जिज्ञासा मानव की भावना ही नहीं, उसकी शक्ति भी होती है। ऐसी शक्ति, जो यदि जागृत हो जाये तो मानव असंभव को संभव कर देता है, इतिहास रच देता है, अकल्पित को सत्य में परिवर्तित कर देता है। और यदि यह जिज्ञासा जिजीविषा के साथ मिल जाये,तो वह व्यक्ति असाधारण हो जाता है, उसके निमित्त से कुछ विशाल, कुछ अपूर्व घटित हो कर ही रहता है। और इस बात का साक्षी कोई और नहीं, इतिहास है; इस नृवंश के आजतक का इतिहास, इस मानव की आजतक की यात्रा इस की गवाही आजतक देती आ रही है।

आवश्यक नहीं कि ये प्रश्न और ये जिज्ञासा किसी बड़ी वस्तु के लिए हो। कई बार, हमारे मन के कुछ प्रश्न भी वह व्याकुलता उत्पन्न कर देते हैं मानो नभ में घटाघोप सहसा घुमड़ जाये तथा प्रत्येक प्राणी घुटन सी अनुभव करने लग जाता है। इस मन की प्रहेलिकाएँ और अनबूझे प्रश्न शायद भौतिक धरातल से अधिक सूक्ष्म और मर्मस्पर्शी होते हैं। जितना आकुल ये हमें कर सकते हैं, उतनी भौतिक व्याकुलताएँ करने में अक्षम हैं।

किन्तु मैं यह सब क्यों बोल रहा हूँ? क्यों बता रहा हूँ यह सब? नहीं, मैं कोई उपदेश नहीं दे रहा, उपदेश देने का सामर्थ्य मुझमें नहीं है। मैं स्वयम्‌ अपना पथ निर्णीत नहीं कर पा रहा तो मैं किसी और को क्या समझा सकता हूँ। यह कोई शिक्षा नहीं, मात्र आत्मकथ्य है। इसकी भी क्या आवश्यकता है? क्या सार्थकता है इस आत्मकथ्य की? परंतु जो जिज्ञासा और मानव मन के प्रश्नों के विषय में मैंने बताया है, वे मेरे मन में आँधी नहीं, झंझा की भाँति आ चुके हैं, जिन्होंने मुझे झझकोर कर रख दिया था।

इतने वर्षों के सफल व्यापार के पश्चात मेरे मन में एक प्रश्न उठा- ऐसे ही, प्रात: उठते समय; कि इतनी प्रचुर धन संपदा के स्वामी होने के पश्चात भी मैं दुखी क्यों हूँ? बाहर से जो सुखी दिखता है, वह भीतर से उतना ही दुखी भी होता है। नगर के श्रेष्ठी होने के पश्चात भी मेरे मन मे सुख व संतोष क्यो नहीं है? मैं अंदर ही अंदर व्याकुल क्यों हूँ?
आपको यह प्रश्न साधारण सा लगेगा, एकदम मामूली सा। किन्तु यह हमें ज्ञात नहीं होगा कि कौनसा प्रश्न कब हमारे मन में वह झंझा उत्पन्न कर दे जो इस प्रश्न ने मेरे मन में किया था। 

एक बार जो आया, यह प्रश्न पर्वत की भाँति मनपटल भूमि पर स्थापित हो गया। मेरा आमोद-प्रमोद समाप्त हो गया। दो दिन तक, मुझे स्मरित है, न मुझे भोजन की सुध रही न व्यापार की। मुनीम जी आए और गए किन्तु मैंने हानि लाभ की कोई चिंता नहीं की। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि यदि इसका उत्तर नहीं प्राप्त हुआ तो मैं विक्षिप्त हो जाऊँगा, आत्महत्या कर लूँगा। मेरे मन में भय की सिहरन दौड़ गयी। मैं, जिसमे जीवन की अदम्य इच्छा है, जो जीवन को पूरे सुख के साथ भोगना चाहता है, एक प्रश्न से इतना अस्थिर हो गया कि वह विक्षिप्तता की सीमा तक पहुँच गया।

आप मुझे पागल कह सकते हैं क्योंकि मात्र इस एक प्रश्न के लिए मैं व्याकुलता की इस सीमा तक पहुँच गया! मेरा मन इतना अशांत हो उठा। मैं कुछ नहीं कहूँगा, क्योंकि मैं उस अवस्था से आ चुका हूँ, उस व्याकुलता तथा अशांति का मुझे आभास है। 

मैं उन्मन सा रहने लगा, मन उखड़ सा गया। जिन गोष्ठियों में मैं रुचि से बढ़-चढ़कर जाता था, उनसे अब वितृष्णा हो गयी। भवन में होने वाली नृत्य व संगीत प्रस्तुतियाँ लुप्त हो गईं। मुझे इसका एक ही उपाय लगा, माधवी! मैं मदिरापान नहीं करता था, ऐसा नहीं है; परंतु अब वह मेरी परम सहचरी बन गयी। उसके बिना मैं यथार्थ में पागल हो जाता था। उसके नशे में डूबकर मेरी उन्मनता तो समाप्त हो गयी लेकिन, मेरी विचार शक्ति तथा चेतना, मूर्छा की गहन गुफा में गिरती गईं....गिरती गईं..…

गोष्ठी में मुझ से नियमित सदस्य की अनुपस्थिति ने शेष व्यक्तियों को आश्चर्य में डाल दिया। मेरी मनोस्थिति का कुछ कुछ ज्ञान उन्हें भी था। अनेक मित्र भेंट करने आए किन्तु मैं किसी से मिलने की स्थिति में नहीं था। एक शाम, श्रेष्ठी महाबाहु मुझसे भेंट करने आए। गोष्ठी में यदि सबसे अधिक किसी का आदर मैं करता था तो वह आर्य महाबाहु का ही। जब हम दोनों एकांत में होते तो वे मुझे तुम कहकर ही संबोधित करते। मेरा मन हुआ कि उनसे अपनी व्यथा कहूँ और मैंने भेंट करने की हाँ कर दी।

हम दोनों कक्ष में मिले।

"प्रणाम आर्य," मैं उस समय किंचित नशे में था।

"वरुणसेन! यह क्या कर रखा है तुमने?"

"क्या आर्य?"

"क्या? तुम्हें क्या हो गया है वत्स?" वे चिंतित दिखते थे। 

"मन बड़ा व्यथित है इन दिनों तात!" मैंने भी उन्हें स्नेह से संबोधित किया।

"तुम्हें किस का अभाव है वरुणसेन? तुम नगर के महाश्रेष्ठी हो, इतने से वय में। मेरे पुत्र वय में तुमसे बड़े हैं। क्या नहीं है तुम्हारे पास? किस कारण दुख है; फिर तुम्हें? कौन सी व्यथा तुम्हें मथे जा रही है?" उनके स्वर में उनका विचलन स्पष्ट झलकता था।

"यही तो व्यथा है तात! मुझे कोई अभाव, कोई समस्या, कोई संकट नहीं। तब भी मेरे भीतर सुख व संतोष क्यों नहीं है? क्यों एक अपूर्णता की भावना सालती है मेरे भीतर? यह प्रासाद, यह व्यापार का साम्राज्य और ये संपत्ति मुझे सुख की अनुभूति क्यों नहीं दे रहे हैं? मैं चाहूँ तो कुछ भी वस्तु तुरंत प्राप्त कर सकता हूँ, परंतु यह आकुलता कम हो ही नहीं रही।" 

"तुम्हारे मन की यह व्याकुलता तुम्हारे सिवा कोई समझ भी नहीं सकता वत्स! सांसारिक संघर्ष में तो स्वजन बंधु साथ देते हैं, किन्तु इस मानसिक संघर्ष में कोई साथ देने में समर्थ नहीं है, न तुम्हारे स्वजन, न मित्रगण और न तुम्हारी अर्द्धांगिनी। इस युद्ध को स्वयम्‌ ही लड़ना होता है तथा, इसकी भीषणता योद्धाओं को तोड़ कर रख देती है।"

"तो मैं क्या करूँ तात?" मैं अब टूट सा रहा था। "इसी कारण मैं माधवी का अवलंबन ले रहा हूँ, उसके नशे में मेरी पीड़ा कम तो होती है परंतु इस प्रकार मूर्छित रहने में, चेतन होकर भी जड़ बने रहने में जो छटपटाहट मुझे होती है वह केवल मैं जानता हूँ।"

"तुम्हारी समस्या जटिल है," उन्होंने कहा।"सुनो, पुत्र।"

"हाँ तात।"

"तुम्हारा विश्वास है साधुओं में?"

मैंने नकार में शीश हिलाया।

"तब तुम्हारे लिए किंचित कठिन होगा किन्तु नैॠत्य में एक पर्वत है ऊर्ध्वोदर पर्वत। वहाँ पर एक महात्मा रहते हैं, मेरे अनेक मित्र उनसे भेंट कर आए हैं, उनके मुख से तो यही सुना है कि ऐसी कोई शंका नहीं जिसका समाधान वे न कर पायें," महाबाहु एक एक शब्द रुक-रुक कर कह रहे थे मानो प्रत्येक शब्द का महत्व बता रहे हों।

"क्या वे कर देंगे मेरी शंका का समाधान?"

"निस्संदेह पुत्र।"

"तो मैं उनके पास अवश्य जाऊँगा तात। यह जिज्ञासा अब मुझे भीतर से खोखला कर रही है। यदि इसका समाधान नहीं प्राप्त हुआ तो मैं स्वयम्‌ नहीं जानता मैं क्या करूँगा," मेरी वाणी में एक दृढ़ता के साथ साथ एक विचित्र सा उन्माद भी था।

"ठीक है वरुण! तुम उनके पास जाओ। तुम अपने मनोरथ में सफल होओ यही आशीर्वाद है।"

मैं प्रतिबद्ध हो गया था। ऊर्ध्वोदर पर्वत ही अब मेरे अगला गंतव्य था। 

अगले सूर्योदय से पूर्व ही मैं चल पड़ा। मैंने केवल अपना अश्व लिया था। अब सोचकर हँसी आती है किन्तु उस समय भी मैंने बहुमूल्य परिधान पहन रखा था तथा मेरे शरीर पर विभिन्न अलंकार थे। कदाचित ये सब मेरे लिए इतने अभिन्न हो गए थे कि मेरी पहचान का ही एक भाग बन गए थे।

मैं नैॠत्य दिशा में चल पड़ा। नगर पार हो गया, जो दिन में शोभायमान रहता था, अभी वह नगर चादर लपेट कर सो रहा था। सूर्योदय होते-होते मैं ऊर्ध्वोदर पर्वत के नीचे था। मैंने चढ़ना आरंभ किया, पर्वत वास्तव में दुर्गम था। ऊँचा भी बहुत तथा पथ भी कंटीला व विषम। किसी पशु का स्वर भी नहीं आ रहा था उस समय। यह नीरवता भी भयानक थी, हृदय को कंपा देने वाली थी। मैं धीमे-धीमे ऊपर चढ़ा। 

सूर्य का ताप तीव्र हो गया था। सहसा ऊपर से शिलाएँ स्खलित होकर मेरे ऊपर गिर पड़ीं। उनके साथ भूमि भी स्खलित हुई। मेरा अश्व दब गया था। मैं एक ओर गिरा हुआ था, एक हाथ में गंभीर घाव आया था। मैंने शिलाएँ हटाने का यत्न किया किन्तु तब तक मेरा प्रिय अश्व चिरनिद्रा में जा चुका था। मेरा प्रिय अश्व अधिप! जिसके विषय में समस्त नगर में यह तथ्य था कि उसके समान अश्व इधर तो नहीं है। वह मेरा साथ छोड़ जा चुका था। मेरे आभूषण भी दबे पड़े थे कहीं। वे मूल्यवान वस्त्र भी फट-कट कर अपना सौन्दर्य खो चुके थे।

मैंने आगे बढ़ने का निश्चय किया। वह समाधान मेरे लिए अधिक आवश्यक था। अब तो वह जीवन मरण का प्रश्न बन चुका था। उसके लिए मैंने इतना कष्ट लिया था, आधे मार्ग से बिना उसको पाये मैं नहीं लौटने वाला था।

मध्याह्न तक मैं शिखर पर पहुँचा, मेरा शरीर बलवान है, प्रारम्भ से ही मैंने उसे व्यायाम व अभ्यास से कसकर रखा है। कहीं कोई वनस्पति नहीं दिख रही थी, दूर-दूर तक मात्र रिक्त धरती, मृत सी। किंचित दूरी पर मुझे एक कुटीर दिखा, मुझे विश्वास था यह कुटीर अवश्य उन महात्मा का होगा। मैं निकट गया, महात्मा एक कोने में बाहर बैठकर ध्यान कर रहे थे। मेरा पदाचाप सुन उनके अर्द्ध-निमीलित नेत्र उन्मीलित हुए। 

"प्रणाम महात्मन!" मैंने विनयपूर्वक कहा।

"कहो भद्र! इतनी दूर कैसे आए हो?"

"एक शंका है महात्मन! या यूँ कह लीजिये एक प्रश्न है जो मुझे इतने दिनों से पीड़ित कर रहा है। मैं यहाँ आपसे उसका उत्तर प्राप्त करने आया हूँ।"

"पहले जल पीकर किंचित विश्राम करो। जब तक श्रांत रहोगे कुछ समझ नहीं आएगा।" उनकी वाणी में अमृत सा स्नेह था। मैं बिना कुछ बोले उनके साथ भीतर आ गया। उन्होंने मुझे शीतल जल दिया और एक कोने की ओर इंगित किया जहां मैं विश्राम कर सकता था।

एक प्रहर पश्चात मैं निद्रा से उठा। महात्मा उस समय मंत्र जाप कर रहे थे। मुझे उठा देखकर मुसकारये, " क्षुधा हो तो भोजन कर लो पुत्र।"

मुझे क्षुधा थी। मैंने फलों का आहार किया। अब तृप्ति का अनुभव हो रहा था। 

"अब कहो वत्स, क्या प्रश्न है तुम्हारा?"

मैंने समस्त गाथा उन्हें कह सुनाई, अपनी मनोस्थिति का जिह्वा से यथासंभव वर्णन किया। उस समय भी ऐसी प्रतीति हो रही थी कि जो भयानक आकुलता मन में मची है, उसका चौथाई अंश भी जिह्वा से नहीं निकला है।

"तुम्हारा मानसिक संघर्ष बहुत विकराल है वत्स। यह तुम्हारा आत्मबल है कि तुम अभी तक इसे सहन कर पा रहे हो," उन्होंने स्मित स्वर में कहा। 

"अब नहीं कर पाऊँगा और सहन स्वामी! मुझे इस कष्ट से मुक्ति चाहिए।"

महात्मा सहसा ध्यानावस्थित हो गए। एक घटिका पश्चात उन्होंने आँखें खोलीं। "तुम्हें समाधान अवश्य मिलेगा पुत्र, परंतु कल। कल प्रात: सूर्योदय होते ही हम प्रस्थान करेंगे।"

"कहाँ?" मैंने विस्मित होकर पूछा।

"जहाँ मैं ले चलूँगा पुत्र," उन्होंने मुस्कराते हुए कहा। यह मेरे लिए एक रहस्य सा हो गया था।
 
सूर्योदय हुआ, मैं और महात्मा चल पड़े। वे आगे आगे चल रहे थे तथा मैं उनका अनुकरण कर रहा था। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि ऐसे कहाँ लेकर जाने वाले थे वे मुझे?

हम चलते गए। मुझे आश्चर्य तो तब हुआ जब देखा कि हम एक सुंदर स्थान पर आ पहुँचे हैं जहाँ मनोरम वन है तथा सजीव प्रकृति। यह असंभव था! उस मृत्यु लोक से हम स्वर्ग कैसे आ गए थे? चतुर्दिक सुंदरता व्याप्त थी। पक्षियों का कलरव कोकिला के पंचम स्वर के साथ संगम कर किसी प्रेयसी का प्रियतम के लिए गीत लग रहा था। निकट ही एक नदी थी, उसका पाट तो चौड़ा था किन्तु वह पूर्णत: शांत थी, मानो निश्चिंत हो प्रवाहित हो रही हो, उसमे न उद्वेलन था और न संकोच!

"वरुणसेन!" उन्होंने प्रथम बार मुझे नाम से पुकारा।

"जी देव!"

"तुम्हारी सम्पूर्ण कथा तुमने ही बताई है।"

"जी।"

"अब जैसा मैं कहता हूँ वैसा करो।"

"जो आज्ञा देव," मैं स्वचालित यंत्र के समान बोले जा रहा था। 

"वरुणसेन! तुम्हारी संपन्नता तथा प्रतिष्ठा की ख्याति दूर दूर तक फैली हुई है। इतने से वय में तुमने अभूतपूर्व उपलब्धियाँ प्राप्त की हैं। तुम्हें मार्ग चाहिए- इन दुखों को समाप्त करने का। वही मार्ग तुम्हें बताता हूँ- तुम्हारे हाथ में यह पुखराज युक्त स्फटिक मणि का कंगन है जो इतना मूल्यवान है कि मात्र उसके बदले तुम एक राज्य ले सकते हो। यह तुम्हें बाह्लिक के एक व्यापारी से प्राप्त हुआ था। क्यों? सत्य है न!"

मैं अचंभित हो गया, क्या ये महात्मा सर्वज्ञ हैं? इन्हें मैंने इस कंगन के विषय में तो कुछ बताया ही नहीं। किन्तु उन्हें तो इस का मूल्य ही नहीं, यह भी ज्ञात है कि मैंने इसे प्राप्त कहाँ से किया है।

"जी महात्मन्‌!"

"तो सुनो, इस कंगन को नदी में प्रवाहित कर दो," महात्मा ने सामान्य स्वर में कहा।

मैं जड़ सा खड़ा रहा- कदाचित मुझे उनकी वाणी पर विश्वास नहीं हुआ था। मुझे कदापि आशा नहीं थी कि वे मुझे ऐसा करने को कहेंगे। मैं खड़ा रहा, न मैंने कुछ किया न कोई उत्तर दिया।

"क्या हुआ पुत्र!"

मैंने अब भी कुछ न कहा।

महात्मा मुस्कराए। "यही दुखों का कारण है पुत्र! यह तुम्हारे मन का मोह है जिसके कारण तुम संकोच कर रहे हो। इस मोह के कारण ही आसक्ति उत्पन्न होती है, राग व द्वेष होते हैं। तुम श्रावस्ती के सर्वाधिक धनाढ्य श्रेष्ठी होने के पश्चात भी सुखी नहीं हो- क्यों? क्योंकि तुम्हारे मन में मोह के कारण आसक्ति है, राग-द्वेष हैं, विषयों की अभिलाषा है। यह अभिलाषा इतने धन के पश्चात भी पूर्ण नहीं होती और न कभी होगी। चाहे तुम त्रिलोक की संपदा एकत्रित कर लो तब भी तुम्हारी अभिलाषा और इच्छा समाप्त नहीं होंगी क्योंकि इनके पीछे का कारण यह मोह नहीं मिटेगा। यह मोह, यह आसक्ति, ये राग द्वेष ही दुख का कारण हैं वत्स! यदि तुम्हें सुखी होना है तो इस मोह को समाप्त करना ही होगा। मोह के समाप्त होने पर ही आसक्ति समाप्त होगी फिर राग द्वेष। तभी यह विषयों की इच्छारूपी खुजली मिट सकती है। वरुणसेन! सुखी होने का यही उपाय है। सुख और दुख के पथ इन विकारों के दो छोरों पर होते हैं - मोह की ओर भागोगे तो दुख पाओगे तथा मोह से दूर भागोगे तो उस छोर पर अर्थात सुख की ओर पहुँचोगे। यह कंगन उन्हीं मोह व आसक्ति का प्रतीक है।"

मेरे मन में एकांत था! नहीं एकांत नहीं! नीरवता थी! तूफ़ान के पहले वाली नहीं, उसके पश्चात वाली। दो क्षणों में मेरे मन में मानो दामिनी कौंधी थी और एक तूफ़ान आया था। और अभी, मैं स्तब्ध खड़ा था, शून्य- पूर्णत: शून्य! सत्य के इतना निकट आ गया था कि शायद उसको ग्रहण करने का भान तक नहीं हो पा रहा था मुझे।

आज भी कुछ यही है, मैं सुख के पथ पर चल रहा हूँ- सत्य के पथ पर चल रहा हूँ, किन्तु मन में वह आश्वस्ति वह स्पष्टता क्यों नहीं आई है? आपको लगेगा कि सत्य प्राप्त होने के पश्चात तो मुझे भान हो जाना चाहिए- परंतु नहीं! मैं पथ पर चल रहा हूँ- चलता जा रहा हूँ, भान होते हुए भी नहीं हो रहा है- तब भी वह आकुलता शेष नहीं है। चाहे लक्ष्य ज्ञात न हो परंतु पथ को मैंने तभी स्पष्टतया देख लिया था जब मैंने द्विविधा को तजकर वह कंगन नदी में फेंक दिया था और उसे मंद-मंद प्रवाह में बहते हुए देख रहा था; उसके स्फटिक पर सूर्य किरण पड़कर आभा उत्पन्न कर रही थी, स्वर्णिम आभा! जिसने मेरा पथ प्रकाशित किया था। मैं स्तब्ध सा खड़ा था तथा कंगन बहता चला जा रहा था, उसपर पड़ने वाली किरणें उस आभा से जल को आलोकित  करती जा रहीं थीं....

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