सभ्यता डूब रही है
बबिता कुमावत
दियों के किनारे बैठी
पृथ्वी रो रही है
वन कट रहे हैं
पहाड़ टूट रहे हैं
नदियाँ सूख रही हैं
हिमखंड पिघल रहे हैं
ऋतुएँ मर रही हैं . . .
संवेदनाएँ मर रही हैं
नागरिको!
मनुष्य हार रहा है
डूब रही है करुणा
विश्वास डूब रहा है
सम्बन्ध डूब रहे हैं
भाषाएँ डूब रही हैं
लोकगीत डूब रहे हैं
भविष्य के बच्चों की हँसी
कारख़ानों के धुएँ में घुट रही है . . .
नगरों में
काँच की इमारतों के भीतर
अकेलापन चीख़ रहा है
गाँवों की पगडंडियों पर
भूख नंगे पाँव चल रही है
विद्यालयों के बाहर
अपने सपनों को बेच रहे हैं बच्चे
अस्पतालों की क़तारों में
मृत्यु टिकट बाँट रही है . . .
विज्ञान के हाथों में
विनाश के औज़ार हैं
राजनीति के मुख पर
झूठ का उत्सव है
धर्म के बाज़ारों में
ईश्वर नीलाम हो रहा है,
सभाएँ मौन हैं
संविधान थका हुआ है
न्यायालयों की सीढ़ियों पर
सत्य घायल पड़ा है . . .
समुद्रों में
तेल के साथ बह रही हैं मछलियाँ
आकाश में
धुएँ के साथ उड़ रही हैं चिड़ियाँ
धरती के सीने पर
बारूद बो रहे हैं शासक,
सीमाओं पर
युवाओं की देह से
राष्ट्रगान लिखा जा रहा है . . .
सब कुछ टूट रहा है
मनुष्यो!
सभ्यता अपने ही हाथों
अपनी क़ब्र खोद रही है।
कब जागेगी हमारी चेतना?
हम कब सीखेंगे
एक दूसरे की आँखों में
मनुष्य को पढ़ना?
कब रोकेंगे
घृणा की मशीनें?
कब बचाएँगे
पृथ्वी की अंतिम हरियाली?
सूरज तप रहा है
नदियाँ रो रही हैं
आकाश बीमार है
हवाएँ जल रही हैं।
1 टिप्पणियाँ
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15 May, 2026 10:14 PM
अति सुन्दर