15-11-2014

घर की चिड़ियाँ और हम

भुवनेश्वरी पाण्डे

आज फिर चावल के दाने घर के आगे वाले और पीछे वाले लॉन में बड़ी देर तक पड़े रह गये। चिड़ियाँ खाने नहीं आईं। दो माह पहले पाँच बजे दाने डाले और कुछ ही समय में २०-२५ चिड़ियाँ खाने-पीने और चहकने लगती थीं। उनके कलरव मन को उत्साह देते हैं, नवजीवन के प्रवाह को भी सत्य करते हैं। घर के आगे चिड़ियाँ दाने खातीं व अपने नवजात बच्चों के मुँह में घुसेड़ती बड़ी भली लगती हैं। सतर्क वो इतनी कि हम ज़रा सा झूले में माला करते-करते ज़रा सी करवट भी लें तो फुर्र से उड़कर घर की छत पर या ऊँचे पेड़ पर चली जातीं। वे पक्षी हैं, उनके पास ईश्वर ने उड़ने का विशेष गुण दिया है। साथ ही वे बँधी भी तो नहीं हैं। उनकी हमारी क्या तुलना? वे कितनी स्वतन्त्र हैं। वे कर्म.. पूर्ण कर्म में विश्वास रखती हैं। बच्चे पाले और आगे बढ़ गईं। आज यहाँ, कल वहाँ और फिर जहाँ भी गर्मी-सर्दी उनकी इच्छा अनुरूप हुई; चली गईं। हम लोगों से भिन्न, घर में गड़े बैठे हैं, उसी में फँसे बैठे हैं। कहीं भी जाओ मन नहीं लगेगा, घर पर पहुँच कर ही शान्ति मिलती है। बच्चों के पीछे जान दिये जा रहे हैं, कब होंगे, कब आएँगे, आदि की आस-निरास में बँधे।

कभी-कभी तो लगता है जैसे कोई-कोई गौरैया गर्दन घुमा-घुमा कर हमें पहचानने का प्रयास भी करती लगती है। उसे हम अपने जीवन की शैली कहाँ बता सकते हैं। वे तो स्वतन्त्र हैं परन्तु हम जो इस मानव शरीर में बैठे हैं, कितने बन्धनों में हैं। घर-द्वार के बन्धन, संसार के, आध्यात्म उत्थान के बन्धन, अतिथि सत्कार के बन्धन, और ऊपर से अपने आप पर स्वयं लगाये अनेक अंकुश और बन्धन। क्या करें समय का भी तो एक बन्धन है। फिर भय हैं अनेक - जो पीछा नहीं छोड़ते। स्थान छोड़कर यहाँ आये तो चाहे अच्छा लगा हो ना लगा हो, बसना तो पड़ा ही ना। स्थितियों, परिस्थितियों से समझौते करते-करते जाने कितने वर्ष बीत गये इस बीच। परिवर्तन इतने हुये, क्योंकि काल तो किसी की प्रतीक्षा करता नहीं, अपनी शक्ति से सबको आगे ढकेलता रहता है। सोई हम भी ढकिलते हुये यहाँ तक पहुँच गये। यूँ तो शान्ति है, सुबह माला, पूजा का समय और तुम्हें दाना डालने का समय, उगते सूर्य देव के दर्शन का समय, आकाश के बदलते रंग देखने का समय। इतने वर्षों में नाती-पोतों के लिए उनकी रुचि का भोजन बना पाने का समय, उनके साथ पार्क जाकर झूला झूलने और झूलाने का समय, राह पर चलते-चलते सड़क के किनारे से ईंट-पत्थर.. छोटे-छोटे... अपनी हथेलियों में ले पाते देखने का समय, उड़ती चिड़ियों व तितलियों के पीछे उनको भागते देखने का समय, घर पर झूले पर बैठकर कुछ खाने-गिराने का समय, लोरी सी गा कर माथे पर भवों पर हाथ फेर कर उनकी छोटी-छोटी नींदों को बुलाने का समय – सब मिलता है।

शायद यही जीवन भी है, हर पल नये को जीना। पिछला याद तो आता है परन्तु सदा सुख ही देगा, यह आवश्यक भी तो नहीं। और जैसे सुख-दुःख चोटी की तरह गुथे हैं, जीवन भी यों ही गुथा सा कभी भाता है, कभी मन उचाट कर जाता है। किन्तु तुम सब अब कहाँ चली गई हो? घर के आगे-पीछे क्यों चावल के दाने देर तक पड़े रहते हैं? हम भीतर चले जाते हैं, थोड़ी शीत आती लग रही है। इस दफ़े ठीक से गर्मी पड़ी ही नहीं। यों तो ठीक हुआ किन्तु उतने गमगमा कर फूल भी तो नहीं खिले। ये ऋतु काफी छोटी हो कर निकल गई। कहीं-कहीं तो अभी से पत्तों के रंगों में परिवर्तन आ गया जो अक्टूबर के अन्त में आता। चलो खैर तुम्हारे बच्चे तो पल गये। अब तुम उनके साथ नई जगह में उड़ कर जा चुकी हो। पूरी सर्दी के मौसम में तुम लोगों की याद आयेगी। हम बड़े दिल व मन से तुम सबका रास्ता देखेंगे। तुम्हारे पहले चरण तुम्हारी पहली चहक का इन्तज़ार रहेगा। हाँ, अगर हम स्वस्थ रहे तो! क्योंकि कोई नहीं जानता कल क्या होगा? खैर, तुम जहाँ भी होगी, जीवन का संचार कर रही होगी। यही तो है तुम्हारी सम्पूर्ण पूजा जो मौन व पवित्र है। हमें भी मौन रह कर अपने अस्तित्व से ईश्वर का ध्यान व धन्यवाद करना चाहिये – चलो फिर प्रतीक्षा में तुम्हारी सहेली भानुजा देवीदासी।


 

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