प्रेम शायद ऐसा ही होता है
बबिता कुमावत
किसी के जीवन में
शोर की तरह नहीं,
धीरे-धीरे उतरती हुई शाम की तरह आना।
बिना कहे समझ लेना
कि सामने वाला थका हुआ है,
और उसके पास बैठ जाना
बिना किसी सलाह, बिना किसी प्रश्न के।
प्रेम बड़े वादों में नहीं रहता,
वह छिपा होता है
चाय के उस आख़िरी घूँट में
जो कोई आपके लिए बचाकर रख देता है,
या भीड़ भरी सड़क पर
आपकी चाल के अनुसार
अपने क़दम धीमे कर लेने में।
प्रेम वह नहीं
जो हर समय शब्दों में दिखाई दे,
कई बार वह
रसोई से आती हुई पुकार में होता है,
देर रात भेजे गए एक छोटे-से संदेश में,
या उस चिंता में
जो पूछती है
“घर पहुँच गए?”
कभी-कभी प्रेम
पतझड़ की सूनी डाल पर रखे
फूलों से भरे एक लिफ़ाफ़े जैसा होता है,
जो यह विश्वास दिलाता है
कि दुनियाँ चाहे जितनी कठोर हो जाए,
कोमलता अब भी बची हुई है।
प्रेम किसी को बदल देना नहीं,
बल्कि उसके सारे अधूरेपन के साथ
उसे स्वीकार कर लेना है।
उसकी कमियों के बीच
उसके अच्छे हिस्सों को बचाए रखना है।
और शायद प्रेम का सबसे सुंदर रूप
यही है कि
कोई आपके जीवन में हो
जिसके सामने
आपको मज़बूत होने का अभिनय न करना पड़े।
जिसके पास बैठकर
आप अपनी थकान उतार सकें,
अपनी चुप्पियाँ रख सकें,
और बिना किसी डर के कह सकें
“आज मन ठीक नहीं है।”
प्रेम का अर्थ
हमेशा साथ रह जाना भी नहीं होता,
कभी-कभी यह किसी की स्मृतियों में
सम्मानपूर्वक बने रहना भी होता है।
फिर भी,
यदि जीवन की लंबी यात्रा में
कोई ऐसा मिल जाए
जिसकी उपस्थिति से
दिन थोड़ा आसान लगने लगे,
और अनुपस्थिति में
साँझ कुछ अधिक ख़ाली,
तो समझ लेना
प्रेम किसी उत्सव की तरह नहीं आया,
वह धीरे-धीरे
तुम्हारी आदतों में उतर गया है,
तुम्हारी प्रार्थनाओं में शामिल हो गया है,
और तुम्हारे भीतर
एक शांत, स्थिर जगह बना चुका है,
जहाँ लौटकर
मन को घर जैसा लगता है।