मन का तूफ़ान
बबिता कुमावत
मन की ख़ामोशी में इक तूफ़ान पलता है,
शब्दों की झिलमिल में भावों का जंगल जलता है।
विवेक का दीपक बुझता है जब,
अंतर का अंधकार स्वयं को निगलता है।
स्मृतियों की परतों में एक चेहरा अनलिखा,
मौन की चादर में लिपटा, समय से भी पुराना।
वो क्षण—जिसने हृदय की नसों में राग भरा,
अब केवल प्रतिध्वनि है—सूना, बेगाना।
आँसू, विचार, और अभिमान का सम्मिलन,
एक तिक्त-मधुर रस—मन का नर्तन।
हर पीड़ा में कविता का जन्म हुआ,
हर क्षति में अर्थ का गर्भ निहित हुआ।
भावनाओं की रेखाएँ जब सीमाएँ तोड़तीं,
तर्क की दीवारें भी शून्य में झूलतीं।
मनुष्य स्वयं अपनी व्याख्या बन जाता,
और जज़्बात—उसका शास्त्र रच डालता।