सीख टोपी की

बबिता कुमावत (अंक: 293, मार्च प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

बेटा, सुन लो आज पिता का
अनमोल अनुभव, पक्का तजुर्बा, 
इस दुनिया में सीधे चलना
अक्सर बन जाता है सबसे बड़ा गुनाह। 
 
सीधे-सादे लोग यहाँ
भीड़ में सबसे पहले कटते हैं, 
जो टोपी पहनाना जान लें
वही आगे सबसे तेज़ बढ़ते हैं। 
 
मुस्कान ओढ़ो, वचन मधुर रखो, 
मन में कुछ और, मुख पर कुछ और, 
सच की गठरी घर में छोड़ो, 
बाज़ार में बिकता है बस चालाकी का शोर। 
 
हर वादा लिखो पानी पर, 
हर रिश्ता तोलो लाभ-हानि में, 
जो भोला बनकर बैठा है
उसे बिठाओ अपनी कहानी में। 
 
जब कोई पूछे—“सच क्या है?” 
तो सच को थोड़ा मोड़ देना, 
टोपी उसकी आँखों पर रखकर
ख़ुद को आगे जोड़ देना। 
 
नेता बनो, व्यापारी बनो, 
या बन जाओ ज्ञानी कोई, 
जो टोपी पहनाना सीख गया
वही कहलाया सबसे होशियार सोई। 
 
पर सुन बेटा, एक बात कहूँ
जो अनुभव की अंतिम सीख है
हर टोपी जो तुम पहनाओगे
कभी न कभी ख़ुद के सिर पर भी ठीक है। 
 
क्योंकि इस दुनिया के मेले में
हिसाब बहुत पुराना है, 
जो आज पहनाता है टोपी
कल उसी का सिर निशाना है। 

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