प्रभु श्री ट्रम्प के नाम एक निवेशक की विनय-पत्रिका

15-06-2026

प्रभु श्री ट्रम्प के नाम एक निवेशक की विनय-पत्रिका

कमलेश कंवल  (अंक: 299, जून द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

हे कृपानिधान, सदैव वंदनीय, लोकतंत्र-मुकुट, विश्व-विजय-पताका-धारक, श्री श्री 1008 ट्रम्प महाराज!

आपको मेरा सादर चरण-स्पर्श पहुँचे।

बाद ख़ैरियत के मालूम हो कि मैं एक अदना-सा लेखक हूँ। ऐसा लेखक, जिसे उसका पड़ोसी तक लेखक नहीं मानता। अख़बार वाले छापते नहीं, पुरस्कार वाले पूछते नहीं और सोशल मीडिया वाले पढ़ते नहीं। फिर भी न जाने क्यों आज आपको पत्र लिखने का दुस्साहस कर बैठा हूँ। शायद इसलिए कि हम सदियों से भगवान को चिट्ठियाँ लिखते आए हैं और अब राजनीति में भगवान तथा नेता के बीच का अंतर कहने भर का रह गया है।

प्रभु, सबसे पहले तो आपके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना चाहता हूँ। आपने हमें यह सिखाया कि ट्रम्प केवल ताश का पत्ता नहीं होता, वह जीवन जीने की एक शैली है।

बचपन में हम ट्रम्प कार्ड बचाकर रखते थे, लेकिन आपने समझा दिया कि ट्रम्प कार्ड बचाकर रखने के लिए नहीं होते, बल्कि हारी हुई बाज़ी जीतने के लिए होते हैं। ट्रम्प की चाल ऐसी होती है कि उसका तमाशा पूरे संसार को देखना पड़ता है।

वैसे महाराज, आपकी विजय में हमारा भी थोड़ा-बहुत योगदान रहा है। भारत के कोने-कोने में आपके लिए यज्ञ हुए थे। कहीं घी जला, कहीं नारियल फूटा, कहीं मंत्र पढ़े गए। यह सब निःस्वार्थ नहीं था। यह तो सीधा-सीधा निवेश था। जैसे किसान बीज बोता है, वैसे हमने आपकी जीत बोई थी। अब यदि फ़सल हमारी अपेक्षाओं के अनुरूप न निकले तो शिकायत तो बनती है।

पर मेरे प्रिय मित्र फुरसतिया प्रारंभ से ही इस पूरी प्रक्रिया के विरोध में थे। उनका कहना था कि ट्रम्प सामने वाले के पास भी हो सकता है। लेकिन उनकी कौन सुनता! जब आपके समर्थन में यज्ञ हो रहे थे, तब फुरसतिया का चेहरा ऐसा था मानो मैच का रेफ़री प्रतिद्वंद्वी टीम के कोच का चाचा निकल आया हो। उसकी हालत बिल्कुल किसी छोटे देश जैसी थी, जो किसी महाशक्ति से न लड़ सकता है, न उसका समर्थन कर सकता है, बस मन ही मन कुढ़ सकता है।

प्रभु! जिस दिन चुनाव हारने के बाद भी आपने अपने भक्तों को विश्वास दिला दिया कि आप चुनाव जीत गए हैं, उसी दिन हमने आपको राजनीति का महर्षि मान लिया। हमारे लोग भी इन मामलों में कम सिद्धहस्त नहीं हैं, पर उनको अभी भी आपसे बहुत कुछ सीखना बाक़ी है। आशा है, शीघ्र सीख लेंगे।

प्रभु, आप जानते थे कि आप निर्दोष हैं। फिर अदालत की क्या ज़रूरत? और सत्ता मिल जाए तो फ़ैसले की क्या ज़रूरत? सच बताइए, यह ज्ञान आपने हमारे यहाँ के किसी गुरु से ही प्राप्त किया होगा।

याद आता है, एक समय ऐसा भी था जब आपका मन “मैया, मैं तौ चंद-खिलौना लैहौं” की मुद्रा में था। चंद्र-खिलौना आज भी आपसे उतना ही दूर है जितना मध्यम वर्ग से टैक्स के लाभ। पर उसके बाद आपने जो किया, वह अनुपम है। आज भी विश्व एक हाथ से अपने घाव सहला रहा है और दूसरे हाथ से आपकी पीठ थपथपा रहा है।

प्रभु, भारतीय संस्कृति में ऋण केवल आर्थिक नहीं, आध्यात्मिक विषय भी है। हम पितृ ऋण, गुरु ऋण और देव ऋण चुकाते-चुकाते जीवन बिता देते हैं। आपकी कृपा से अब एक नया ऋण और जुड़ गया है—ट्रम्प-ऋण।

वैसे ऋणी होना हमारे लिए कोई नई बात नहीं।

नई बात यह है कि किसान और आम आदमी लोन लेने के लिए बैंक के पास जाते हैं, जबकि धन्ना सेठों के पास बैंक स्वयं जाता है।

हमारी एक किश्त रुक जाए तो बैंक वाले हमें ऐसे खोजते हैं जैसे कुम्भ के मेले में खोए हुए रिश्तेदार। हम क़र्ज़दार कहलाते हैं, जबकि अरबों रुपये लेकर रफ़ू-चक्कर होने वाले दूरदर्शी आर्थिक सुधारक कहलाते हैं।

हमारे यहाँ विकास भी तीव्र गति से हो रहा है। कुछ पुल तो इतने आत्मनिर्भर हैं कि उद्घाटन की प्रतीक्षा तक नहीं करते। बनते ही धरती माता की गोद में समा जाने को व्याकुल हो उठते हैं।

आप विकसित देशों के पुलों पर गर्व करते होंगे, लेकिन हमने ऐसे पुल बना लिए हैं जो सीधे जाने की औपनिवेशिक मानसिकता को ठुकराकर समकोण पर मुड़ जाते हैं। भारतीय इंजीनियरिंग के इस मौलिक योगदान पर विश्व अभी शोध कर रहा है।

प्रभु, आपकी व्यापार नीति की जितनी प्रशंसा की जाए, कम है।

आपने हमें एक अद्भुत सूत्र दिया है—

कच्चा माल हमारा।

ज़मीन हमारी।

मज़दूर हमारे।

ऊर्जा हमारी।

बाज़ार हमारा।

फिर तैयार माल भी हम ही ख़रीदें।

धन्य हो, प्रभु!

पहले हम इसे उपनिवेशवाद समझते थे। आपने बताया कि आधुनिक युग में इसे वैश्विक साझेदारी कहते हैं।

प्रभु, आपने कृपा बनाए रखी और हम तेल ख़रीद पाए। बहुत जल्द हम पेट्रोल-डीज़ल जैसी तुच्छ वस्तुओं पर निर्भर रहना छोड़ देंगे। भक्त प्रजा पैदल चलेगी और शासकगण मंत्र-संचालित पुष्पक विमानों में विचरण करेंगे। हे प्रभु! यही विनय है कि हमारे इस ज्ञान का पेटेंट मत करवा लीजिएगा।

अंत में केवल इतना ही कहना है कि हम भारतीय निवेशक घाटे को दूरदर्शिता और नुक़्सान को रणनीति मानकर वर्षों तक प्रतीक्षा कर सकते हैं।

हमारे यहाँ उम्मीदें टूटती नहीं, अगली योजना में पुनर्जन्म ले लेती हैं।

हम आपके ऋणी हैं और अपनी उम्मीदों के भी।

आपका आजीवन निवेशक
व्यंग्यकार कमलेश कंवल उज्जैन 

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