ये रही बोरी और ये रहे तुम

01-08-2022

ये रही बोरी और ये रहे तुम

विकास बिश्नोई (अंक: 210, अगस्त प्रथम, 2022 में प्रकाशित)

अक़्सर लोग कहते हैं कि हम समाजसेवा करना तो चाहते हैं पर ऐसा कोई मौक़ा ही नहीं मिलता। अगर मन सच्चा होगा और मन में सेवा की भावना होगी तो हमारे सामने ऐसे अवसर स्वयं आ जाते हैं। हाल ही में विजय के साथ ऐसा ही एक क़िस्सा हुआ, जिसने एहसास कराया कि सेवा का मौक़ा मिलता नहीं, हमें ढूँढ़ना पड़ता है। 

विजय हरियाणा के एक विश्वविद्यालय की परीक्षा शाखा में बतौर प्रोजेक्ट हेड कार्य करता था। एक दिन जब वो अपने दफ़्तर में कार्य कर रहा था, तो वहाँ एक 40-45 वर्ष की महिला हाँफती हुई उसके पास आई और अपने काग़ज़ दिखाकर पूछा, “सर, यह मेरा कार्य यहीं आपके पास ही होगा क्या?”

विजय ने काग़ज़ात देखकर कहा, “यहाँ नहीं मैम, आप सामने वाली लैब में जाइए, वहाँ यह कार्य होगा।”

यह सुनते ही महिला उदास हो गयी और कहा, “सर प्लीज़ बता दो, कहाँ होगा? बहुत देर हो गयी, सब इधर से उधर भेज रहे हैं, कोई एक बिल्डिंग से दूसरी में। इसी में मेरा साँस फूलने लगा है अब तो।” 

विजय एक दयालु प्रवृत्ति का इंसान था। उसने कहा, “आप एक बार सामने वाली लैब में पता कर लो। ना हो तो मुझे बताना।”

महिला लैब में गई और कुछ देर में ही उदासीन चेहरे के साथ वही उत्तर लेकर वापस आ गई। लैब वालों ने वही उत्तर उसे दिया था और अन्य जगह जाने का बोल दिया, जहाँ से वो आई थी। 

विजय ने पहले महिला को बिठाया, पानी मँगवाकर पिलाया। साथ ही अपने एक मित्र सुखविंदर को फ़ोन कर अपने दफ़्तर बुलाया। वह भी उसकी तरह दयालु और नेक दिल इंसान था। 

महिला को अपने लगभग 10-12 वर्ष अपने पुराने काग़ज़ात और रोल नंबर इत्यादि निकलवाने थे। काम इतना सरल भी ना था। दोनों ने सलाह-मशवरा कर उस काम को ख़ुद करने की ही ठानी। विजय ने अपने जूनियर को कुछ काम सौंपा व महिला को दफ़्तर में बिठा, ख़ुद सुखविंदर के साथ बाहर की ओर निकला। इधर-उधर पूछ-ताछ करने पर पता चला कि यह केवल रिकॉर्ड रूम से ही पता चल सकता है। दोनों वहाँ गए तो वहाँ के अधिकारियों ने स्टाफ़ के होने के नाते उन्हें प्रवेश दिया, पूछने पर पुराने काग़ज़ातों फ़ाइलों की बोरी की ओर इशारा करते हुए कहा, “ये रही बोरी और ये तुम। ढूँढ़ लो अगर कुछ मिलता है तो।” 

विजय और सुखविंदर ने एक दूसरे की तरफ़ देखा, महिला बारे सोचा और बोरी की ओर बढ़ गए। कार्य कठिन था, पर दोनों महिला की मदद हेतु दृढ़ संकल्प थे। चार घण्टे उन्हीं फ़ाइलों में लगे रहने के बाद उन्हें सफलता मिल गई। उन्हें महिला के काग़ज़ात आख़िरकार मिल ही गए थे। दोनों के चेहरे पर बहुत ख़ुशी थी। दिल को तसल्ली थी कि चार घण्टे लगाए तो हक़ आ ही गया। दोनों ने महिला को जाकर बताया तो वह हाथ जोड़कर उन्हें धन्यवाद करने लगी और कहा, जहाँ कोई नहीं होता, वहाँ भगवान किसी ना किसी को ज़रूर भेजता है। धन्यवाद किया, भविष्य के लिए आशीर्वाद दिया और चली गई। आज विजय सुखविंदर ख़ुश भी थे और संतुष्ट भी। 

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