मेरे अम्बेडकर मेरे जीवन आदर्श

15-05-2020

मेरे अम्बेडकर मेरे जीवन आदर्श

सुनील चौधरी

प्रत्येक मनुष्य के जीवन में कोई न कोई होता है जो आपको समाज को बदलने व रूढ़ियों के ख़िलाफ़ खड़ा होना सिखाता है। ऐसे ही एक व्यक्ति मेरे जीवन में भी थे। जिनको लोग बीडीओ साहब कहते कुछ लोग पूरन कहते।  जिनकी कहानी आरंभ करता हूँ-

मेरे ताऊजी का जन्म बल्टीकरी गाँव में हुआ। एक किसान परिवार में जहाँ सुबह दूध पर झाग खेलती थी, पशु-पक्षियों की चहचहाहट थी। जहाँ मथानी की सहायता से मक्खन को अलग कर लिया जाता और मट्ठा सभी का प्रिय पेय पदार्थ होता। ताऊजी बड़े हुए थे इसी किसान परिवार में हल की मूठ को थामे और मेहनत करते हुए। लेकिन मैंने जब उन्हें देखा तो वे उस समय बीडीओ के पद पर अलीगढ़ में तैनात थे और अपना काम ईमानदारी से करते थे। मेरा पहली बार उनकी बेटी और मेरी दीदी (ममता) की शादी में जाना हुआ। लेकिन उस समय की इतनी स्मृतियाँ ही शेष हैं कि मैं गया था बाक़ी कुछ ठीक से याद नहीं। मैं उन दिनों मथुरा में रहता था, एक घटना याद आ रही है कि होली का समय था ताऊजी अपने गाँव के कई मित्रों के साथ आये हुए थे और कुर्सियों पर बैठे थे। ताऊजी को हँसी-मज़ाक बहुत पसंद था। तभी हम सभी भाइयों में से एक भाई को साड़ी पहना दी गई और ताऊजी के समक्ष भेजा गया। वह साड़ी में गुलाल लेकर जब सामने पहुँचा तो ताऊजी सोच में पड़ गए लेकिन इतनी देर में उस भाई ने गुलाल लगाकर पैर छू लिए, ताऊजी देखते रह गए। फिर पूछने लगे कि - यह किसकी बहू है। तो एक भाई का नाम ले दिया गया कि उनकी है। ताऊजी बोले, “बिना बुलाये शादी कब हुई?” लेकिन बाद में भेद खुल ही गया और ताऊजी उसे बुलाकर बहुत देर तक सभी के सामने हँसते रहे। हँसना और लोगों को हँसाना उनके स्वभाव में सम्मिलित था। 

मैं जब गर्मी की छुट्टियों में गाँव जाता तो ताऊजी के पास ही ज़्यादा रहना होता क्योंकि वे खाना ज़रूर अपने यहाँ खाते लेकिन रहते हमारे ही यहाँ। उनको बच्चे बहुत प्रिय थे जब भी बच्चों के साथ होते तो ज़िंदादिल नज़र आते। दोपहर को उनको चाय पीने की आदत होती तो अक्सर मुझे बुलाकर कहते- “तेरी माँ सो रही होगी चुपचाप चाय बना लियो; दोनों पीयेंगे।” और मैं कभी-कभी ख़ुद से चाय बना लाता तो कभी माँ को जगा लेता। लेकिन मेरी माँ ने कभी ग़ुस्सा न किया और हमेशा ख़ुशी-ख़ुशी चाय बनाकर दी। कभी-कभी ताऊजी कहते, “भूख लगी है एकाद रोटी रखी होगी चुपचाप ले अइयो पता न चले।” ऐसा वो अक्सर कहते क्योंकि वे जानते थे कि मेरी माँ दोपहर को सोई होंगी। इस बात का ख़्याल हमेशा उनको रहता और कहते, “साग न हो तो मिर्च ले अइयो या सिल बटना पर चटनी घिस लियो।” और मैं बिना माँ को जगाए चुपचाप रोटी ले आता। ऐसा मेरी ग़ैर मौजूदगी में मेरे भाई भी करते रहे। वे रोटी खाते हुए कहते - “जब तू छोटा था तो तेरी माँ हमेशा तेरे लिए रोटी घी से चुपड़कर, उसमें बीच में चीनी रख कर कागज में लपेटकर पॉलीथिन में बाँध देती। लेकिन जब तेरा मन स्कूल न जाने का होता तो अक्सर कहता कि - मेरी रोटी रोज़ाना मेरे साथ पढ़ने जाती हैं। आज रोटी ही पढ़ आएँगी, मैं ना जा रहा पढ़ने।” सुनाते-सुनाते ख़ुद ही हँसने लगते। कभी गौरैया की कहानी कहते कि एक गौरैया है उसके बच्चे मर गए तो उसके दूध की नहर बहती है अलीगढ़ में। ऐसे क़िस्सों से उनकी पिटारी हमेशा भरी रहती। 

ताऊजी हमेशा बीड़ी को थोड़ा सा सुलगाकर बुझा देते और खाट के नीचे फेंक देते। इसका राज़ उस दिन खुला जब चच्चू को खाट के नीचे से बिखरी बीड़ियों को उठाते हुए देखा। चच्चू को लोग पागल कहते थे और कोई भी उनको बीड़ी पीने को न देता लेकिन बीड़ी की तड़प में वह चच्चू गाँव में भागा-भागा घूमता। कभी-कभी लोग फटकार भी देते बाक़ी जो चच्चू को बीड़ी देता उनके पिता आकर लड़ते। लेकिन ताऊजी ने इसका नायाब तरीक़ा खोज निकाला था, कि बीड़ी जला कर बुझा दो। यही बुझी हुई बीड़ी उसकी खुराक हो जाती।             

हमारे घर हमेशा छोटी जाति के लोग आते जिनको लोग कभी खाट पर न बैठने देते, क्योंकि वह गाँव के ही चमराने मोहल्ले से आते थे। लेकिन ताऊजी उनको हमेशा बैठने को कुर्सी देते और पीने को बीड़ी। इसलिए उनकी सभी से दोस्ती थी। कभी वे सोना (दलित) के यहाँ मज़े से खाट पर मठा पीते हुए पाए जाते तो कभी, बिरजू के यहाँ होली पर कचौड़ियाँ खाते हुए। एक घटना याद हो आयी है कि एक बार जब ताऊजी के साथ एक भाई चमराने चला गया था और उसने रमुजा के यहाँ चाय पी ली थी तो मोहल्ले भर के लोगों ने कहा था कि यह सबका धर्म भ्रष्ट करा देगा। लेकिन हम भाई फिर भी ताऊजी के आगे-पीछे ही लगे रहते। ताऊजी कभी-कभी शराब भी पीते थे उसमें भी चमराने के कई लोग कभी-कभार शामिल हो जाते और दोस्तों की तरह बतियाते हुए अपने सुख-दुःख बाँटते। पता नहीं था उनको क्या दुख था। ताई जी के चले जाने का या बेटों के बात न करने का। क्योंकि मैंने कभी भैया को ताऊजी से बात करते हुए न देखा था। क्या कारण था वह मेरे लिए आज तक रहस्य ही है।

मुझे याद है कि मैंने जब हाईस्कूल में अव्वल आते हुए अपने स्कूल, सेंटर व गाँव में सबसे अधिक नंबर प्राप्त किये तो ताऊजी ने 3 बोटल पेप्सी की मँगा कर बाल्टी में डलवा दीं और उसमें बर्फ़ मिला कर पूरे घर के मर्दों के साथ औरतों को भी उस दिन पेप्सी बाँटी गई। यह पहली बार था जब मैंने औरतों को पेप्सी पीते हुए देखा था। क्योंकि हमारे घर की औरतों को घर से सिर्फ़ खेत तक, किसी समारोह में या अपने मायके जाने तक की ही इजाज़त मिल पाती थी। याद है मुझे कि एक बार जब घर भर की औरतें दाऊजी का मेला जाना चाहती थीं और पूरी तैयारी करते हुए मीठी पूड़ियाँ भी बना ली थीं, तब किसी बच्चे के शिकायत करने पर दोनों-तीनों घरों के दादा चबूतरे पर ही जमे रहे थे और मीठी पूड़ियाँ घर में ही बैठकर खानी पड़ीं थीं। लेकिन यदि घर के बुज़ुर्ग ताऊजी होते तो मैं दावे से कह सकता हूँ कि वे उस दिन उन औरतों को दाऊजी का मेला दिखाने ख़ुद लेकर जाते।

ताऊजी ही बताते थे कि हमारे प्रदेश में ढाई मुख्यमंत्री हैं- मुलायम सिंह यादव, शिवपाल यादव और आधा आज़म खां। ताऊजी ही बताते कि गाँव में 5 विधायक हैं, क्योंकि गाँव के लोग उन पाँच पंचों को विधायक जी कहते थे। ताऊजी ही बताते कि- गाँव में आठ दस प्रधान हैं क्योंकि जिसके पास थोड़ा रुत्बा और पैसा होता गाँव के लोग उसे ही प्रधान जी कहते। ताउजी ही समझाते कि कई - एलआई (लाइन इंस्पेक्टर) हैं क्योंकि वे लोग हमेशा बिजली के ट्रांसफ़ार्मर के फुँक जाने पर घर-घर से पैसा जुटाने में हमेशा आगे रहते, ताकि एक पौआ या बोतल का पैसा बचाया जा सके। 

मुझे याद आ रहा है कि एक बार गाँव में जन्तर (पशुओं को बीमारी से बचाने का टोटका) निकाला जा रहा था तो मैंने उस पर एक कविता लिखी थी तो ताउजी को मैंने वह कविता सुनाई। एक दिन हुआ यह कि वे कई मित्रों के साथ बैठे थे जिनमें से कई पेशे से शिक्षक भी थे, जिनकी ज़िंदगी दो जोड़ी कुर्ते पाजामे और एक एटलस साईकल पर गुज़री थी। उन दिनों मैं अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में एम.ए. का विद्यार्थी था। ताउजी ने मुझे बुलाया और कविता पढ़ने को कहा। मैंने कविता पढ़ी थी जो कि टोटके के आडंबर के ख़िलाफ़ थी। कविता सुनकर ताउजी मेरी प्रशंसा की थी पर लोगों में बहस छिड़ गई जो मुझे ग़लत सिद्ध करने में लगे थे लेकिन मैं देख रहा था कि ताउजी इस टोटके के ख़िलाफ़ ही खड़े रहे। 

जीवन के अंतिम समय में ताउजी ने हमारे घर का चबूतरा छोड़ दिया था और गाँव से बाहर खेत में एक टीन डालकर रहते। वहीं पर उनकी बहू खाना पहुँचाती और चाय के लिए गैस का इंतज़ाम वहीं था।अब जब मैं दगरे से गुज़रता हो ताउजी को राम-राम कहता जाता। घर आने पर एक दिन जब मैंने माँ से कहा कि ताऊजी अब थोड़ा बदल गए हैं; उम्र का कारण है या कोई और तो माँ ने कहा था कि उनकी बहू को तुम सब भाइयों का ताउजी के पास बैठना अच्छा नहीं लगता। लेकिन फिर भी हम सब भाई बराबर ताउजी के पास जाते रहते। वे गाँव के लोगों से मेरा परिचय बहुत ही गर्मजोशी से कराते और हमेशा समझाते कि जाति-पाँती व धर्म के भेद से ऊपर उठकर सोचना। इस तरह वे मुझे जीवन में हमेशा अलग तरह से सोचने को प्रेरित करते रहे। लेकिन कुछ दिनों जब वे थोड़ा बीमार थे उन दिनों मैं हॉस्टल में रहता था तो पिताजी का कॉल आया। उन्होंने रोते हुए कहा कि- ताउजी दो दिन पहले नहीं रहे। इतना सुनते ही मेरे पाँव के नीचे की ज़मीन खिसक गई और मेरी आँखों से आँसू बहने लगे। उनके साथ कि स्मृतियाँ आँखों के सामने घूमने लगीं और मैं ताउजी को याद कर रोता रहा। भरोसा करना मुश्किल हो रहा था कि वे इस दुनिया में नहीं रहे। अगले दो दिन मुझसे खाना न खाया गया बस अपने रूम में रहता और उनकी बातों को सोच कर कुछ करने के सपने बुनता। आँसू निरंतर बहते रहते। उन दिनों बस डायरी में इतना लिखा था -  “मैं आप पर उपन्यास लिखूँगा, जिसका शीर्षक होगा - 'बीडीयो साहब' क्योंकि गाँव भर के लोग आपको इसी नाम से ही बुलाते थे। कुछ लोग पूरन भी कहते जो कि आपका नाम था। लेकिन आप मेरे ताउजी ही थे, मेरे लिए मेरे साहब, मेरे अम्बेडकर।”

आज भी अक्सर गाँव जाता हूँ तो शाम का सूरज ढलते हुए आपकी समाधि के पास बनी उस गूल की मेढ़ से ही देखता हूँ और सोचता हूँ कि फिर किसी दिन आप उठ बैठोगे और मुझसे बातें करोगे - उसी गौरैया की, उसी रमुजा की, सोना की, उसी चच्चू की और कहोगे कि जो भी हो इनके साथ खड़े रहना। 

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