साठा सो पाठा और जेन-ज़ी
कमलेश कंवल
बूढ़े पत्नी-पीड़ित संघ में नई जवानी आई थी। हालाँकि हमने तो था लाख समझाया कि भाई लोगो अभी तो आप सभी अविवाहित हो। अपना कोई प्रेमिका-पीड़ित संघ बना लो। यार काहे हम ग़रीबों की छाती पे मूँग दलने के लिए घुसे चले आ रहे हो। वैसे भी तो हमारी बढ़ती तोंद और घटते बालों के कारण, हमारी बीबियों का हम से मोहभंग हुए जा रहा है। और ऐसे में तुम्हारा हमारे साथ उठना-बैठना तो बघार के बाद तड़के का ही काम करेगा कि नहीं। इस अमृत काल में—जो न हो, सो कम है। ऐसे में तुमको और हमारी मेहरारुओं को . . .! न बाबा हम शेरनी और बकरे को साथ-साथ नहीं छोड़ सकते। तुम्हारा ये खिला-खिला सा चेहरा, टेक्नो फ़्रेंडली और इनोवेटिव होना, फ़ॉरहेड पे लहराती हुई ज़ुल्फ़ें हमारी डोकरियों के लिए तो मायाजाल ही बुन डालेंगे। भाई ये तो तय है कि तुम लोग तो हम ग़रीबों के संकट में दिन दूनी रात चौगुनी वृद्धि करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ने वाले हो।” पर वो लोग थे कि माने ही नहीं। कहने लगे, “हे वॉट्सअप यूनिवर्सिटी के प्राध्यापको! आप सभी साठा सो पाठा हो गए हो। लगता है बालों के साथ-साथ अक़्ल भी उड़ गई है। हमको क्या षोडशी बालाओं की कमी है जो तुम्हारी अध-बूढ़ी घोड़ियों की लाल लगाम देखकर उनसे लिपट जाएँगे। जेन ज़ी के इतने बुरे दिन अभी आए नहीं हैं। ओ! झंडू केसरी जीवन के विज्ञापनो! अस्सी में लस्सी न हुए जाओ। हम तो ये सोच रहे हैं कि आज नहीं तो कल शादी तो होनी ही है। फिर क्यों नहीं अभी से कोई संघ ज्वाइन कर लिया जावे ताकि सनद रहे और वक़्त बेवक़्त ज़रूरत पड़ने पर मित्र गण दाना-पानी ले कर चढ़ाई के लिए तत्काल टपक पड़े।”
अब हम क्या समझाते उन युवा आलू बुखारों को कि हम पके हुए आम हैं। हमें तो ख़ुद पता नहीं कि हम कब ख़ुद टपक जाए और वैसे भी हम इतनी बार टपकाए जा चुके है कि टपकाते-टपकाते हमारी पत्नियों की टपकाने के लिए टपकने वाली लार भी अब तो टपकना बंद हो गई है। और ये भी तो समझने की बात है कि इतेक बहादुर होते हम लोग तो, हमारी जोरू लोग संघ बनाती, हम नहीं। मगर अपने मुँह से अपनी तारीफ़ क्या करते भला। जब आ ही गए है चिलग़ोज़े तो जान भी जायेंगे सब। सो ये तय हुआ कि देश हित और समाज के हितों के मद्दे नज़र संघ की माली हालत सुदृढ़ करने और शारीरिक शक्ति वर्धन के लिए इन थ्री नॉट थ्री कैप्सूलों को संघ में भर्ती किया जाना सर्वथा उचित रहेगा।
इतिहास गवाह है कि बूढ़ों ने कभी क्रांति या प्रति क्रांति नहीं की है। यदि ग़लती से जय प्रकाश बाबू से हो भी गई तो उनके हाथ-पैर तो युवा ही थे। सो ये तो तय था कि हमारे संघ में कुछ न कुछ तो होने वाला है। अब क्या होने वाला है ये त्रिया चरित्र-सा था—अबूझ। संघ में बूढ़े एक दूसरे को अपनी अपनी राम कहानी सुनाकर दिल के छाले फोड़ते रहते हैं। अब ये ज़्यादा दिन चलने वाला नहीं है। ये जेन-ज़ी कुछ न कुछ बवाल तो ज़रूर खड़ा करेंगे। अरे जब मुल्कों की सत्ता पलट दी तो जगह-जगह से चरमरा गए इस पी पी एस अर्थात् पत्नी पीड़ित संघ की क्या औक़ात कि चूँ भी कर सके। आख़िर बकरे की अम्मा कब तक ख़ैर मनाती। एक दिन जब जेन-ज़ी ने हाइड्रोजन बम फोड़ दिया तो वो क़यामत का दिन भी सुरसा की तरह मुँह फाड़े सामने आ कर खड़ा हो ही गया।
नए फ़ुकरों ने हम पुराने फ़ुकरों को दस बिंदु दिए थे। जिन पर विचार कर हमको उन पर अमल करना था। साथ ही अमल न करने की स्थिति में तख़्ता पलट की चेतावनी भी नत्थी कर दी थी जैसे बंगाली मिठाई वाले मिठाई के साथ हमको एक ठो चेतावनी भी चिपका देते हैं कि इतने-इतने घंटे में सुलटा देना ये सारी। नहीं तो फिर न कहना मुझसे कुछ भी। हम बूढ़ों में जो संघ पे सालों से क़ब्ज़ा किए बैठे थे अफ़रा-तफ़री मच गई थी। अस्सी-अस्सी साल के पत्नी पीड़ित सिंहासन पे कुंडली मार के बैठे थे। सच कहें तो हम साठ-पैंसठ वालों की बाँछें भी खिलने लगी थीं और आँखों में अनोखी चमक आ गई थी . . . ख़ुद के लिए भी हम मौक़ा देख रहे थे पर डर ऐसा था कि ख़ुद से भी डरते-डरते ही कह रहे थे कि ऐसा भी तो हो सकता है ना कि जेन-ज़ी हमको ही गद्दी पे बैठा दे।
होने को क्या नहीं हो सकता . . . फिर जेन-ज़ी का ट्रैक रिकॉर्ड भी यही कहता है कि वो ख़ुद कभी सत्तासुर नहीं बनते। किसी कम गंदे बंदे को गद्दी सौंप कर ख़ुद दर्शक दीर्घ में चले जाते हैं। तभी ज़ोर से पानी की छपाक की आवाज़ और घरवाली के कर्कश स्वर ने हमको ज़मींदोज़ कर दिया था। हम अपने शादी में मिले हुए टूटे-फूटे पलंग से ज़मीन पर सकुशल लैंड हो गए थे और देख रहे थे माथे पे खड़ी श्रीमती को जिसके हाथ में जलता खप्पर और चेहरे पे सब कुछ नेस्तनाबूद करने के भाव बिलबिला रहे थे। समझने के लिए क्या रह गया था। समझ गए थे कि नल चले गए हैं और पानी भरना रह गया है। और आज काम वाली बाई भी गोता मार गई है . . . सोचकर ही रूह काँप-काँप उठी थी। साथ ही ये भी समझ गए थे कि ये ऊपरवाला भी हम मज़लूमों की फिरकी लेने से बाज़ नहीं आता है। जुमले बाज़ कहीं का!