नसों में जब बहती है
नवल किशोर कुमारनसों में जब बहती है,
ख़ून के क़तरों के बदले,
बर्फ की एक तरल धार,
तब मनुष्य तज देता है,
जीने का अपना अधिकार।
तन के अनल से,
मन को झुलसा कर,
जब आम आदमी,
टूटती साँसों को रोकने का,
असफल प्रयास करता है,
फिर एक अंतर्ग्नि,
खत्म हो चुकी मोमबत्ती के जैसे,
भक से बुझ जाती है,
और बेजान शरीर,
करता रह जाता चीत्कार।
0 टिप्पणियाँ
कृपया टिप्पणी दें
लेखक की अन्य कृतियाँ
- कविता
-
- अब नहीं देखता ख़्वाब मैं रातों को
- अब भी मेरे हो तुम
- एक नया जोश जगायें हम
- क़िस्मत (नवल किशोर)
- कोशिश (नवल किशोर)
- खंडहर हो चुके अपने अतीत के पिछवाड़े से
- ख़्वाहिशें (नवल किशोर)
- गरीबों का नया साल
- चुनौती
- चूहे
- जीवन का यथार्थ (नवल किशोर)
- जीवन मेरा सजीव है प्रिये
- नसों में जब बहती है
- नागफनी
- बारिश (नवल किशोर कुमार)
- बीती रात के सपने
- बैरी हवा
- मानव (नवल किशोर)
- मैं लेखक हूँ
- मोक्ष का रहस्य
- ये कौन दे रहा है यूँ दस्तक
- रोटी, कपड़ा और मकान
- वक़्त को रोक लो तुम
- शून्यता के राह पर
- सुनहरी धूप (नवल किशोर)
- सूखे पत्ते
- स्वर्ग की तलाश
- हे धर्मराज, मेरी गुहार सुनो
- ललित निबन्ध
- सामाजिक आलेख
- विडियो
-
- ऑडियो
-