मैं बरसों बाद अपने शहर में 
क्या ढूँढने आया हूँ वापिस
मगर यह शहर अब मेरा नहीं है 

जहाँ पुरखों का घर था 
अब वहाँ भद्दी सी इक ऊँची इमारत बन चुकी है 
गली के छोर पर जो खेल का मैदान था 
उसे घटिया सी शॉपिंग माल ने हथिया लिया है 
सड़क के पार कुछ पेड़ों के झुरमुट थे
वो अब दिखते नहीं हैं 
सभी पगडंडियाँ जो स्कूल ले जाती थीं 
गायब हो गई हैं 
वहाँ बस झुग्गियाँ ही झुग्गियाँ हैं 
जहाँ पर स्कूल था 
अब उस जगह बस एक खंडहर सा खड़ा है 
यह स्कूल सरकारी था 
और अब ऐसे स्कूलों में कोई पढ़ने नहीं जाता 
यहाँ जल्दी ही क्रिकेट स्टेडियम बनने की ख़बरें हैं 

मेरी पहचान के सब चिन्ह मिटते जा रहे हैं 
मैं अपने ही शहर में जैसे इक खोया मुसाफ़िर हूँ 
यहाँ कोई नहीं ऐसा
जो मेरे नाम से परिचित 
मुझे पहचानता हो

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