बाग़ान - 1

क्षितिज जैन

आपको पता है कि हम इन्सानों की पूरी ज़िंदगी किसके चारों ओर घूमती हुई निकल जाती है? आप कहेंगे- परिवार, बाल बच्चे, घर-बार, लेकिन नहीं। हमारी ज़िंदगी निकल जाती है नौकरी के चारों ओर घूमते हुए। मैं गँवार अनपढ़ आदमी, आसाम के पहाड़ी गाँव में रहने वाला। मेरा नाम देबू है। सच बताऊँ तो हम इन्सानों का जन्म लेने का उद्देश्य ही यही रह गया है, बड़े होओ, कोई काम धंधा ढूँढ़ो, घर सम्हालो और मर जाओ। बस! सारा जीवन इसी में निहित है।

आपको लग रहा होगा कि मैं बौरा गया हूँ। अरे भई माना कि नौकरी बहुत ज़रूरी है लेकिन क्या आपको पता है कि इस के कारण कुछ लोगों का जीवन एक ऐसा शून्य हो जाता है जहाँ उसका अस्तित्व केवल उसके काम और उससे मिली तनख़्वाह तक रह जाता है, उसकी सार्थकता, जीने का मतलब, ज़िंदगी, सब उसमें मिल जाते हैं।

और मैं उनमे से एक हूँ।

मेरा गाँव काफ़ी ऊँची पहाड़ी पर है, पानी की कमी होने के कारण खेती भी ढंग से नहीं हो पाती। इस कारण हमारे गाँव का ग़रीबी से बड़ा गहरा संबंध था। मेरे पिता जी को गए हुए बहुत साल हो गए थे, जब मैं बहुत छोटा था तभी वे मुझे और मेरी माँ को छोड़कर इस दुनिया से विदा ले गए थे। ग़रीबी का मेरे घर में राज था। माँ थोड़ी बहुत खेती और मज़दूरी से पेट पालती थी। मैंने कभी उसे दो जून का खाना खाते हुए नहीं देखा। दोपहर के खाने में से भी वह थोड़ा सा हिस्सा मेरे लिए बचा कर रख देती थी ताकि मैं शाम को भूखे पेट न सोऊँ।

मैं धीमे-धीमे बड़ा हुआ, माँ को मुझसे उम्मीद थी कि मैं काम करके उजड़े हुए घर को दुबारा सँवार दूँगा। हर माँ की, ख़ासकर उसकी जो अपने बच्चे की माँ भी रही हो और पिता भी, एक ही चाह, एक ही उम्मीद रहती है कि उसकी संतान ख़ूब कमाकर उसके दुखों को ख़त्म कर दे। और मेरा भी यही सपना था कि मैं इतना कमाऊँ कि मेरी माँ को किसी के यहाँ मज़दूरी नहीं करनी पड़े।

लेकिन यह सब इतना आसान नहीं था ना!

खेती से कोई अच्छी कमाई नहीं होती थी, उसके भरोसे मैं घर नहीं चला सकता था। कुछ और काम क्या था, लकड़ी काट कर बेचता कहाँ, ऊपर से गाँव में पहले से ही कई ऐसे लकड़हारे थे, हमारे मुक़ाबले उनकी माली हालत बहुत अच्छी थी, वे किसी को भी यह काम करने नहीं देते थे।

इन्हीं दिनों गाँव में वह ख़बर आई!

हमने सुना तो था कि इन गोरे साहबों ने हमारी ज़मीनों पर खेती चालू कर देती थी, जिसे वे बाग़ान कहते थे। पता नहीं कौन सी पत्तियाँ उगाते थे वह, हमने तो बस सुना था कि वह ख़ूब बिकती थीं। उन्होंने लोगों को मज़दूरी करने के लिए रखना भी चालू कर दिया था। हमारे गाँव से आज तक कोई नहीं गया था मज़दूरी के लिए इन बाग़ानों में। किन्तु पिछले हफ़्ते ही कुछ लोग गाँव में आए थे, ख़ुद को गोरे साहबों का नौकर कह रहे थे। उन्होंने कहा कि साहबों को बाग़ानों के लिए मज़दूर चाहिएँ। गाँव के मर्द लोग आ सकते थे। महीने का एक रूपया मिलना था।

यह ख़बर आग की तरह हमारे गाँव में फैल गयी, मेरे अनेक दोस्त तैयार हो गए। मेरी माँ ने भी मुझसे इस बारे में बात की। मुझे अपना गाँव नहीं छोड़ना था। यहाँ के पेड़-पेड़ से, हर घाटी से, हर ढूह से मेरी दोस्ती थी, वे मेरे आत्मीय मित्र थे। इस मिट्टी को छोड़कर मैं कहीं नहीं जाने वाला था। यह गाँव मेरा था और इसे छोड़कर जाने का मैं सोच भी नहीं सकता था, मैंने यह बात टाल दी।

किन्तु, माँ की बेबस और निरीह आँखों के आगे मुझे झुकना पड़ा। उन आँखों के आँसू, और उन आँसुओं में झलकते दुख, दर्द और आशाओं ने मुझे पिघला दिया। जैसे परिवार वाले किसी युवक को उसकी प्रेयसी से अलग कर देते हैं, वैसे ही इन आँसुओं ने मुझे मेरी जगह से अलग कर ही दिया। मैंने अपना नाम लिखा दिया और दस दिन बाद मैं चल पड़ा। लेकिन मुझे क्या पता था कि मैं एक अलग जगह नहीं, एक अलग दुनिया में जा रहा था।

जब मैंने बाग़ान को पहली बार देखा तो मेरी आँखें फटी की फटी रह गईं। इतनी बड़ी जगह में केवल पत्तियाँ ही पत्तियाँ! हमें इन पत्तियों को चुनकर टोकरे में डालना था। मैं काम जल्दी समझ गया। फूल पत्ती की पहचान वैसे ही अच्छी थी, अट्ठारह साल उनके साथ ही तो रहा था। सैंकड़ों लोग उसमे काम कर रहे थे। कुछ लोग, जिन्हें सब गुमाश्ता कह रहे थे (मुझे यह नाम शुरू-शुरू में बड़ा अजीब लगा था) सबको हुक्म दे रहे थे। मुझे लगा ये ही मालिक होंगे। उन्होंने हमें भी देखा और अगले दिन से काम पर आने को कहा। हमें साल के दो जोड़े कपड़े देने को भी कहा। पैसे वे हमारे घरवालों के यहाँ पहुँचाने वाले थे। हमने हाँ कर दी।

मुझे झोंपड़ी में लाया गया । मेरे साथ एक और मज़दूर था। वह पुराना दिखता था। उसका नाम झिबुआ था। वह दो सालों से यहाँ काम कर रहा था। मैंने उससे गुमाश्ता के बारे में पूछा तो उसने हँस कर कहा-

"अरे वह मालिक नहीं, नौकर है।"

"वह नौकर है?" मुझे विश्वास नहीं हुआ।

"हाँ, गोरे साब का नौकर।"

"वह क्या करता है?"

"हम पर क़ाबू रखता है, यह देखता है कि हम सही से काम कर रहे हैं या नहीं।"

उसने मुझे बहुत सी चीज़ें और बताईं, जल्द ही उसे नींद आ गयी। शायद वह दिन भर का थका हुआ था। मैं लेटा रहा। बार-बार मेरी आँखों के सामने माँ की तस्वीर आ रही थी। आज तक एक दिन भी मैं उससे अलग नहीं हुआ था। लेकिन मैं अब महीनों तक उससे दूर रहने वाला था। पता नहीं छुट्टियाँ कब मिले!

मेरी दृष्टि उस पोटली पर पड़ी जो माँ ने मेरे लिए बाँधी थी। उसमे खाने की चीज़ें थीं, जो माँ ने बनाई थीं। उन्होंने भगवान शिव से मेरे लिये प्रार्थना की और मेरे हाथ पर एक धागा बाँधा। ओह माँ! मेरी आँखों से आँसू बहने लगे और मेरी बोझिल आँखें नम होकर बंद हो गईं।

अगले दिन से काम चालू किया। जितना लगता था, काम उससे भी मुश्किल था। पीठ पर वह टोकरा बाँधे तन दुखने लगता किन्तु काम रुकना नहीं था। रुकते वैसे ही गुमाश्ते की गालियाँ सुनाई देतीं। कई बात तो वह छड़ी से मज़दूरों को पीटा भी करता था। एक बार उसने झिबुआ को किसी बात पर ग़ुस्सा होकर छड़ी से मारा। किसी की हिम्मत तक नहीं हुई उस ओर देखने की। सब अपना-अपना काम करते रहे मानो कुछ हो ही नहीं रहा हो। रात को मैंने उससे पूछा -

"उस गुमाश्ते ने तुम्हें इतना मारा तब भी तुमने कुछ क्यों नहीं किया?" मैं ग़ुस्से से बोला मानो उसे उसकी कायरता के लिए लताड़ रहा हूँ।

"क्या करता?" उसने हँस कर कहा।

"उसे मारते ससुरे को। एक पड़ता और ज़मीन पर लोट रहा होता।"

"फिर गोरे साब मुझे सूली पर चढ़ा देते।"

"ऐसे कैसे? ग़लती उनके नौकर की और सज़ा तुम्हें।"

"राज गोरे साब करता है, क़ानून उसका है। जो वह करे वह सही। अगर तुम्हें अपनी जान प्यारी है तो चुपचाप काम करते रहो वरना बुरा होगा।" झिबुआ के स्वर में जो चेतावनी थी उससे मैं वास्तव में डर गया था।

काम की आदत डालने में काफ़ी समय लगा, दिन में बारह-बारह घंटे काम कराया जाता था हमसे, कभी-कभी तो पंद्रह घंटे तक काम करना पड़ता था हमें। उसपर भी खाना ऐसा नहीं मिलता था जो इतनी मेहनत की बराबरी कर सके।  

दो महीनों में ही मैं सूख गया। सारे मज़दूरों की यही हालत थी। यह साफ़ अन्याय था,जब नौकरी देने की बात की थी तब कहा गया था कि रहन-सहन की व्यवस्था अच्छी होगी, किन्तु यहाँ पर तो हम मज़दूरों का उत्पीड़न हो रहा था। गुमाश्ता हमसे ऐसा व्यवहार करता था जैसे हम इंसान नहीं जानवर हों जिन्हें इन खेतों में हाँक दिया गया हो। एक दिन क्रोधित होकर मैंने गुमाश्ते को ऊँची आवाज़ में कहा तो मेरा भी वही हाल हुआ जो झिबुआ का हुआ था। अब तक मैं इतना तो समझ गया था कि यहाँ कोई सुनवाई नहीं थी, मज़दूर नौकर नहीं, गुलाम थे और उनका एक ही काम था,इन पत्तियों, जिन्हें चाय कहा जाता था, तोड़कर टोकरी में भरना। मेरा जीवन बाग़ान की क्यारों और उस पत्ती की टोकरी तक ही सीमित रह गया था। कई बार ऐसा लगता था कि छोड़-छाड़ कर चलता बनूँ, फिर दुबारा माँ की याद आ जाती। अभी चाहे मैं कष्ट उठा रहा हूँ परंतु वह बेचारी तो सुख से हैं न! और मैं एक आह भरकर अगले दिन के काम में लग जाता। पहले तो शरीर बहुत दुखता था,पर उसे भी धीमे-धीमे आदत सी पड़ गयी थी। हाँ, अब भी जिस दिन पंद्रह घंटे काम करना होता उस दिन पीठ कड़क कर पत्थर हो जाती थी, अधिक पीड़ा के कारण नींद भी नहीं आती थी और अगले दिन वही गुमाश्ते की गालियाँ और डंडे सहने पड़ते। कभी पत्ती चुनने में कोई ग़लती हो जाती तो गुमाश्ता एक मोटा सा पोथा खोलता और मेरे नाम के आगे एक निशान बना देता। बाद में पता चला कि इसका मतलब था तनख़्वाह की कटौती।

मुझे काम करते हुए छह महीने हो गए, घर की याद आ रही थी। मैंने छुट्टी के लिए निवेदन किया तो गुमाश्ते ने साफ़ मना कर दिया कि अभी छुट्टी नहीं मिलेगी। मैंने उसे मनाने की कोशिश की लेकिन उसने मुझे झिड़क कर भगा दिया। कुछ दिनों में ही मुझे पता चल गया कि छुट्टियाँ कब मिलेंगी.…

एक दिन गोरे साहब किसी सेठ के साथ बाग़ान को देखने आए। यह समाचार हम सबमें फैल गया। हम कुतूहलवश काम करते हुए भी उनकी ओर बार-बार देख रहे थे। आज गुमाश्ता भी उनकी आगे पीछे घूम उनकी चापलूसी कर रहा था । सेठ और गोरा साहब कुछ बात कर रहे थे।

" आपको तो इनलेंड एमिग्रेशन एक्ट के बारे में पता होगा मिस्टर हरराय।"

"जी कलक्टर साहब।"

"आपके नज़र में यह एक्ट कैसा है?"

"कंपनी ने ठीक ही किया है मिस्टर जैक्सन, इन मज़दूरों से अगर सही से काम कराया जाये तो अंत में फ़ायदा कंपनी का ही होगा।"

"यह बात तो ठीक फ़रमाते हैं आप," मिस्टर जैक्सन ने कहा।

मैं वहीं पर काम कर रहा था, उनकी बातें किसी और बोली में हो रही थी इसलिए मुझे कुछ भी समझ नहीं आ रहा था किन्तु वह सेठ मज़दूरों की ओर इशारा करके कुछ कह रहा था, यानी बात हमसे जुड़ी हुई ही थी।

अगले दिन गुमाश्ते ने जो घोषणा की उससे हमारे ऊपर मानो बिजली ही गिर पड़ी। उस दिन बाग़ान में ऐसा मातम छाया रहा मानो हर किसी के घर में किसी की मृत्यु हो गयी हो, और सच में, मृत्यु तो हो गयी थी, हमारी मृत्यु! दुनिया के लिए आज से हम जीवित मृत एक समान थे। गुमाश्ता कह रहा था-

"सरकार मज़दूरों के लिए नया क़ानून लाई है। इस क़ानून के तहत मज़दूर इस बाग़ान से तब तक बाहर नहीं निकल पाएँगे जब तक मालिक उन्हें अनुमति नहीं दे दे। यानी, बिना साहब की अनुमति के, तुम इस बाग़ान से बाहर नहीं जा सकते। अगर उन्होंने अनुमति नहीं दी, तो तुम्हें  यहीं रहना पड़ेगा। छुट्टियाँ देना न देना उनके हाथ में है।"

हम सब पर गाज गिर गयी थी, एक क्षण के लिए भयंकर नीरवता थी, तत्पश्चात सैंकड़ों मुँह एक साथ खुल उठे।

"ऐसे तो साहब दस साल छुट्टी न दें तो क्या हम यहीं क़ैद रहें?"

"हाँ, अगर सरकार इजाज़त न दें तो दस क्या, पचास साल तुम्हें यहाँ रहना होगा," गुमाश्ता के स्वर में उद्दंडता थी।

"यह तो सरासर नाइंसाफ़ी है।"

"अबे ये क़ानून है, और क़ानून तोड़ने वालों के साथ सरकार क्या करती है पता है?"

हम सब जब वापस जा रहे थे, तब ऐसा लग रहा था कि यह बाग़ान नहीं शमशान हो और हम जीवित मुर्दे! मेरे मन माँ की याद में तड़पा जा रहा था, क्या मैं कभी उससे मिल पाऊँगा? मेरी आँखें भर उठीं।

बीहू निकट ही था। हमने छुट्टी की अर्जी लगाई यह कहते हुए कि बीहू पर हमारा गाँव लौटना ज़रूरी था। लेकिन मालिक साहब ने किसी की अर्जी नहीं मानी। किसी को भी बाहर जाने की अनुमति नहीं मिली। बीहू पर भी हम घर नहीं जा पाएँगे, यह सोच हमारे गाल गीले हो रहे थे, कोई अपने बाल-बच्चों की याद में रो रहा था, कोई अपने माँ-बाप से नहीं मिला था। मुझे भी तो माँ की याद आ रही थी, मगर हम सबके पैरों में बेड़ियाँ बँधीं हुईं थीं।

देखा आपने, केवल इस नौकरी के कारण, नौकरी क्या मज़दूरी के कारण, मैं इंसान से जानवर हो गया था, स्वतंत्र से गुलाम हो गया था। मेरा दिन चालू होता था चाय के बाग़ान में और ख़त्म होता है वापिस अपनी झोंपड़ी में जाकर, मात्र अगले दिन वहीं आने के लिए! चाय का बाग़ान! शायद मेरा जीवन, मेरा संसार, सब कुछ बन गया था। यह मेरी जेल भी थी और मेरी दुनिया भी!

ऐसे ही दो साल बीत गए! 

दो लंबे साल!

दो साल नहीं दो युग!

एक-एक दिन, एक-एक घड़ी मेरे लिए यातना के समान थी। हर दिन एक धीमे विष जैसा होता था, जो मेरी नसों और रक्त में मिलकर मुझे भीतर से मारता जा रहा था। वह एक रुपया इस यातना का फल था, मेरी कमाई थी। लेकिन उससे ज़्यादा, वह एक रुपया वह ज़ंजीर थी जिसने मुझे बाँध कर रखा था, वह एक रुपया मेरे जीने मरने का पर्याय बन गया था। पैसा मानव को ख़रीदता ही नहीं, उसमे उसकी आत्मा को छीनने की शक्ति होती है।

मुझे बाग़ान में काम करते हुए तीन साल हो गए थे, आजतक मैंने किसी मज़दूर को बाहर जाते हुए नहीं देखा था। तीन बीहू निकल गए थे परंतु मैं अपनी माँ के पास नहीं जा पाया था। वह जीवित भी थी इसका कोई अनुमान नहीं था। आप कहेंगे कि वह बहुत बड़ी तो नहीं होगी, सही कहा, वह तियालीस साल की ही थी, मगर इतने सालों के शुष्क जीवन और कठोरता ने उसको बहुत पहले ही बूढ़ा बना दिया था। और मेरी बूढ़ी माँ का हृदय इतना मज़बूत नहीं रहा था कि वह तीन साल तक अपने बेटे से दूर नहीं रह सकती थी। 

मुझे बाहर की दुनिया का कुछ पता नहीं था, वे घाटियाँ, वे फूल, उन फूलों पर मँडराती तितिलियाँ और वे पुष्प जो जंगल को ऐसा रंगीन चित्र बनाते थे जिसे देख कोई भी कह दे कि प्रकृति अपने आप में कलाकार है, रसिक है। इन वनों के रूप में वह चित्रकारी करती है, झरनों के रूप में वह संगीत कला का प्रदर्शन करती है, और भौरो की गुंजार उसकी कविता है। जब बारिश की बूँदें वृक्षों पर पड़तीं है जो उनका झूमना प्रकृति का नृत्य होता है। घाटियों की ढूँढ़ उन प्रेमियों के लिए होती है जो कहीं ऐसी जगह छिप जाना चाहते हों जो कहीं दूर हो, बहुत दूर! और जहाँ उन्हें कोई न देखे। इन्हीं के बीच मेरा गाँव, मानो माँ की गोद में सोया बच्चा, वह भी तो प्रकृति की ही सुंदरता है।

अपने इन मित्रों से, अपनी प्रकृति से मैं तीन साल से नहीं मिला था। ये चाय के बाग़ान भी प्रकृति की देन थे, लेकिन इस अथाह सागर को देख ऊब होती थी, एक समय के बाद मन उसमे नहीं रमता था, यह मेरी प्रकृति की तरह कहाँ था जिसमे इतनी विविधता थी कि प्रतिदिन कुछ न कुछ नया दिखता था। यह चाय का बाग़ान उन सैलानियों के लिए तो बड़ा अच्छा था जो शहरों से यहाँ आए हो, लेकिन मेरे लिए यह अब क़ैदख़ाना हो गया था। यह मेरे स्वर्ग जैसा कभी नहीं हो सकता था, कभी नहीं। 

बीहू आ रही थी, दुबारा!

सरकार के लिए यह बाक़ी किसी दिन की तरह था, जिसमें हमें बाग़ानों में अपना काम करना होता था। किन्तु हमारे लिए वह जीवन की प्रसन्नताओं का प्रतीक था। इसी दिन हम अपने जीवन के दुखों और अभावों को भूल जीवन का उत्सव करते थे। जैसा हमें उम्मीद थी, इस बार भी हमें कोई अनुमति नहीं मिली थी। 
अब मुझसे नहीं रहा गया। यह कैद अब असह्य हो गयी थी। मैंने निश्चय किया बग़ावत का निश्चय!
हाँ, मैं बग़ावत करने वाला था...

 

- क्रमशः

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