04-01-2019

जब गुज़रता हूँ, उन अँधेरी गलियों से,
जब पूछता हूँ, उन अधखिली कलियों से
ऐसा क्यों होता है, मेरे साथ?

क्यों पाँवों में बेड़ियाँ सी पड़ जाती हैं,
ज़ुबान क्यों अटक सी जाती है,
शायद एक ही जवाब है, मेरे पास
ऐसा क्यों होता है, मेरे साथ?

क्यों भंगुर होती मिट्टी को रोक नहीं पाता,
क्यों उसके बारे में सोच नहीं पाता,
निशा भी कभी-कभी इतनी लम्बी हो जाती है,
पूछ ही नहीं पाता सूरज से,
ऐसा क्यों होता है, मेरे साथ?

सपने भी उसके अधूरे से रह जाते हैं,
पूरे होने से पहले ही टूट जाते हैं,
चिड़िया भी मुझसे पहले चुन लेती है, दाना
मकड़ी भी बुन लेती है, अपना ताना-बाना
बस रह जाता हूँ, अकेला
इस रेत के समन्दर में
ऐसा क्यों होता है मेरे साथ?

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