डॉ. शैली जग्गी – 001 दोहे
डॉ. शैली जग्गी
1)
रोटी और बेटी का, सदा करो सम्मान।
जीवन इनसे ही रक्षित, कहते संत महान॥
2)
कर लगा है रोटी पर, महँगाई की मार।
बहुजन के उदर सम्मुख, बेचारी सरकार॥
3)
कपड़ा धो-धो कर बिबस, दिवस रैन बेहाल।
मन की मैल न गई कित, बेदन उर संताप॥
4)
कपड़ों से किरदार का, नहीं करो अनुमान।
फ़ौज में इक वर्दी ही, सैनिक का सम्मान॥
5)
'रेहन पर रख' ज़मीर से, तुम ख़रीदे मकान।
ऐसी दौलत किसे हित, भोग न सके जहान॥
6)
मकान बड़े बना लिए, छोटे हुए मुक़ाम।
परिजन परदेसी भये, ख़ाली हुए मकान॥
7)
अपराधी डगर चलकर, क्या पाया इंसान!
न परवाह है प्राण की, न चिन्ता परमधाम॥
8)
देव होना कठिन नहीं, न ही जटिल शैतान।
दोनों से कहीं मुश्किल, बन पाना इंसान॥
9)
सुख, शान्ति, समरसता में, खेले सकल जहान।
आज स्वप्न हुआ इनका, मिल पाना इक ठाम॥
10)
अन्तिम दोहा प्रेम पर, प्रेम सुखों की खान।
प्रेम गुणों का जनक है, सनमति है संतान॥