27-11-2014

अर्थ छिपा ज्यूँ छन्द

विश्वम्भर पाण्डेय 'व्यग्र'

बादल में बिजुरी छिपी, अर्थ छिपा ज्यूँ छन्द।
वैसे जीवन में छिपा, नर तेरा प्रारब्ध॥

 

रिश्ते, रिसते ही रहे, रीत गया इंसान।
आपाधापी स्वार्थ की, भूल गया पहचान॥

 

देह-नेह की कचहरी, मन से मन की रार।
क्या फर्क पड़ता उसे, जीत मिले या हार॥

 

चूल्हा अपनी आग से, सदा मिटाये भूख।
लगी आग विद्वेष की, राख हुये सब रूख॥

 

प्रश्नचिह्न से दिन लगे, सम्बोधन सी रात।
अल्पविराम सी शाम है, विस्मय हुआ प्रभात॥

 

सपनों सी लगने लगी, वो रात की नींद।
मानों बूढ़े पेड़ की,नहीं रही उम्मीद॥

 

तारे गिनते बीत गई, उस बूढ़े की रात।
तन से ना मन से सही, यादों की बारात॥

 

बिना ज्ञान के आदमी, प्राण बिना ये देह।
जैसे मरघट सा लगे, सूना-सूना गेह॥

 

बिन अनुभव का आदमी, बिना लक्ष्य की नाव।
क्या जाने उसका भला, कहाँ होय ठहराव॥

 

आप-आप की रटन में, है लौकिक व्यवहार।
'तुम' में आता झलकता, सच अंदर का प्यार॥

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