जादू था 
या तिलस्म,
एक वर्ष
कब का बीत गया
पता ही नहीं चला।
 
इस संसार में
बस दो ही थे
एक- दूसरे में खोये
सब चिंताओं से मुक्त।
 
क्या-क्या नहीं हुआ, 
लड़ना-झगड़ना, 
रूठना-मनाना, 
इंतज़ार करना। 
मिलने के लिए 
नए-नए बहाने बनाना 
उसकी 
एक 
मुस्कान के लिए 
कितनी-कितनी 
झूठी-सच्ची 
बातें बनाना।
शायद
सब झूठ था,
शुरू से 
आभास होता था, 
यह एक सपना है, 
एक जादू है 
जो सच नहीं है ।
रात ख़त्म होगी,
सपना टूट जाएगा 
लेकिन 
कैसे झूठ मान लूँ, 
ज़िंदगी 
सपना नहीं है,
जिसे भूल जाऊँ।
 
वह 
याद बनकर 
चुभती रहती है
नहीं-नहीं
काँटा नहीं,
सबसे अलग है
यह दर्द,  
यह चुभन,
यह घुटन,
यह उदासी ,
जो शब्दों से ,
बयां नहीं होती।

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें