विक्रम-वेताल: जम्बूद्वीप का राजमहल
कमलेश कंवल
“कहाँ लेकर जा रहे हो, विक्रम?” कंधे पर पड़े वेताल ने विक्रम के मज़े लेते हुए पूछा।
“राजमहल।”
“अच्छा! झोपड़े को राजमहल कहते हुए, राजन, तुम्हें शर्म नहीं आई? मैं तो कहूँगा, तुम राजन कहलाने के क़ाबिल भी नहीं हो। राजा कैसे होते हैं, कैसे होते हैं उनके महल और कैसा होता है उनका उत्तरीय—देखना हो तो आज मेरे साथ जम्बूद्वीप चलो।”
विक्रम के मन में भी जिज्ञासा जाग उठी। वेताल को कंधे पर लादे वह आकाश मार्ग से जम्बूद्वीप की ओर चल पड़ा।
“ये देखो, राजन! ये भव्य अट्टालिकाएँ, विशाल सेतु और चौड़ी-चौड़ी सड़कें। और वह देखो, वह विशाल भवन! देखा? यह इस गणराज्य का सेवाश्रम है, जहाँ से चंद बुद्धिजीवी इस सम्पूर्ण द्वीप पर नियंत्रण रखते हैं।”
“सेवाश्रम?”
“हाँ, सेवाश्रम! नाम में सेवा और काम में शासन। आज इसी सेवाश्रम के विशाल दीवाने-ख़ास में बड़ी गहमागहमी है। प्रदेश के लोकप्रिय महामानव, प्रजा के हृदय-सम्राट, अपने प्रमुख सहयोगी महामात्यों के साथ विचार-विमर्श कर रहे हैं। विषय है—प्रदेश के अगले पचास वर्षों के विकास की योजनाएँ।”
विक्रम की आँखें विशाल अट्टालिकाओं को देखकर चौंधिया गई थीं। दीवाने-ख़ास में महामात्यों की बढ़ती उपस्थिति से उसका कोई सरोकार नहीं था। वह तो राजा की पोशाक में ही उलझा हुआ था। राजा की ऐनक विशेष रूप से उसे आकर्षित कर रही थी।
राजा के आदमक़द चित्र हर दिशा में लगे हुए थे। एक चित्र पर तो विक्रम की दृष्टि ठहरकर रह गई। चार हाथों वाले राजा का चित्र था। मस्तक पर मुकुट और हर हाथ में अलग-अलग अस्त्र-शस्त्र। ऐसे अस्त्र-शस्त्र, जिन्हें विक्रम ने पहले कभी नहीं देखा था। राजा के चरणों के पास कुछ मानव आकृतियाँ थीं। उनके शरीर पर क़ीमती उत्तरीय थे और वे दोनों हाथों से राजा के हाथों से गिरती स्वर्ण-मुद्राएँ समेट रहे थे।
उधर राजा के सम्मुख अनेक महामात्य विराजमान थे। सभी ने एक-एक करके अपने प्रस्ताव प्रस्तुत करने शुरू किए।
धनपति ने प्रस्ताव रखा, “जिस वस्तु की क़ीमतें बढ़ जाएँ, उसका उपयोग हम सभी को बंद कर देना चाहिए। इससे जब प्रजा बढ़े हुए दामों की शिकायत करे तो हम कह सकें—‘मैं तो इसका उपयोग ही नहीं करता‘।”
राजा ने प्रसन्न होकर सिर हिलाया।
अब प्रकृतिराज की बारी थी। उसने कहा, “अपने वैश्य मित्रों को प्रकृति का प्रतिनिधि नियुक्त कर दीजिए। वे प्रकृति के पास रहकर उसका सम्पूर्ण दोहन करने में सफल होंगे और विकास भी दिखाई देता रहेगा।”
राजा ने फिर सिर हिलाया।
गृहपति ने अपना प्रस्ताव रखते हुए कहा, “जो लोग इन विकास योजनाओं के विरोध में सत्याग्रह करें, उन्हें घातक शस्त्रों से शिक्षा देने की व्यवस्था की जाए।”
सभा में कुछ क्षणों के लिए सन्नाटा छा गया।
तभी राजा के सर्वाधिक मुँहलगे मंत्री कपटलाल बोले, “गृहपति, आप जो चाहें कीजिए। हम इतना झूठ फैला देंगे कि सच अपना पता भी भूल जाएगा।”
सभा में ठहाका गूँज उठा।
अब चुनावपति की बारी थी। उसने कहा, “सरकारें मतदाता नहीं चुनें, बल्कि यह तय करें कि कौन मतदाता होगा।”
राजा कुछ देर मौन रहे। फिर बोले, “सभी प्रस्ताव श्लाघनीय हैं। इन्हें तत्काल प्रभाव से लागू करने के लिए गृहपति के मार्गदर्शन में एक क्रियान्वयन समिति का गठन किया जाए और गृहपति को असीम शक्तियाँ प्रदान की जाएँ, ताकि इनके क्रियान्वयन पर संवैधानिक संकट की परछाईं भी न पड़े।”
आदेश हुआ और सभा बर्ख़ास्त कर दी गई।
विक्रम ने वेताल को प्रश्नसूचक दृष्टि से देखा। विक्रम के मन का भाव समझते हुए वेताल ने अपना प्रश्न दाग दिया, “बताओ, राजन! समिति की अध्यक्षता स्वयं सेवाराम ने न करके गृहपति को क्यों सौंप दी? बताओ, नहीं तो मैं चला . . .”
“क्या वेताल! तुम भी! मैं उत्तर नहीं दूँगा। तुम फिर उड़ जाओगे।”
“नहीं बताओगे तो तुम्हारा सिर टुकड़े-टुकड़े हो जाएगा।”
विक्रम ने लंबी साँस ली और बोला, “गृहपति जहाँ होते हैं, वहाँ नहीं होते और जहाँ नहीं होते, वहाँ होते हैं। उनकी इसी अद्भुत शक्ति के कारण उन्हें क्रियान्वयन समिति का अध्यक्ष बनाया गया और उन्हें असीम शक्तियाँ प्रदान की गईं।”
वेताल ने विक्रम की पीठ थपथपाई।
“वाह राजन! उत्तर तो ठीक दिया। लेकिन अभी तुम्हारी परीक्षा पूरी नहीं हुई।”
विक्रम कुछ कहता, उसके पहले ही वेताल उछलकर समीप की विशाल इमारत के छज्जे से लटक गया था। विक्रम म्यान से तलवार खींचते हुए उसकी ओर लपका।
वेताल खिलखिलाया, “अरे राजन! तलवार लेकर कहाँ चले? अभी तो जम्बूद्वीप की रसोई देखनी बाक़ी है—जहाँ प्रजा के लिए परोसे जाने वाले सपने पकते हैं और घोषणाओं की आँच पर पाँच साल तक गरम रखे जाते हैं!”
इतना कहते ही वह अँधेरे आकाश में विलीन हो गया।
विक्रम तलवार हाथ में लिए छज्जे के नीचे खड़ा रह गया और फिर जम्बूद्वीप की ओर देखने लगा।