वोट और नोट

कमलेश कंवल  (अंक: 298, जून प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

वोट और नोट का रिश्ता शब्दातीत है। वोट मिले तो नोट मिलते हैं। वोट देते हैं तो भी नोट मिलते हैं। खोट नोट में हो कि वोट में, खोट—खोट नहीं कहलाती। चोट नोट की हो या वोट की, चोट—चोट नहीं रह जाती। हो नियत की खोट या दिल की चोट, वोट और नोट हर चोट का कोट बन जाते हैं। जिसमें सब छिप जाता है और जो दिखता है वो होता है जनता जनार्दन का सपोर्ट। जब जन सपोर्ट है तो वोट है और वोट है तो कुर्सी है कुर्सी है तो नोट है। नोट है तो वोट है। वोट है तो नोट है। कितनी भी कोशिश कर ले। नोट और वोट पे कितने ही लठ्ठ मार ले। क्या कभी कोई पानी को अलग अलग कर पाया है? वोट और नोट के सामने आउट ऑफ़ डेटेड मानवतावादी का सारा डिक्शन दंड पेलता हुआ दिखाई देता हैं। सत्य के साथ किए गए सारे प्रयोग असत्य के एंबेसडर बन गए हैं।

वोट अखरोट हैं सहज टूटते नहीं। टूटते हैंं तभी जब उन पे कोई भारी चोट पड़ती है। एक बार टूट भर जाए फिर तो तोड़ने वालों की राजनैतिक सेहत के लिए अत्यंत ही गुणकारी और लाभकारी सिद्ध होते हैं। वोट का क्या? वोट तो वोट है। बैलेट बॉक्स से लेकर ई वी एम तक वोट तो चौबीस कैरेट का खरा सोना रहा है। खोट तो बैलेट बॉक्स या ई वी एम के रिमोट में रही है। बैलेट बॉक्स के सतयुग में सारा खोटा काम मैनुअली हुआ करता था। ये वो काल था जब बाहुबल, नेताओं के छल बल के सम्मुख दंडवत था। फिर आया नेट का युग तब तक बाहुबल नेताओं के छल बल से सुशोभित हो चुका था। वो वोट भी हो गया था, रिमोट भी हो गया था, और रिमोट को नियंत्रण करने वाला हाथ भी हो गया था। अब तो बात ही कुछ और है सारे अंपायर भी खिलाड़ी बन चुके हैं क्या चिलगोजे क्या काजू क्या अखरोट।

वोट का सबसे बड़ा लाभार्थी वोटर तो बैलेट बॉक्स के युग में भी साड़ी शराब और नोट का मुरीद था। हाँ ये ज़रूर था कि उसका ईमान धरम ज़रूर ज़िंदा था। क्या मजाल कि विश्वासघात करे। एक बार साड़ी, शराब, नोट ले लिया तो ले लिया फिर जिससे लिया वोट भी उसको ही दिया। आज के वोटर जैसा नहीं कि नेताओं को बोलना पड़े कि नमक हरामो! लाभ हमारी योजनाओं का उठाते हो और वोट किसी और को दे आते हो। उस काल में ग़रीब सरकारों को आज के जैसी सीधे मतदाता के खातों में पैसे डालने की सुविधा कहाँ मिली हुई थी। वो तो बापड़े क़त्ल की रात को प्रशासन की फुफकार से बचते-बचाते, छिपते-छिपाते रात-रात भर गाँव दर गाँव मोटर साइकिलों का शोर इतना ज़्यादा फैला देते थे कि मजाल है कि किसी वोटर की एक घड़ी के लिए भी आँख लग जाए। वोटर भी आँखें फाड़-फाड़ के जगता रहता था कि कहीं ऐसा न हो कि वो सोते ही रह जाए और चुनावी सेंटा दरवाज़े से ही लौट जाए।

नोट की पुराण भी कुछ कम सनसनीखेज़ नहीं है। मोहरे नोट के पुरखे हुआ करते थे जो राजा की सनक से सनसनाते थे अपनी झक से झकास चलते थे। यथा राजा तथा मोहरे। आज़ादी मिलते ही इन मोहरों को गाँधी छाप काग़ज़ों ने खा लिया और ख़ुद देश पे कुंडली मार के बैठ गए। लक्ष्मी प्रेमी इस बात को लेकर बड़े कुंठित हैं कि जब लक्ष्मी बम हो सकते हैं तो लक्ष्मी छाप नोट क्यों नहीं हो सकते। गाँधी को रात–दिन गरियाने वाले ये लक्ष्मी प्रेमी नोट पे चिपके गाँधी से ऐसे चिपके रहते हैं कि कह उठते हैं नोट काले हों या सफ़ेद, नोट—नोट होता है। यदि अपना हो तो। दूसरों के काले नोट तो ठीक। उनके सफ़ेद नोट भी काले करने की कुछ सरकारी मशीनें ईजाद की जा चुकी हैं जो यूँ तो रात–दिन लक्ष्य प्राप्त करने के पवित्र कार्य में जुटी रहती हैं लेकिन देश की किसी भी क्षेत्र में चुनाव पर्व के आते ही चार गुने उत्साह से सक्रिय हो जाती हैं। बेचारे नोटों को तो कहीं भी छिपने की जगह नहीं मिलती। न कार में न हेलीकॉप्टर में, पर हाँ यदि नोटों में सत्ता के पहिए लगे हों तो वो अपने लक्ष्य तक पहुँचे बिना कभी रुकती नहीं हैं। नोट की ओट सर्वोपरि है। सर्वोत्तम है। किन्तु वोट का लोट, नोट की ओट के नहीं लगा हो तो नोट की बोट वहीं डूब जाती है जहाँ पानी कम होता है। वोट को फ़र्क़ नहीं पड़ता कि वो किसको, कैसे, दिया जा रहा है। किसी न किसी को तो दिया जाना ही उसकी नियति है। नोट को भी कोई अंतर नहीं पड़ता कि उस पर गाँधी छपे कि लक्ष्मी, वो तो गति सद्गति और दुर्गति को प्राप्त होते रहे हैं और होते रहेंगे। वोट और नोट हमज़ाद नहीं हैं फिर भी हमज़ाद हैं। 
*कमलेश कंवल उज्जैन 
7000878871

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