बाग़ान - 2

क्षितिज जैन

अगले दिन ही मैंने कुछ साथियों से बात की। अब तक कई लोगों से दोस्ती हो गयी थी। झिबुआ, मंगल, सच्चे, शिवा, देवा इन सबसे मेरी दोस्ती थी। मैंने अपना उपाय रखा, सब मुझे ऐसे देख रहे थे जैसे मैंने कोई अकल्पनीय बात कर दी हो। झिबुआ तो आँखें फाड़-फाड़ कर मेरी ओर देख रहा था। 

"तू कहीं पागल तो नहीं हो गया है?" उसने पूछा।

"पागल तो तुम हो जो ऐसी गुलामी भरी ज़िंदगी जी रहे हो।"

"और तू क्या कर लेगा भाग कर?"

"कुछ भी करूँगा लेकिन इससे अच्छे तरीक़े से जीऊँगा।"

"कम से कम अपनी जान के लिए सोच देबू, अगर पकड़ में आ गए तो सारी ज़िंदगी नरक बन जाएगी।"

"तुम तो स्वर्ग में रह रहे हो सच्चे।"

"कैसे भी रह रहे हैं ज़िंदा तो हैं।"

"ठीक है, तुम ऐसे रहना चाहते हो यही सही। मुझे ऐसी ज़िंदगी से ज़्यादा मौत प्यारी है।"

शिवा और देवा ज़रूर मेरी बात से सहमत हो गए। हमने निश्चय किया कि कल रात को सबके सोने के बाद हम तीनों दाहिनी ओर वाली दीवार को सौ क़दम आगे से फाँद कर जंगल में चले जाएँगे। इन पहाड़ों में रास्ते ढूँढ़ना हमारे लिए कठिन नहीं था। एक बार हम थोड़ा आगे निकाल जाते तो फिर मैं सुरक्षित अपने गाँव पहुँच जाऊँगा।

झिबुआ ने मुझे समझाने की लाख कोशिश की मगर मेरी सनक के आगे उसकी एक नहीं चली, मैंने उससे यही कहा कि दोस्त! अगर तू इस दुनिया से मुक्त नहीं होना चाहता तो कम से कम मुझे होने दे, बस तेरा इतना अहसान बहुत रहेगा।

रात को हमने नियत स्थान से दीवार फाँदी और इतनी तेज़ हम जीवन में नहीं भागे थे। बागान कुछ पाँच सौ हाथ दूर चला गया था। मैंने मुड़ कर उस ओर देखा, गुमाश्ते की कोठरी में बत्ती जली हुई थी। उसकी रोशनी में वह बाग़ान मुझे बिलकुल उस चुड़ैल के घर जैसा लग रहा था जिसकी कहानी माँ सुनाया करती थी।

"रुक जा थोड़ी देर," शिवा बोला।

"थोड़ी देर और चल ले," मैं अब भी भाग रहा था।

"चलते हुए तीन पहर हो गए हैं, ऐसे करेगा तो मर जाएगा।"

मुझे भी महसूस हुआ, पैर पथरा गए थे हम सबके। अगर ऐसे ही चलता रहा तो मैं बेहोश होकर गिर सकता था। हम तीनों एक पेड़ के नीचे रुके। रुकने के बाद पैरों का दर्द मालूम हुआ। और दर्द बहुत तेज़ था, ऐसा लग रहा था कि उन्होंने काम करना बंद कर दिया था।

तभी देवा को घोड़ों की टापों की आवाज़ आई। हम तीनों बिना कुछ सोचे समझे भागे। मेरे मन में ऐसा भय कभी नहीं आया था, मेरे दिमाग़ ने सोचना बंद कर दिया था, मेरे हृदय ने मानो काम करना बंद कर दिया था, ऐसा लग रहा था मानो केवल पैर चल रहे हों, मेरे पथराते पैर किसी भी क्षण ढेर हो सकते थे।

तभी सामने से दो लोग आए। उनके हाथों में बंदूकें थीं। हमें रुकना पड़ा, लेकिन आज मैं इसे मूर्खता मानता हूँ। क्या होता अधिक से अधिक, मुझे मार डालते वे? मैं अभी जो ज़िंदगी जी रहा था वह किसी मौत से कम थी? कम से कम मुझे इन यातनाओं से छुटकारा तो मिल जाता। लेकिन शायद मानव स्वभाव ही ऐसा है कि सबसे पहले हम अपने प्राणों की सोचते हैं, हमारे जीवन की परिस्थितियाँ, हमारी समस्याएँ और दुख उस समय याद नहीं आते।

हम तीनों को रस्सी से बाँधा गया। मैं समझ गया था कि हमें दुबारा बाग़ान लेकर जाया जा रहा है। जब तक हम वापस बाग़ान पहुँचे मेरा चेहरा ऐसा हो गया था मानो किसी ने सारे प्राण सोख लिए हों, उसपर कोई भाव नहीं थे दुख, ग्लानि, निराशा या भय के। मेरा मन न कुछ बोल रहा था न कुछ सोच रहा था। किसी बुत की तरह हम बस चले जा रहे थे। किसी तरह के कोई भाव मेरे मन मे नहीं आ रहे थे। उसकी ग्रहण करने की शक्ति बिलकुल नष्ट हो गयी थी।

गुमाश्ता वही गालियाँ बकते हुए हमारे पास आया। दो नौकरों से हमें ख़ूब पिटवाया गया। नौकर निर्मम होकर हमें डंडों से पीट रहे थे। देवा तो बेहोश भी हो गया था। अब उन्होंने लात मारना भी शुरू कर दिया था। हम बुरी तरह लहुलूहान हो चुके थे, जगह-जगह से ख़ून बह रहा था।

"घर जाना है तुम्हें हरामियों, अब देखता हूँ तुम घर कैसे जाओगे। मैंने बड़े साहब से कह दिया है कि इन तीनों को कभी छुट्टी नहीं दी जाये और इनकी पगार भी कम कर दी जाये। बहुत शौक़ था ना भागने का, अब देखो।"

उसके शब्द हमारे हृदय पर वज्र जैसे पड़ रहे थे किन्तु मन अब भी जड़ बना हुआ था।

अगले दिन से हमें फिर से काम पर लगा दिया गया। झिबुआ ने मेरी ओर ऐसे देखा जैसे कोई पिता अपने बच्चे की ओर देखता है जो उसके कहने के उपरांत भी ग़लती करता है। मैंने उसकी ताड़ना का कोई उत्तर नहीं दिया।

अब से मेरे जीवन की शेष उमंग भी चली गयी। इस यातनापूर्ण जीवन में और शुष्कता आ गयी थी। मेरी मुस्कान मानों लुप्त सी हो गयी थी। अब बचा था क्या जीवन में? मैं कभी अपनी माँ से नहीं मिल पाऊँगा, मैं कभी अपने गाँव नहीं जा पाऊँगा, यह सोच-सोच कर मेरा हृदय क्षत-विक्षत हो जाता था। लेकिन अब भी आँखों से आँसू की एक बूँद भी नहीं गिरी!

अगले तीस साल!

तीस साल हो गए थे मुझे गुलामों की भाँति यहाँ मज़दूरी करते हुए उस घटना के बाद से। पाँच साल बाद से सरकार ने अनुमति देना चालू कर दिया था, लगभग हर मज़दूर को अनुमति मिल गयी थी, लेकिन एक के बाद दूसरी अनुमति तीन चार साल से पहले नहीं मिलती थी। बहुत से साथी काम छोड़कर जाना चाहते थे किन्तु गुमाश्ते ने अपनी चतुराई से उनको भयभीत कर बाँध लिया था।

तैंतीस साल से मैंने बाहर की दुनिया नहीं देखी थी। बाहर क्या हो रहा है, मेरे वे प्यारे दोस्त अभी भी वहीं है या वहाँ भी कोई बाग़ान लगा दिया है इन लोगों ने? मेरे गाँव में सब कैसे हैं? और सबसे बड़ी बात- मेरी माँ कैसी है? क्या वह है भी?

लेकिन मुझे यहीं घुटते रहने की सज़ा मिली हुई थी। मेरे सामने न जाने कितने मज़दूर आए किन्तु कोई भी ऐसी यातना नहीं भुगत रहा था जैसी मैं। मुझे नहीं लगता था कि मेरी माँ मुझे देखे बिना तैंतीस साल तक जी पाएगी। उसका कोमल हृदय इन आघातों को नहीं झेल पाया होगा।

एक शाम, मैं काम करके लौट रहा था। लेकिन उस शाम की सुंदरता का क्या वर्णन करूँ? ऐसी सुंदर संध्या मैंने इन सालों में नहीं देखी थी, शायद इस बाग़ान की सुंदरतम संध्या थी वह! सूर्य अपनी ईषत्‌ लाल आभा को बिखेरता हुए वृक्षों की झुरमुट के पीछे छिप रहा था। हरे-हरे वृक्षों की टहनियों से छन कर आ रही वह आभा एक अलग ही दृश्य दिखाती थी। बाग़ान की हरी-हरी कोंपलें मानो किसी ने चित्रित की थीं। आकाश में एक नीलिमा और एक लालिमा का अद्भुत मिश्रण था तथा धीमे-धीमे आते चाँद ने उसे अप्रतिम बना दिया था। वह नीलिमा गाढ़ी होती जा रही थी, तब भी यह दृश्य अकल्पनीय था। अस्ताचल के सूर्य की लालिमा और आकाश की नीलिमा तथा उसके मध्य चाँद! और नीचे धरती पर हरी हरी कोंपलें! मेरे गाँव में यह दृश्य इससे भी सुंदर होता, जब मैं इसके सौन्दर्य पर अभिभूत हो रहा था तो शायद उसकी तो कल्पना करना भी असंभव था।

मुझे दुबारा मेरे गाँव की और उन जंगलों- घाटियों की याद आ गयी। और अचानक मेरे कंठ से रुलाई फूट पड़ी। तैंतीस साल से जमे आँसू एक साथ बह निकले। मैं ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा, इतने सालों की पीड़ा, यातना और दुख बाहर आ रहे थे उन आँसुओं में।

"बाबा," एक नवयुवक ने मुझे पुकारा।

मैंने रोना बंद कर उसकी ओर देखा।

"रोते काहे हो?"

"तू नहीं समझेगा बेटा, तू नहीं समझेगा।" इतना कहकर मैं वहाँ से चला गया। उस लड़के ने मुझे अवश्य पागल समझा होगा।

इन कुछ महीनों में बाग़ान बड़ा हो गया था। आगे की दीवार को तोड़ कर उसे बढ़ा दिया गया था। मैंने उसे पास से देख रखा था, वहाँ कोई दीवार अभी तक नहीं बनाई गयी थी, इसपर विचार हो रहा था लेकिन काम शुरू नहीं हुआ था।

मेरे दिमाग़ में उपाय आया। अभी सर्दियाँ ज़ोर पर थी। धुँध में इस बाग़ान से आगे जाना मुश्किल नहीं होगा। हाँ, आगे यह टीला समाप्त होता था उसके कारण ढलान अवश्य थी। इस कारण सावधानी के आवश्यकता थी अन्यथा अगर मैं गिरता तो जान जाने की भी संभावना थी।

मेरे मन ने दृढ़ निश्चय कर लिया था। अब यह गुलामी और नहीं सही जाएगी। यदि ढलान में गिर कर मर भी जाऊँ तो भी वह इस जीवन से अच्छी होगी। इतना साहसी मैं स्वयं को आज से तीस साल पहले उस रात्रि को कर रहा था। इस बार मैं आज़ाद हो जाऊँगा, हाँ, इस बार! 

उस शाम धुँध भी काफ़ी थी। सब काम करके लौट रहे थे लेकिन मैने जान-बूझकर उस दिन थोड़ा देरी से आकर वह हिस्सा चुना था। मैं आख़िरी पत्तियों को तोड़ने के बहाने वहीं पर रहा। जैसे ही देखा कि अब सब जा रहे थे, मैंने चुपके से बाड़ को फलाँगा। अब आगे ढलान थी और घना जंगल।

मैंने सावधानी से पैर आगे रखा। पेड़ों को सहारा बनाकर मैं धीमे-धीमे नीचे उतर रहा था। धुँध घनी होती जा रही थी। पाला पड़ता दिख रहा था। सर्दी कड़ाके की होगी, मैंने सोचा। लेकिन मन एक बार भी घबराया नहीं।

अब आगे का कुछ भी देखना मुश्किल हो गया था। पेड़ों की आकृति ही दिख रही थी, अब मुझे अनुमान से ही काम करना था। लेकिन भाग्य मेरी परीक्षा लेने को तत्पर था। मैं एक पत्थर के कारण फिसल गया और मैं रगड़ता हुआ नीचे फिसलता ही गया। मुझे महसूस हुआ कि मेरे माथे से रक्त बह रहा है और जिससे पहले और कुछ पता चलता, मैं मूर्छित हो गया.…

जब मैं चेतन हुआ तो सिर दर्द के मारे फटा जा रहा था। मैंने उठने की कोशिश की मगर वह असफल हुई। मैं पीड़ा के मारे कराह रहा था। मेरे हाथ पैरों से भी रक्त बहा था। मैंने आस-पास देखा तो ऐसा लगा कि ढलान समाप्त होने को ही हो।

दो लकड़हारे इसी ओर आ रहे थे, मैंने अपनी पूरी शक्ति से उन्हें आवाज़ लगाई-

"भैया! ओ भैया!"

मेरी आवाज़ सुन दोनों दौड़े चले आए।

"अरे, तुम्हारे तो बहुत चोट आई है," एक लकड़हारा बोला।
"इसको गाँव ले चलते हैं।"

दोनों ने कुछ निश्चय किया और मुझे उठाकर गाँव की ओर ले गए। इतने में मैं दुबारा चेतन से अचेतन हो गया था।

जब मैंने आँखें खोलीं तो तो एक वृद्ध मेरी मरहम पट्टी कर रहा था। मैंने हिलने-डुलने की चेष्टा की तो उसने संकेत से बरजा।

"चोट कैसे लग गयी भाया?"

मैंने कुछ नहीं बोला।

उसने दुबारा पूछा।

मैंने इस बार भी कोई उत्तर नहीं दिया।

"चलो कोई बात नहीं। बोलने की हालत में नहीं हो। इस स्थिति में न बोलना ही अच्छा है।" दो दिन तक मैं वहाँ रुका। अच्छा यह हुआ कि मेरे पैर में चोट नहीं आई इसलिए मैं चल पा रहा था। एक दिन मैंने उस वृद्ध को दूसरे व्यक्ति से बात करते हुए सुना- 

"पास वाले बाग़ान में एक मज़दूर ढलान से गिर कर मर गया। पूरे बाग़ान में हड़कंप है, उसकी लाश भी नहीं मिली। कलक्टर साब के पास भी मामला गया है।"

"हो सकता है कि वह ज़िंदा हो।"

"अरे नहीं, पचास से ऊपर का था, गिरता तो मरता।"

"कहीं यही आदमी तो नहीं जिसे ठहरा रखा है?"

यह सुनते ही मेरी शिराओं में भय दौड़ गया।

"मुझे नहीं लगता, क्योंकि इसने बताया कि यह कुछ औषधियाँ लेने गया था, तो गिर गया।"

"एक बार दुबारा सोच लो।" उस व्यक्ति को अब भी विश्वास नहीं हो रहा था।

मैं अपने बिस्तर पर लेट गया। मैंने निश्चय कर लिया कि कल सुबह मैं हर हालत में यहाँ से निकल जाऊँगा। और मैंने किया भी ऐसा ही, उन्होंने रोकने का प्रयास किया किया किन्तु मैंने कहा कि घर पर सब मेरी चिंता कर रहे होंगे।

मैंने तय कर लिया था कि मैं अपने गाँव जाऊँगा। मैं आज़ादी के एक-एक क्षण, एक-एक पल का उत्सव कर रहा था। यह आज़ादी तैंतीस साल लंबी गुलामी के बाद मिली थी, इसका एक पल भी मैं खोना नहीं चाहता था।

बाग़ान वालों ने मुझे मृत समझ लिया था। मैं हँसा, यह मेरे लिए अच्छा ही हुआ, अब कोई मुझे दुबारा पकड़ने के लिए नहीं आएगा। शायद मैं उन गिने-चुने व्यक्तियों में था जो अपने आप को मृत घोषित किए जाने पर प्रसन्न हुआ हो। मुझे किसी चीज़ की चिंता नहीं थी, न मेरी पहचान की, न मेरी संबंधियों की। उनकी दृष्टि में मैं मर गया होऊँ तो मर जाने दो। मैंने एक नयी शुरुआत करने का निर्णय किया। जितने साल भी इस दिन से जीऊँगा एक नयी पहचान के साथ जीऊँगा।

मैं अपने गाँव पहुँचा।

तैंतीस साल बाद!

बदल कर भी यह गाँव नहीं बदला था। वैसा ही था जब मैंने तैंतीस साल पहले इसे छोड़ा था। मैं सुध-बुध छोड़ अपनी झोंपड़ी की ओर भागा। लेकिन वहाँ का दृश्य पूरी तरह बदल चुका था। मेरी झोंपड़ी अब कुछ टूटी-फूटी लकड़ियों और घास-फूस में परिवर्तित हो चुकी थी। मैं पागलों की तरह वह सामान ढूँढ़ने लगा जो मेरी माँ ने जी तोड़ परिश्रम कर एकत्रित किया था। मेरी आँखों से आसुओं की धाराएँ बहने लगी। मैं घुटनों के बल बैठ रोने लगा, वही हुआ जिसका डर था, मेरी माँ प्रतीक्षा करते करते चली गयी लेकिन उसकी प्रतीक्षा समाप्त न हुई। कितनी यातनाएँ सहीं होंगी माँ तूने! जीवन में तुझे कभी सुख नहीं मिला! कैसे जिये तूने ये साल! क्या एक-एक दिन तुझे हज़ार घाव नहीं पहुँचाते होंगे?

आपको मैंने सारी कहानी बताई, लेकिन उस दिन की अपनी मनोवृत्ति को, मेरी हालत को, मैं कभी वर्णित नहीं कर पाऊँगा, मैं कभी नहीं बता पाऊँगा कि उस दिन मैंने कितने आँसू बहाये थे, माँ की याद बिच्छू के डंक के समान मुझे चुभन दे रहे थे। तैंतीस साल की प्रतीक्षा इस तरह समाप्त होगी इसको जानकर भी मैंने अनजाना किया हुआ था। हमारी झोंपड़ी थी भी गाँव से थोड़ा हटकर। अगले दिन ही मैंने नयी झोंपड़ी बनानी चालू कर दी। किसी ने नहीं पूछा, शायद यह गाँव भूल गया था कि यहाँ एक बुढ़िया का घर था जो अपने बेटे की प्रतीक्षा करते हुए चल बसी थी।

मुझे विश्वास था कि माँ मेरी कमाई को कहीं सुरक्षित छोड़कर जाएगी। मैंने हर कोना छाना, घर का एक-एक हिस्सा याद था। यहाँ कमरा, यहाँ रसोई। रसोई में चूल्हा कहाँ था यह भी याद था मुझे। और उस जगह को खोदा तो देखा कि एक घड़े में मेरी कमाई के पैसे रखे हुए हैं। ओह माँ! तुम आख़िरी साँस तक विश्वास करती रही कि तुम्हारा बेटा आएगा। जो पैसे मैंने भेजे वह भी तुमने मेरे लिए सँभाल कर रख लिए। मेरी नम आँखों से दुबारा आँसू बहने लगे। मैं उसी मिट्टी से लिपट कर रोने लगा।

अगली सुबह तक झोंपड़ी तैयार थी। मैं काम पूरा होते ही घाटी की ओर भागा। मेरे दोस्त इतने सालों से मेरी प्रतीक्षा कर रहे होंगे। मैं उनसे माफ़ी माँगूँगा, कहूँगा कि तुम्हारा दोस्त अपनी जान पर खेल तुम्हारे पास आया है। फिर मैं पुन: बच्चा बनकर उन झाड़ियों में, उन पौधों में और प्रकृति में खो जाऊँगा।

प्रकृति बड़ी उदार होती है। इतने वर्ष दूर रहने के बाद भी वे मुझ से तनिक भी नहीं रूठे थे। मानव से अधिक क्षमाशीलता प्रकृति में होती है। शाम तक मैं वहीं पर रहा, सूर्यास्त होने के बाद गया। जाते-जाते उनसे कहा कि अब मैं हमेशा के लिए यहाँ पर आ गया हूँ। अब कभी तुम्हें छोडकर नहीं जाऊँगा। अगर तैंतीस नहीं तो अगले तीन साल तो मैं तुम्हारे सानिध्य में रहूँगा।

मैंने अपनी झोंपड़ी पुरानी वाली के अनुसार ही बनाई थी। वह कोना जहाँ मैं माँ के साथ सोता था, सोने का बिस्तर वहीं बनाया था। मेरा जीवन एक कठोर यात्रा थी, एक कठोर यंत्रणा थी, और उससे थक कर बेटा दुबारा माँ के पास आ गया था। जैसे उसे नींद आ रही हो और वह उसे सोने के लिए बुला रही हो। मैं बिस्तर पर गिर पड़ा, और उस समय मुझे यही अनुभूति हुई कि  मैं अपनी माँ की गोद में लौट आया हूँ. . .!

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