ज़िन्दगी जिन्दाबाद: पीड़ा के विरुद्ध ज़िन्दगी की घोषणा

01-02-2026

ज़िन्दगी जिन्दाबाद: पीड़ा के विरुद्ध ज़िन्दगी की घोषणा

डॉ. लखनलाल पाल  (अंक: 293, मार्च प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

पुस्तक: ज़िन्दगी जिन्दाबाद (आत्मकथा) 
लेखक: डॉ. कुमारेन्द्र सिंह सेंगर 
प्रकाशक: श्वेतवर्णा प्रकाशन, नोएडा 
मूल्य: ₹299.00

‘ज़िन्दगी जिन्दाबाद’ डॉ. कुमारेन्द्र सिंह सेंगर जी की आत्मकथा है। आत्मकथा का यह दूसरा भाग उनके जीवन की एक ऐसी दुर्घटना पर केंद्रित है, जिसे पढ़ते हुए पाठक के भीतर लगातार एक टीस उठती रहती है। कई जगह पढ़ते-पढ़ते रुकना पड़ता है। यह रचना केवल पढ़ी नहीं जाती, बल्कि उसके दर्द को जीवंत रूप में महसूस किया जाता है। घटना अत्यंत पीड़ादायक और मर्मस्पर्शी है, किन्तु लेखक जिस सहजता से उसे अभिव्यक्त करता है, वह क़ाबिल-ए-तारीफ़ है। भाषा का प्रवाह इतना स्वाभाविक है कि पाठक बिना किसी अटकन या भटकन के उसके साथ बहता चला जाता है। 

यह आत्मकथा पीड़ादायक होते हुए भी कहीं भी सहानुभूति अर्जित करने का प्रयास नहीं करती। लेखक बस कहता चला जाता है—अपने अपनों के साथ, अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ। पीड़ा को पीते हुए, उसी पीड़ा के बीच वह अपने लिए हँसी-ठिठोली का एक छोटा-सा अंतराल निकाल लेता है। इस मर्माहत पीड़ा को वह अकेले ही सहने का प्रयास करता है, ताकि परिवारजन उसके दर्द को जान न सकें। 

22 अप्रैल 2005 की शाम लेखक का ट्रेन से भीषण एक्सीडेंट हो जाता है। एक पैर जाँघ से कटकर दूर जा गिरता है, दूसरा पैर टखने से बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो जाता है। कितना ख़ून बहा होगा और वह दृश्य कितना भयावह रहा होगा—कल्पना मात्र से रूह काँप जाती है। लेखक की जीवटता का प्रमाण यह है कि इतनी भयावह स्थिति में भी वह स्वयं को बेहोश नहीं होने देता और पूरी चेतना के साथ अपने को सँभाले रखता है। 

हम प्रायः ऐसी घटनाएँ फ़िल्मों या टीवी धारावाहिकों में देखते हैं। वे क्षणिक रूप से हमें द्रवित कर देती हैं, किन्तु ठीक होने की प्रक्रिया को अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। वास्तविक जीवन में यह प्रक्रिया हर क्षण करुण क्रंदन में बीतती है। हर पल दर्द के दरिया में डूबे रहना पड़ता है। यही दर्द का दरिया इस पूरी आत्मकथा में प्रवाहित होता रहता है। 

इसी समय पिता का निधन, माँ की स्थिति, एक वर्ष पहले ब्याह कर आई नवयुवती पत्नी निशा और दोनों भाइयों की मानसिक अवस्था—इन सबको लेखक ने जिस संवेदनशीलता से जिया है, उसे पढ़ते हुए पाठक उन परिस्थितियों की गहराई को समझ पाता है। पर यह दर्द का दरिया उस क्षण हार मानने लगता है, जब लेखक साहस और धैर्य को अपनी नौका बना लेता है। उस नौका से वह अकेला नहीं, बल्कि पूरा परिवार, मित्र और रिश्तेदार धीरे-धीरे पार लगने लगते हैं। 

ऑपरेशन का दृश्य, पैरों से लगातार बहता ख़ून और तीन-चार महीनों तक चलने वाली मरहम-पट्टी—हर बार की पट्टी असहनीय पीड़ा से दिल-दिमाग़ को झकझोर देती है। इसके बावजूद लेखक के चेहरे पर बनी रहने वाली मीठी मुस्कान और बीच-बीच में फूट पड़ने वाले ठहाके यह एहसास ही नहीं होने देते कि वह अपने शरीर का एक आवश्यक अंग हमेशा के लिए खो चुका है और अब कृत्रिम पैर के सहारे जीवन जीना है। 

मैं डॉ. कुमारेन्द्र सिंह सेंगर जी से सन् 2006 से जुड़ा हूँ। दुर्घटना के बाद उन्होंने ‘स्पंदन’ पत्रिका का संपादन शुरू किया था, जिसमें मेरी एक बुंदेली कहानी प्रकाशित हुई। तभी से हम साहित्यिक मित्र बने। इन उन्नीस-बीस वर्षों में कभी यह अनुभव नहीं हुआ कि यह व्यक्ति इतनी गहरी पीड़ा से गुज़रा है—और आज भी गुज़र रहा है। यह रचना पढ़कर अब उस जीवटता का वास्तविक अर्थ समझ में आता है। क्या इंसान है भाई! 

इस आत्मकथा का एक अत्यंत प्रभावशाली जीवित पात्र डॉक्टर रवि है—लेखक का बचपन का मित्र और ऑर्थोपेडिक सर्जन। लेखक ने पूरे विश्वास के साथ स्वयं को उसके हवाले कर दिया था—यह सोचकर कि अब यह मुझे मरने नहीं देगा। 

पढ़ते समय मेरा ध्यान बार-बार डॉक्टर रवि पर ठहर जाता है। उस समय उसकी मानसिक स्थिति क्या रही होगी? लेखक ने तो स्वयं को उसे सौंप दिया था, पर उसके लिए हर क्षण अनदेखी अनहोनी से जूझना था। एक डॉक्टर के लिए सभी मरीज़ समान होते हैं, किन्तु यहाँ तो लँगोटिया यार का रिश्ता था। एक छोटी-सी चूक भी जीवन भर का बोझ बन सकती थी। ऑपरेशन थियेटर में जाने से पहले परिवार के हस्ताक्षर लेने का दृश्य अत्यंत हृदयविदारक है। यहाँ पेशेगत नियम और व्यक्तिगत संबंधों का द्वंद्व गहराई से उभरता है। इस रचना को पढ़ते हुए डॉक्टर रवि का पात्र लंबे समय तक मन से ओझल नहीं हो पाता। 

आत्मकथा की भाषा-शैली, उसका प्रवाह और स्वयं तथा दूसरों की मानसिकता को अभिव्यक्त करने का कौशल इसे विशिष्ट बनाता है। यही कारण है कि यह रचना पाठक को एक ही बैठक में पढ़ने को विवश कर देती है। 

इस आत्मकथा को पढ़ने के बाद मैं बस इतना ही कह सकता हूँ—

डॉ. कुमारेन्द्र सिंह सेंगर जी, वाक़ई ‘ज़िन्दगी ज़िन्दाबाद’

 समीक्षक: डॉ लखनलाल पाल 
 

2 टिप्पणियाँ

  • "जिंदगी जिंदाबाद!" डॉ० कुमारेंद्र सिंह सेंगर से अभी तक मुझे केवल दो बार मिलने का ही सुयोग्य मिला। इन संक्षिप्त भेंटों में जितना मैं उन्हें समझ पाया और पाया वास्तव में वह लेखक के साथ एक जिंदादिल इंसान भी हैं। उनकी जिंदादिली का सबूत उनकी आत्मकथा 'जिंदगी जिंदाबाद' के रूप में भी देखा जा सकती है। एक संवेदनशील मन वाले, सामाजिक सरोकारी और अत्यंत साहसी लेखक कुमारेन्द्र सिंह सेंगर की आत्मकथा शारीरिक अपूर्णता से हताश, निराश लोगों के साथ शेष समाज को भी प्रेरणा देने की काम करेगी। उत्कृष्ट आत्मकथा के लिए लेखक को हार्दिक बधाई। आदरणीय लखनलाल पाल की समीक्षा पढ़कर इस किताब पढ़ने की उत्सुकता जाग उठी है। शीघ्र ही इस किताब को पढ़ूँगा।

  • बहुत-बहुत साधुवाद लखन. तुम्हारी इस समीक्षा पर क्या ही लिखें. मन में उभरकर आते रहे विचारों को बस लिख दिया. बहुत ही कठिन समय था वो मगर अपनों के साथ ने सफ़र आसान कर दिया. एक बात और समझ आई कि समस्या कितनी ही बड़ी क्यों न हो यदि विश्वास के साथ सामना किया जाए तो समाधान निकल ही आता है.

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