी ने उसे वहाँ की सारी घटना बताई। वह उसे गाली देते हुए खींचकर अपने घर ले जाने लगी।

"माँ, मुझे छोड़ दो। मुझे हेलीकॉप्टर के पास जाने दो!"

"तू बदमाश! घर तो चल, देखती हूँ। घर जाकर झाड़ू-पोंछा लगाएगी। इस प्रोग्राम के बाद माजी मुझे घर बुलाएँगी और मुझ पर चिल्लाएगी। उसने तुम्हें छुट्टी दी है, मुझे नहीं। घर के सारे कामकाज बाकी होंगे। आज झाड़ू नहीं कर पाऊँगी, मेरी कमर में दर्द हो रहा है।"

इस प्रकार राजाओं के राजा बीजू बाबू चले गए मामी प्रधान की आँखों में सैंकड़ों महत्वाकांक्षी सपने दिखाकर। दूसरे दिन राज्य के सभी अख़बारों के मुख्य-पृष्ठ पर छपा था, बीजू बाबू का फोटोग्राफ अपने हाथों में एक बीपीएल लड़की का हाथ थामे हुए, ओडिशा के प्रत्येक ग़रीब व्यक्ति को रामराज्य का भविष्य दिखाते हुए। अखबारों की सुर्ख़ियाँ थी, “बीजू बाबू ने ओड़िशा का वास्तविक चेहरा खोजा, बीपीएल लड़की ने इतिहास रचा।"

किसी तरह मामी ने उस दिन अख़बारों की कटिंग इकट्ठा कर ली। आज भी उसकी झोपड़ी की टूटी- फूटी दीवारों पर अख़बारों की कुछ लेमिनेटेड कटिंग लटकती हुई मिलेगी। शाम को माँ को आश्चर्य हो रहा था, उससे बातचीत करते हुए, "अरे मामी, तुम मंच के सामने इस तरह क्यों गई थी? क्या तुम उन लोगों का ध्यान आकर्षित करना चाहती थी ताकि तुम्हें बुला सके? हैं ना? कैसी मूर्ख हो तुम! अगर तुम्हें कुछ हो जाता है तो? तुम्हारी माँ मेरी बेटियों को डाँटती कि तुम्हें उन्होंने अकेला क्यों छोड़ दिया? क्या तुम नहीं जानती कि राजनेता कैसे होते हैं? निस्संदेह बीजू बाबू अच्छे इंसान हैं, मगर पार्टी के कार्यकर्ताओं का क्या भरोसा? अगर किसी ने तुम्हें अगवा कर लिया होता तो? अगर भीड़ में कुचल दी जाती तो? आज के बाद ऐसा कभी मत करना, समझी तुम? कैसी लड़की हो?"

मामी नाराज़ हो गई, अभी भी सुबह की ख़ुमारी नहीं टूटी थी। वह अपनी लंबी दुम हिलाते हुए कमरे के बाहर निकल गई, माँ के ऊपर चिल्लाती हुई, शायद एक-दो गाली भी दी हो। उस दिन से उसने दुम हिलाना बंद कर दिया और अपनी माँ की मासिक तनख्वाह से कुछ पैसे लेना शुरू कर दिया ताकि लाइफ़ ब्वॉय साबुन से अपने बाल धो सके और मेरी तरह की चोटी रख सके। शायद उसने अच्छे से बाल भी कटवा लिए थे। 

अगले दिन दो स्थानीय पत्रकारों ने आग में घी डालने का काम किया। वे हमारे घर माइक लेकर पहुँच गए, मैडम मामी का साक्षात्कार लेने के लिए। 

"मामी जी, तुम्हारी उम्र कितनी होगी?"

"दस साल"

"क्या तुम स्कूल जाती हो?"

"हाँ, बिल्कुल!"

“कल जब ओड़िशा के मुख्यमंत्री ने सारी भीड़ में से तुम्हें पहचाना और कहा कि तुम ओड़िशा का असली चेहरा हो। यह सुनकर तुम्हें कैसा लगा?”

“हाँ, वहाँ उपस्थित सभी लोगों में, मैं सबसे ज़्यादा सुंदर थी। सही कहूँ तो इस पूरे क़स्बे में मैं सबसे ज़्यादा सुंदर हूँ, इसलिए उनका ध्यान मुझ पर गया। किसी दिन में उनके घर जाऊँगी और वही रहूँगी, मैं अवश्य उनके घर जाऊँगी…”
 
मेरी माँ ने उसकी माँ को जाकर उसे चुप कराने के लिए कहा, “तुम्हें कभी पता नहीं चलेगा कि तुम्हारी मूर्ख बेटी क्या अनर्गल बके जा रही है? उसे जाकर रोको और बरामदे में झाड़ू-पोछा लगाने के लिए कहो। ये सारे पत्रकार यहाँ पर तमाशा कर रहे हैं। उनका और कोई काम-धंधा नहीं है। राजनेता लोग चले गए, अब पाँच साल के बाद ही आएँगे। पता नहीं, आप सभी लोग इतने जल्दी भावुक क्यों हो जाते हो? हमने सब-कुछ देखा है।”

मगर मामी एक ही रात में सेलिब्रिटी बन गई या कम से कम वह ऐसा सोच रही थी। और फिर मीडिया का ध्यान, अख़बारों के फोटोग्राफ। 

“मामी जी, तुम कैसा अनुभव कर रही हो? कैसा लग रहा है तुम्हें? कैसा?” 

देखते-देखते उसकी सारी काया रूपांतरित हो गई एक कुरूप कैटरपिलर से सुंदर तितली में। एक बदसूरत बतख बीजू बाबू की जादुई छड़ी से बन गई, एक सुंदर आकर्षक राजकुमारी। वह अब अपने आपको समाज की आभिजात्य महिला समझने लगे, न की हमारे घर की नौकरानी मात्र। उसे हवाई पंख लगना शुरू हो गए। और वह मेरे पुराने कपड़े नहीं पहनती थी, इसलिए उसकी माँ कभी-कभी भी उसे चपत भी जड़ देती थी। रोते हुए वह कहती थी, “अरे माँ! जितना मारना है मुझे मारो, डाँटना है डाँटो, मगर याद रखना एक दिन तुम्हें मुझसे मिलने के लिए अपॉइंटमेंट लेना पड़ेगा और उस समय मेरे पास तुम्हारे लिए समय नहीं होगा, तुमसे मिलने के लिए।"

इस तरह नई-नई सेलिब्रिटी बनने के कारण उसने शाम को हमारे साथ बैठकर पढ़ना भी बंद कर दिया। पिताजी ने माँ को हमेशा यह कहा कि मामी की माँ और मामी दिन के समय उसका काम करें, मगर शाम को छह बजे से नौ बजे तक मामी को पढ़ने के लिए बैठना होगा, जब तक कि पिताजी हमें हमारे नए सूर्य किरण कलर टीवी पर दूरदर्शन देखने की इजाजत नहीं दे देते। मामी पढ़ाई के समय या तो सपने देखती या फिर ऊँघती थी और टीवी देखने के समय उत्सुकता से इंतज़ार करती थी बड़े नगरों की लड़कियों के मेकअप और हेयर स्टाइल देखने के लिए। वह ऐसी हेयर स्टाइल अपने पर इस्तेमाल करती थी। मगर उसकी हर नई हेयर स्टाइल किसी न किसी विपत्ति के साथ ही ख़त्म होती थी। 

ऐसा ही हुआ, उसकी दसवीं बोर्ड की परीक्षा बर्बाद हो गई, जैसी उम्मीद थी। वह फेल हो गई और फिर कभी परीक्षा में नहीं बैठ पाई। मैं पूरे ज़िले में अव्वल नंबर पर आई, मेरा फोटोग्राफ और इंटरव्यू अख़बारों में छपा, छोटे क़स्बे की लड़की दसवीं बोर्ड की परीक्षा में टॉपर रही। 

मामी को उसकी विफलता का कोई ग़म नहीं था। जब हर कोई अख़बारों में मेरे फोटोग्राफ की तरफ़ देखता तो वह कहती थी, "अख़बार में फोटो आने से कौनसी बड़ी बात हो गई? एक बार तो? पाँच साल पहले सभी अख़बारों में मेरी भी चर्चा हुई थी। इसमें कौनसी बड़ी बात है?"

उसे अपने सपनों की दुनिया में खो जाना अच्छा लगता था। मामी के सपने किसी इंसान के सपनों की चिड़िया की तरह थे, जिसने उस बन चिड़िया के लिए सपनों का साम्राज्य खोल देने का वायदा किया हो। फड़फड़ाते हुए पंखों के भार के कारण उसका मूड प्रेम में डूबी महिला की तरह मृदु हो गया था। 

हाँ, मामी पंद्रह साल की उम्र में प्रेम में पड़ गई थी। हमारे पड़ोस के बकरे जैसी आँखों वाला लड़का उसे अपने सपनों के राजकुमार की तरह लगने लगा था। 

"मामी जी, मेरी प्रियतमा, मेरी मधुरिमा! कभी ओड़िशा के मुख्यमंत्री तुम्हें प्यार करते थे। अगर तुम मेरे दिल की रानी बनने के लिए तैयार हो तो मैं तुम्हारे लिए लिपस्टिक, पाउडर और यहाँ तक कि सिलाई मशीन और हाथ की घड़ी ख़रीदकर दूँगा। मैं तुम्हारे अंदरुनी कपड़े भी धो लूँगा, मैं नहीं चाहता कि जिन दोनों हाथों को मुख्यमंत्री ने थामा था, वह ऐसा काम करें। तुम्हें ज़मीन पर पाँव रखने की भी ज़रूरत नहीं पड़ेगी और हम दोनों हिंदी फ़िल्मों के राहुल और रिया की तरह एक साथ रहेंगे।"

मैडम मामी प्रभावित हो गई। सोई हुई घड़ी नहीं जागी। समय रुक गया था। हम सभी भी दुनियादारी के चक्कर में फँस गए थे, इधर मामी को उसकी माँ की समय गुज़ारने की इच्छा निरर्थक लगने लगी थी जैसे भगवान कृष्ण तेज़ बारिश से दुनिया के कुछ हिस्सों को पानी में डुबा रहे हो और कुछ हिस्सों को शुष्क छोड़ रहे हो। वह अपनी माँ से कहती थी, "अरे माँ, तुम उनका घर क्यों नहीं छोड़ देती और दूसरी जगह काम करती, जहाँ ज़्यादा पैसे कमाने को मिलते हैं?"

"हे भगवान! कौन समझाए उस लड़की को, कि तुम नौकरानी की बेटी हो और ख़ुद एक नौकरानी हो।"

अगर मामी ने हमारा घर सालों पहले हुई इन अजीबो-ग़रीब घटनाओं के बाद छोड़ दिया होता तो वह आरामतलबी ज़िंदगी की जंग का उत्साह खो चुकी होती। मगर वह हमारे घर में पल रही थी और हमारी नई-नई उपलब्धियों की साक्षी बनती जा रही थी। एक तरह से हम उसका ‘अल्टर इगो’ थे। मेरी सबसे बड़ी बहिन का अच्छे शहर में अच्छा ख़ासा जॉब लग गया था। दूसरी बहिन की भी सरकारी स्कूल में नौकरी लग गई थी और तीसरी बहिन ऋतु बेरी की तरह फ़ैशन डिज़ाइनर बनने की महत्वाकांक्षा लिए कठोर संघर्ष कर रही थी। मैं भी पढ़ने में तेज़-तर्रार थी और हर क़दम पर मुझे भी सफलता मिल रही थी। हमारी मामी ने कभी नहीं सोचा कि समाज में हमारी तुलना में उसका एकाध इंच भी कम सम्मान है, जबकि उसने दसवीं कक्षा तक पास नहीं की थी। तो क्या हुआ? वह अपने आप को सेलिब्रिटी मानती थी। आख़िरकर उसके साथ राज्य के मुख्यमंत्री का खिंचवाया हुआ फोटोग्राफ जो था। 

 उसकी माँ मेरी माँ के सामने हमेशा अपनी भड़ास निकालती थी यह कहकर, "देखिए माजी, इस लड़की को हर महीने पहनने के लिए नया सूट चाहिए। वह काम करना नहीं चाहती है और नहीं मेरे चचेरे भाई के लड़के से शादी करना चाहती हैं, जो न्यू बस स्टैंड ढाबा में रसोइए का काम करता है। वह सोचती है किसी दिन उसकी किसी राजकुमार के साथ शादी होगी। बताइए, मुझे माजी या तो मेरी तनखा बढ़ा दीजिए या फिर मैं कोई दूसरा घर खोजूँगी।"

कहावत है- जिसके पाँव न फटी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई। माँ के लिए इशारा ही काफ़ी था, क्योंकि विगत कुछ सालों में उसका मामी के प्रति मोह बढ़ गया था। वह उससे ख़ूब ख़ुश रहती थी। जब-तब मामी उसके लिए ज़र्दा-पान ले आती थी। उसकी पीठ, सिर और पाँव की मालिश करती थी। टीवी पर खाना बनाने के शो देखकर रसोई में व्यंजन बनाती थी। क़स्बे में होने वाली हर घटना को वहाँ से कहती थी और यह कहकर कि वह अपने स्कूल कि सभी अध्यापिकाओं में सबसे सुंदर है। माँ यह सुनकर फूलकर कुप्पा हो जाती थी। 

इधर माँ की उम्र बढ़ रही थी। सबसे बड़ी बहिन की शादी हो गई थी। दूसरी और तीसरी बहिन अपने नए-नए जॉब में व्यस्त हो गई थी। मैं हॉस्टल में थी और मेरी छोटी बहिन घर से कॉलेज, कॉलेज से ट्यूशन और ट्यूशन से घर जाती थी। माँ और उसके सामानों की देख-रेख के लिए हमारे पास समय नहीं था, मगर मामी तो हमेशा उसके पास ही थी। उसके लिए हर प्रकार का काम करने में तैयार रहती थी और वह अपने दाँत निपोर देती थी, माँ के डाँटने के बाद भी। 

माँ उसे छोड़ना नहीं चाहती थी। मामी की माँ की वार्षिक वेतन वृद्धि, धीरे-धीरे छह महीनों में, फिर बाद में तीन महीनों में होने लगी। मामी को माँ की चेहरे की बची-खुची क्रीम, चप्पल, साड़ी (साड़ी को फाड़ कर वह अपना सूट बनाती थी) और बहुत कुछ उसे मिल जाता था। 

माँ को ठगना तो मामी के बाएँ हाथ का खेल था। जब माँ स्कूल में रहती थी और घर वाले बाहर, तब अपने बॉयफ़्रेंड से किचन गार्डन अथवा लांज में मिलती थी। उन्हें हमारे किचन से लाकर चाय बिस्किट खिलाती थी, जैसे यह घर उसका अपना हो, वह हमारे ड्रेसिंग टेबल और अलमीरा से कुछ भी चीज़ उठा लेती थी। अगर हम उस पर चिल्लाते थे तो माँ उसका पक्ष लेती थी, यह कहकर, "अपने लिए नया सामान ख़रीद लेना। तुम उस पर क्यों चिल्ला रही हो? बेचारी, कितना मदद करती है वह हमारी?"
 
जबकि सच यह था कि हमारा घर मामी की सब ज़रूरतों को पूरा करता था। 

मेरी तीसरी और सबसे छोटी बहिन बहुत सुंदर थी, इसलिए हमारे बंगले के सामने सड़क पर कई रोमियों इधर-उधर घूमते हुए नज़र आते थे। मगर हम सब इतने व्यस्त रहते थे कि हमारा उनकी तरफ़ ध्यान ही नहीं जाता था। मामी हमेशा उनकी तरफ़ देखकर मुस्कुराती थी कहते हुए, “हाय! कैसे हो?”, जब हम उसकी तरफ़ नहीं देखते थे। जैसे-तैसे वह भी बड़ी हो रही थी, चेहरे पर मुँहासे फूटने से बने निशान, तेल नहीं लगाने से (जैसा कि माँ कहती थी) बालों का झड़ना आदि शुरू हो गया था। और वह अपने सुंदर-सलोने राजकुमार का इंतज़ार नहीं कर सकी। उसके सारे बॉयफ्रेंड नई हरीतिमा देखकर उसे छोड़ चुके थे। वह अकेली थी और निराश भी। उसकी माँ काफ़ी बुज़ुर्ग हो गई थी, काम नहीं कर पा रही थी। 

एक दिन उसकी शादी हो गई, वास्तव में वह भाग गई थी, अपने पहले प्रेमी के साथ, जिसने उसे शादी का प्रस्ताव दिया था। वह लड़का कौन था? या कोई बूढ़ा आदमी? एक बार किसी लड़की की शादी हो जाने पर यह बिल्कुल भी मायने नहीं रखता है। लेकिन फिर भी, वह अपने अतीत के सपनों को अपनी आँखों में ज़िंदा रखने में कामयाब रही और अपने पति के घर में वर्षों पहले ली गई ऐतिहासिक तस्वीर को लटकाने के लिए जगह मिल गई। हालाँकि वह जानती थी कि उसके बड़े सपने उस झुग्गी-झोपड़ी के छोटे से घर के लायक़ नहीं थे, जहाँ उसका पति उसे लाया था, फिर भी वे जीवित थे।

माँ परेशान थी, जैसा पूर्वानुमान था, बिना उसकी चापलूसी सुन वह कैसे रह पाती! 

शादी के पहले दिन ही मामी गर्भवती हो गईं और बाद में हर साल ऐसा ही हो रहा था। बहुत ही कम समय में वह घर के कामकाज जैसे अपने चार बच्चों और अपने पति के लिए खाना पकाना, सरकारी क्वार्टरों में रह रहे लोगों के कपड़े धोना आदि करते हुए सपने को पोषण देना सीख गई थी। अभी भी उसके अवचेतन में उसके खोए हुए सपनों के टूटे हुए टुकड़े मौजूद थे, जो हर समय उसके दिमाग़ में घूमते रहते थे। समय के साथ उसके चेहरे पर मुहाँसे के गड्ढे भी साफ़ दिखाई देने लगे। अपनी हरीतिमा का सौंदर्य बिखेरते हुए अनेक बसंत आए और चले गए। 

वैसे भी वह कभी नहीं भूल पाती थी कि सड़े हुए गद्दे पर, फटे हुए कपड़ों में किसी आदमी के साथ सोने की तुलना में उसे कुछ बेहतर कार्य करना चाहिए, क्योंकि बच्चों का मैला साफ़ करने की तुलना में जीवन में बहुत कुछ बाक़ी है। 

"ओह, मेरे राजकुमार! मेरे लिए आप ख़ुद नहीं आ कर किसी नौकर को भेज दिया, क्योंकि मैं किसी नौकरानी की बेटी हूँ? क्या तुम भूल गए कि तुमने मुझे एक दिन स्पर्श किया था? आप भले ही ख़ुद भूल जाओ, परंतु यह मत सोचो कि मैं भूल जाऊँगी।" 

खोज अभी भी जारी थी। 

एक सुबह मामी ने अपने चार बच्चों और पति की झोपड़ी को छोड़कर ओड़िशा की राजधानी भुवनेश्वर, जहाँ उसका राजकुमार रहता था, वहाँ के लिए पहली बस पकड़ी। उसके राजकुमार ने अहिल्या का स्पर्श किया था और पत्थर के उस टुकड़े से उसे औरत बनाया था। 

उसके दिल में उसका नाम बसा हुआ था। शायद ही वह जानती होगी कि शासन बदल चुका था, नई सरकार राज्य पर प्रशासन करने लगी थी और उसके राजकुमार बहुत पहले ही परलोक सिधार गए थे, अपने पुत्र को विपक्ष दल का मुखिया बना कर। 

 वह बस से उतरी और मुख्यमंत्री आवास जाने के लिए रिक्शेवाले से पूछने लगी। रिक्शेवाले ने पूछा, 
"क्यों? मुख्यमंत्री आवास में तुम्हारा क्या काम है?"

"अरे! वह मुझे अच्छी तरह जानते हैं। सच में, पूरा ओड़िशा जानता है कि मैं उनके कितने करीब थी। तुम नहीं जानते हो? तुम कहाँ रहते हो? तुम इस तरह क्यों चिल्ला रहे हो मुझ पर? तुम नहीं जानते कि मैं कौन हूँ?"

“मैं कैसे जानूँगा कि तुम कौन हो? ऐश्वर्या राय?” 

"यह तस्वीर देखो। मैं उनके साथ हूँ। मैं उनके घर जाकर रहूँगी। मैं उनके बेटे से शादी करूँगी। मुख्यमंत्री का बेटा, समझे? तब तुम आकर मुझसे मदद माँगोगे। अब मुझे उनके घर ले जाओ, जल्दी से।"

 रिक्शे वाले ने वह तस्वीर देखी। अठाहरवीं सदी की तरह दिख रही थी किसी राजनेता की धुंधली-सी तस्वीर, किसी भिखारन का हाथ पकड़े हुए और कुछ नहीं। 

वह ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगा। उसका अट्टहास सुनकर उसके सारे दोस्त इकट्ठे हो गए। वह कहने लगा, 
"भाई लोग, देखो ओड़िशा के मुख्यमंत्री की बहू और यह फोटोग्राफ उसके सगाई पर खींचा गया था। हा... हा... हा।"

तभी अचानक किसी ने वह फोटो खींच लिया, जिससे वह दो टुकड़ों में फट गया। यह देख मामी के लिए दुख की कोई सीमा नहीं रही। कहने लगी, "अरे भगवान! तुमने यह क्या कर दिया? अब मुझे वे कैसे पहचानेंगे? तब मैं बहुत छोटी थी, अब मैं क्या करूँगी? मूर्ख! मैं तुम्हें नहीं छोड़ूँगी, तुम्हें मार दूँगी।"

वे लोग हँस रहे थे, उसे चिढ़ा रहे थे और उसकी ज़िंदगी का मज़ाक उड़ा रहे थे, उसका वह फोटो एक-दूसरे की तरफ़ फेंककर। वह असहाय होकर उसे पकड़ने का प्रयास कर रही थी जैसे यही उसकी अंतिम आशा हो-नहीं तो, फिर से उसे गणित के पहाड़े याद करने पड़ेंगे, फिर से उसे वर्णबोध सीखना पड़ेगा।उसके पास और कोई सहारा नहीं था, उसकी उन यादों पर ठंडा पानी गिराने के सिवाय। 

वह अँधेरे गर्त से दूसरी बड़ी विफलता की ओर बढ़ती जा रही थी। तभी किसी रेंडियर ने जैसे उसे धक्का दे दिया हो। वह ग़ुस्से से अचानक अपने कपड़े की थैली में से पत्थर निकालकर उनकी तरफ़ फेंकने लगी। उनमें से एक पत्थर किसी को लग गया, वह लहूलुहान हो गया। यह देखकर वे सभी लोग मिलकर उसे पीटने लगे। कुछ होने से पहले ही वह राजधानी की ट्रकों और यातायात से खचाखच भरी सड़कों पर दौड़ने लगी, चिल्लाते हुए, "मैं तुम सभी लोगों को दिखा दूँगी। तुम लोग नहीं जानते कि मैं कौन हूँ?"

देखते-देखते मामी काले हरे जंगल के अँधेरे में खो गई। उस जगह के दूसरी तरफ़ जहाँ हमारी तरफ़ से सामान्य आदमी रहते थे। शायद वह अनेक धाराओं के पानी के भीतर से गुज़र रही थी। पता नहीं क्यों, वह बार-बार हँस रही थी और बीच-बीच में रो रही थी। 

शाश्वत स्वप्नदर्शी मामी प्रधान निर्वात में गहरा रहे अँधेरे के भीतर घुसी जा रही थी। उसके बाद मामी कभी दिखाई नहीं दी। एक सप्ताह तक अपनी पत्नी को तलाशने के बाद उसके पति ने स्थानीय पुलिस में प्राथमिकी दर्ज कराई। मामी की माँ काफ़ी बूढ़ी हो चुकी थी, उसकी आँखें कमज़ोर हो गई थीं, उसे दिखाई नहीं दे रहा था। वह अपने झोपड़ी के एक कोने में पड़ी हुई थी, जहाँ उसकी बहू दिन में दो बार पखाल और पानी से भरा लोटा इस प्रकार रख देती थी जैसे वह अवांछित पालतू कुत्तिया हो। 

मेरी माँ ने दूसरी नौकरानी रख दी, हमारी टिंटू-माँ, पहले की तरह और मेरी माँ मामी के बारे में कुछ नहीं बोलती थी, क्योंकि पुलिस जब मामी के बारे में पूछने के लिए हमारे घर आई, तब से वह बहुत दुखी थी। 

इस बारे में जितना ज़्यादा मैं सोचती हूँ, उतनी ज़्यादा पागल होती जा रही हूँ। मैंने इससे पहले कभी भी नहीं सोचा था कि जंगली धारा और लड़की एक जैसी हो सकती है? क्या चिड़िया के पंखों की उड़ान और किसी औरत के सपनों की उड़ान भी एक जैसी हो सकती है? आज पहली बार मुझे अपने जीवन में इस बात की अनुभूति हुई। 

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