रिश्ता

राजेन्द्र शर्मा (अंक: 241, नवम्बर द्वितीय, 2023 में प्रकाशित)

 

टूटे पंख परिन्दे का फुदकना भी 
उन्हें जीवन भर सालता रहा। 
एक दिन ख़त लिखकर पूछ ही लिया 
राज़-ए-सुकून ज़िन्दगी का॥
जो वफ़ा-ए-मोहब्बत में उनकी 
सदा मुस्कुराता रहा। 
आज बड़ी ही सादगी से 
अलविदा कह गया ज़माने को॥
बारात-ए-जनाज़ा पर दो बूँद 
अश्क भी न छलके आँखों से जिनकी। 
दिल बयार-ए-बसंत में किसी 
हिमखंड सा पिघलकर निचुड़ता रहा॥
बिना कुछ कहे मौन में बस
इतनी सी ही शिकायत थी। 
कमबख़्त दम ही भरता रहा पर 
जान फिर भी न सका॥
जीने की वजह सारी जाते-जाते 
अपने साथ ही ले गया। 
फिर, कुछ ही समय में एक और 
बारात-ए-जनाज़ा उसी रास्ते से गुज़री॥
 
और यूँ उनका रिश्ता मुकम्मल हो गया—
 
किसी की ज़ुबाँ पर ग़म था 
किसी ज़ुबाँ पर हैरत तो 
किसी की ज़ुबाँ पर गुफ़्तगू॥ 

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