शतरंज की रानी—दिव्या देशमुख
महेन्द्र तिवारी
घोड़े की टेढ़ी चाल में सीधी सोच समाई,
हर सिपाही में उसकी योजना गहराई।
न राजा डरा, न वज़ीर कुछ कर पाया,
हर जीत में नारी शक्ति की ध्वनि सुनाई।
शब्द न बोले कोई उसने मंच या सभा में,
पर ख़ामोश आँखों में थी गर्जन हर दिशा में।
शतरंज की बिसात पर लिखा गया इतिहास,
हर चाल में था भारत का आत्मविश्वासस।
घड़ी की टिक-टिक में सोच की चिंगारी थी,
हर मोहरे में एक नई रणनीति की तैयारी थी।
जिसने शतरंज को केवल एक खेल समझा,
वो जान न सका बेटी की जंग कबसे जारी थी।
शतरंज की गाथा अब कुछ और कहती है,
जहाँ अब रानी ही सबसे तेज़ चलती है।
दिव्या ने दिखाया, शक्ति सोच में बसती है,
अब हर बिसात पर नारी ही विजयी होती है।
1 टिप्पणियाँ
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4 Aug, 2025 09:17 PM
संपूर्ण सामाजिक व्यवस्था में शतरंज की मोहरें अपनी चाल चलती रहती हैं कभी अप्रत्यक्ष तो कभी प्रत्यक्ष रूप से। विशेष रुप से नारी समाज के लिए भारतीय पुरुष प्रधान समाज में। अच्छी कविता है। मर्म को समझ गए तो अच्छी वरना विशुद्ध रूप से राजनीतिक।