मिलने जुलने का इक बहाना हो

01-03-2019

 मिलने जुलने का इक बहाना हो

अखिल भंडारी

 मिलने जुलने का इक बहाना हो
बरफ़ पिघले तो आना जाना हो

दिन हो छुट्टी का और बारिश हो
दोस्त हों और शराब खाना हो

अजनबी था मगर वो ऐसे मिला
जैसे रिश्ता कोई पुराना हो

क्यों उठाते हो बोझ यादों का
भूल जाओ जिसे भुलाना हो

देस परदेस में फ़रक क्या है
आब-ओ-दाना हो आशियाना हो

अब तो यह घर पराया लगता है
अब कोई दूसरा ठिकाना हो

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