गुमसुम सा बैठा था नदी तट पर मैं,
पूछ लिया मुझसे हिलोरे खाती सरिता ने,
क्यों अनुरागी सा बैठा है तू यहाँ,
काम कर जाकर तू वहाँ।


मैंने कहा - ’मेरा क्या है? ओ सरिता!'
मुझे तो हर रोज़ पुकारती है, मेरी कविता!
तू क्यों रुकती है मेरे लिए यहाँ,
थोड़ी सी ओर बह ले. . .
आगे रेगिस्तान है वहाँ।


जो भी हो मैं तो अपना काम करता हूँ,
हररोज़ प्रभु की माला जपता हूँ,
तू कल कर लेना मुझसे बात,
तुझे तो बहना है दिन-रात।

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