चोखेलाल
रेखा राजवंशी
आज जब भारतीय रेस्टॉरेंट में खाने गई तो खाना सर्व करने वाले व्यक्ति को देखकर जाने क्यों चोखेलाल की याद आ गई। कुछ कुछ उसके जैसा चेहरा और क़द-काठी।
चोखेलाल ऐसे ही पतला-दुबला, कृशकाय, साँवले रंग का, छोटे क़द का व्यक्ति, जिसकी आँखों पर महात्मा गाँधी की तरह मोटे काँच का गोल फ़्रेम का चश्मा चढ़ा रहता था। हमारे सामने उसने शायद ही कभी चश्मा उतारा हो। ऐसा लगता था कि जैसे वह चश्मा पहने-पहने ही पैदा हुआ हो। इससे पहले मैंने कभी किसी माली को चश्मा लगा कर काम करते नहीं देखा था। जब वह पहली बार काम करने हमारे घर आया तो उसकी इतनी पतली काया को देखकर सबको लगा कि जाने कितने दिनों से उसे खाना न मिला हो। पर ऐसा नहीं था क्योंकि वह पूरी तरह स्वस्थ था और मन लगा के क्यारियों को रोपता रहता था। उसकी मेहनत से बसंत आने तक क्यारियाँ रंग-बिरंगे लाल, पीले और गुलाबी फूलों से लहलहाने लगीं थीं।
रेलवे कॉलोनी में ब्रिटिश ज़माने का बना वह बँगला तब बहुत बड़ा और सुन्दर लगता था। बँगले के आगे लॉन था और लॉन के इर्द-गिर्द फूलों की क्यारियाँ थीं। बँगले के पीछे वर्गाकार उपजाऊ ज़मीन थी। धीरे-धीरे चोखेलाल ने ज़मीन में आलू, मटर, टमाटर, करेले आदि बो दिए थे। स्कूल आते-जाते समय चोखेलाल क्यारियों में काम करता दिखाई देता था। कभी-कभी माँ कहती कि चोखेलाल से कहो लाल-लाल टमाटर तोड़ कर दे दे या चटनी के लिए धनिया, पोदीना ले आए तो हम उसके पास चले जाते। चोखेलाल की सींक सलाई जैसी काया खाकी रंग की मोटी कॉटन की वर्दी में कहीं न कहीं काम करती दिख ही जाती। उसमें ख़ूबी थी कि वह फ़ुर्तीला था, मुस्कुराकर सारे काम फटाफट कर देता था।
धीरे-धीरे वह सबका विश्वसनीय बन गया था। माँ का तो वह इतना ख़्याल रखता कि उनकी एक आवाज़ पर दौड़ा चला जाता। बाहर बाग़बानी के काम के अलावा सुबह-सुबह पराठें सेंकने और हम चार भाई-बहनों का खाना पैक करने के काम में माँ की मदद करने से लेकर घर का राशन लाने तक के काम में वह हाथ बँटाने लगा। रसोई में सब्ज़ी काटने या सिल-बट्टे पर चटनी पीसने से शुरू हुआ चोखेलाल कब घर में अपनी राय देने लगा, पता ही नहीं चला। माँ भी उसे कभी-कभी दोपहर का खाना भी देने लगीं। जिस दिन चोखेलाल बीमार हो जाता उस दिन जैसे पूरे घर की मुश्किल हो जाती। हालाँकि बरतन माँजने और सफ़ाई करने के लिए अलग कामवालियाँ लगीं रहतीं। पर चोखे लाल तो घर का अभिन्न हिस्सा बन चुका था।
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फिर एक दिन चोखेलाल काम पर नहीं आया। उसकी अनुपस्थिति से माँ बहुत लाचार हो गईं।
किसी दूसरे ख़लासी ने बताया कि चोखेलाल बीमार है। माँ का तो जैसे सारा काम दुगना हो गया। अगले दिन भी चोखेलाल बीमार ही रहा।
“आज भी चोखेलाल नहीं आया। पता करिये ठीक तो है न,” चिंतित स्वर में माँ पापा से कह रहीं थीं।
“एक पसली का आदमी, और इतना काम। बीमार तो हो ही सकता है न,” पापा बोले। “उसकी जगह दूसरा तो आ रहा है न?”
“वो दूसरा माली आता है पर रसोई में उसको कैसे आने दें। पता नहीं किस जाति का है? और चोखेलाल का कोई है या नहीं, पता नहीं उसका ध्यान कौन रख रहा है?”
“अच्छा आज पता करवाता हूँ,” कहते हुए पापा तैयार होने लगे।
उस दिन पता लगा कि उसकी पत्नी और तीन छोटे-छोटे बच्चे हैं। चोखेलाल की दो शादियाँ हुईं थीं। पहली उसे छोड़कर भाग गई क्योंकि चोखेलाल के डीलडौल के आलावा उस वक़्त उसकी नौकरी भी नहीं थी। यह दूसरी पत्नी वहीं गाँव से है, उससे अधिक जवान और सुन्दर है। ये भी पता चला कि चोखेलाल जब तक घर में रहता है उसे हमेशा डाँटती रहती है। एक बार तो ग़ुस्से में उसे धक्का भी दे दिया था। और बेचारा चोखेलाल दीवार से जा टकराया था। सिर फटने से बचा था।
माँ ही नहीं हम सबको उस दिन चोखेलाल पर तरस आया।
पर अगले दिन ही सुबह चोखेलाल दरवाज़े पर खड़ा था। मुस्कुराता हुआ, खाकी यूनिफ़ॉर्म में। उसके हलके पीले दाँतों के बीच के गैप से निकलती उसकी मुस्कुराहट ऐसी लगती जैसे पीले मोतियों पर सूरज की किरण पड़ रही हो।
“नमस्ते मेमसाब!”
माँ को देखते ही उसने बड़े अदब से कहा।
“अरे चोखेलाल! तुम ठीक हो गए न?”
“जी मेम साब बस बुख़ार आ गया था।”
“अरे ठंड होने लगी है। सारा दिन बाग़बानी करते हो। गरम कपड़े और जूते पहनने शुरू करो।”
माँ स्नेह से कहा तो चोखेलाल का मन ख़ुशी से गद्गद् हो गया। माँ ने तुरंत पापा के पुराने जूते और गरम कपड़े चोखेलाल को पकड़ाए। शायद माँ का यही स्नेह उसे खींच लाता था। घर में पत्नी की लताड़ सुनने से तो बेहतर था, कि काम-काज में लगा रहे।
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हम तो छोटे बच्चे थे। चोखेलाल खेती-बाड़ी के हर नुस्ख़े से वाक़िफ़ था। घर के पीछे के दालान में अंगूर की लतरों के बीच से एक पतला-सा रास्ता जाता था जिसमें चलते हुए हम चोखेलाल को ढूँढ़ निकालते थे। घर के पीछे दो आउट हाउस थे जो रेलवे के क्लास फ़ोर कर्मचारियों को दिए जाने लगे थे। पहले वे घर की ज़मीन से जुड़े थे पर बाद में एक फ़ेन्स लगा कर उन्हें अलग कर दिया गया था। घर में नींबू, आम, अमरूद के पेड़ भी थे, जिन पर अपने समय में फल लगा करते थे। घर के पीछे इतनी बड़ी ज़मीन थी कि रात को बाहर निकलने में डर लगता था।
फिर भी रात को कभी-कभी भाइयों के साथ हम जुगनू ढूँढ़ने चले जाते और उन्हें काँच की शीशियों में बंद कर लेते। थोड़ी देर उनकी अद्भुत रौशनी में मन्त्र मुग्ध होते और फिर माँ डाँट लगातीं, “उड़ा दो इन्हें, मर जाएँगे तो पाप लगेगा।”
उन दिनों पाप, पुण्य कमाना एक बड़ी बात थी। और पाप से हम डरते थे। स्वर्ग–नरक की कल्पना से भी डर लगता था। उन दिनों टीवी तो था नहीं तो बाल पत्रिकाओं को पढ़ने और खेलने-कूदने के अलावा और कुछ कर भी नहीं सकते थे।
एक दिन चोखेलाल ने बताया कि बाग़ के आख़िरी सिरे पर कुत्ते की एक क़ब्र थी। शायद किसी ब्रिटिश मेम का चहेता कुत्ता था, इसलिए उसे वहीं दफ़ना दिया गया था। ब्रिटिश मेम का यह कुत्ता कभी-कभी रात को क़ब्र से निकल कर अपनी मेम साब को ढूँढ़ता है।
इसी तरह चोखेलाल ने एक दिन बताया कि हम दोपहर या रात को पीपल के पेड़ के नीचे न जाएँ क्योंकि वहाँ भूतों का निवास होता है।
तो छोटी बहन ने बड़े भोलेपन से पूछा, “क्या आपने भूतों को देखा है?”
चोखेलाल मुस्कुराया और हँसकर बोला, “हाँ, मुझे तो एक दिन एक भूत ने इतनी ज़ोर से धक्का दिया कि मेरा चश्मा भी टूट गया।”
उसके बाद तो हम लोग ऐसा डरे कि रात में कुत्ते की क़ब्र या पीपल के पेड़ के नीचे जाने से बचने लगे। ख़ासकर तब जब गर्मियों की दोपहर में लू चल रही हो, हवाएँ धूल उड़ाती साँय-साँय चल रहीं हों।
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अब माँ चोखेलाल को खाना-पीना भी दे देतीं। बच्चों के लिए सब्ज़ियाँ फल भी ले जाने देतीं। पर ले जाने के पहले हमेशा वह माँ को दिखाता। कटहल के पेड़ पर जब बड़े-बड़े आकार के कटहल लगते तो उन्हें छाँटकर तोड़ना और फिर काटकर अख़बार में लपेट कर पड़ोसियों के यहाँ बाँट आना चोखेलाल का ही काम था। और इसमें उसे बहुत मज़ा भी आता था। तीन महीने बाद चोखेलाल फिर नहीं आया। किसी ने बताया चोखेलाल कभी जब देर से घर पहुँचता है तो उसकी पत्नी उसे बहुत डाँट लगाती है। वह कहती है कि उसे हमारा घर छोड़कर कहीं और काम कर लेना चाहिए क्योंकि हमारे यहाँ चोखेलाल को बहुत काम करना पड़ता है। पर चोखेलाल इस बात में उसकी एक न सुनता। और कहीं और काम करना उस एक पसली के आदमी के वश की बात नहीं थी। और उसे हमारे घर की आदत पड़ चुकी थी।
चोखेलाल की ख़ास बात यह थी कि वह हमेशा ख़ुश रहता और अपने बच्चों से बहुत प्यार करता। एक बार तो माँ ने असली घी के आलू के पराँठे उसे अपनी जेब में छिपाते हुए पकड़ा था और चोखेलाल ने शर्माते हुए माफ़ी माँग ली थी।
उसकी लाचारी माँ समझती थीं फिर भी उस दिन वो बहुत ग़ुस्सा हुईं थीं।
उस दिन पूरे दिन वो बिलकुल नहीं मुस्कुराया। चुपचाप काम करता रहा। माँ ने उसे इतना चुप देखा तो उसके पास गईं और उसे एक कप चाय दी, जब उससे बात करने की कोशिश की, तो उसकी चेहरे पर फीकी सी मुस्कुराहट वापस आई।
अगले दिन काम पर आया तो पहले की तरह सामान्य हो गया था।
हम बच्चों ने भी तय किया कि चोखेलाल को ख़ुश करते हैं। हमने चोखेलाल से फूल पौधों की बातें शुरू कर दीं, अपनी एक-एक टॉफ़ी भी बचाकर उसको दे दी। न-न करते भी उसने टॉफियाँ ले लीं। तीनों बच्चों के लिए एक-एक टॉफ़ी और एक अपने लिए भी। वह बहुत ख़ुश हुआ। और फिर धीरे-धीरे सब कुछ पहले की तरह हो गया।
पर उसके दो महीने बाद ही पापा का ट्रांसफ़र दूसरे शहर में हो गया। सब पैकिंग में व्यस्त हो गए। चोखेलाल ने बढ़-चढ़ कर पैकिंग में माँ की सहायता की। जाने से पहले माँ ने उसको बहुत सारी चीज़ें दीं। जैसे जो भी हम ले जा नहीं सकते थे, सब कुछ उसको दे दिया। वह बहुत ख़ुश हुआ। पहली बार उसकी पत्नी माँ से मिलने आई। गोरी-चिट्टी, बड़ी-सी बिंदी लगाए, लम्बी-सी माँग भरे, चटक रंग की साड़ी और छींटदार ब्लाउज पहने जब वह आई तो विश्वास ही नहीं हुआ कि वह एक पसली के पतले-दुबले चोखेलाल की पत्नी हो सकती है। माँ ने उसको एक साड़ी और कुछ रुपये निकाल कर दिए तो वह बहुत ख़ुश हो गई। जिस दिन हमें जाना था, चोखेलाल स्टेशन पर हमें छोड़ने आया। गोल चश्में के मोटे फ़्रेम के पीछे से भी उसकी नम आँखों को देखा जा सकता था।
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नए शहर में जाकर भी माँ शुरू शुरू में कहतीं “चोखेलाल होता तो यह कर देता या दौड़कर सब्ज़ी ला देता या बाज़ार से सामान ले आता” आदि-आदि। सच है चोखेलाल जितना ईमानदार, परिश्रमी और सीधा व्यक्ति आसानी से कहाँ मिलता।
अब हम अपने नए स्कूलों में व्यस्त हो गए, छोटे शहर की तरह यहाँ का बँगला इतना बड़ा न था। न रात को जुगनू दिखते, न ब्रिटिश मैडम के कुत्ते जैसी कोई रहस्यमयी कोई चीज़ दिखाई देती। नया माहौल, वहाँ नए दोस्त बने। पढ़ाई भी ज़्यादा थी।
जीवन बस व्यस्त था, सुबह स्कूल बस आ जाती और शाम घर वापस आते। फिर होमवर्क की मारा-मारी। यहाँ आए छह महीने बीत गए थे। एक दिन पापा ऑफ़िस से घर आए तो उदास लगे। माँ शाम की चाय बना ही रहीं थीं कि उन्होंने बताया, “चोखलाल नहीं रहा।”
“क्या?” माँ ने अविश्वास से पूछा।
“हाँ, यही फोन आया था कि वो बीमार हो गया और उसी बीमारी में चल बसा।”
पूरा घर यह शॉकिंग ख़बर सुनकर स्तब्ध रह गया। विश्वास नहीं होता था कि जीता-जागता, हँसता-मुस्कुराता आदमी इस तरह सबको छोड़कर चला जाए।
“और उसकी पत्नी, बच्चे . . . उनको कौन देखेगा।”
“उसकी पत्नी को पेंशन मिलेगी।”
“कोशिश करिये कि उसकी पत्नी को रेलवे में ही कोई नौकरी मिल जाए। ताकि वह बच्चों को पढ़ा सके और चोखेलाल का सपना पूरा हो जाए।”
“अच्छा देखता हूँ।” पापा ने धीरे से कहा।
बाद में पता लगा कि उसे रेलवे अस्पताल में नौकरी मिल गई है। अब चोखेलाल तो वापस नहीं आ सकता था पर एक अच्छे अंत के साथ ये कहानी समाप्त हो ही गई थी।
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“मैडम, योर बिल,” आवाज़ के साथ मेरा ध्यान भंग हुआ।
“अच्छा चोखेलाल,” जाने कैसे मेरे मुँह से निकला।
“मैडम, विक्रांत। माई नेम इज़ विक्रांत,” उसने आश्चर्य से मुझे देखा।
“ओह, सॉरी विक्रांत,” मुझे अपने ऊपर शर्म आ गई।
मैंने बिल पे किया और रेस्टॉरेंट से बाहर निकलने ही लगी थी कि वह मेरे पास आया, “मैडम माई ग्रांडफादर वाज़ चोखेलाल। क्या आप उनको जानती थीं।”
मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं कैसे रियेक्ट करूँ। दुनिया इतनी छोटी भी हो सकती है—मैंने कभी सोचा न था। जाने क्यों मैंने इंकार में सिर हिला दिया। उसे बीस डॉलर की टिप दी और चुपचाप रेस्टॉरेंट के बाहर निकल आई।