रामवती: स्त्री-अस्मिता, लोकजीवन और प्रतिरोध का काव्य-विमर्श

15-06-2026

रामवती: स्त्री-अस्मिता, लोकजीवन और प्रतिरोध का काव्य-विमर्श

डॉ. अवनीश सिंह चौहान (अंक: 299, जून द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)


(मयंक श्रीवास्तव के ग़ज़ल-संग्रह रामवती का समकालीन पुनर्पाठ)

हिंदी साहित्य के इतिहास में कुछ रचनाकार ऐसे होते हैं जो अपने समय के केवल साक्षी नहीं होते, बल्कि उसके संवेदनशील व्याख्याकार भी होते हैं। वे अपने युग की धड़कनों को सुनते हैं, उसकी विडंबनाओं को पहचानते हैं और उसके सपनों को शब्द देते हैं। मयंक श्रीवास्तव ऐसे ही रचनाकार हैं। उनकी रचनात्मकता का आधार लोकजीवन, सामाजिक अनुभव, मानवीय करुणा और सांस्कृतिक स्मृति है। उन्होंने कविता को कभी केवल सौंदर्यबोध या भावुकता का माध्यम नहीं बनने दिया; बल्कि उसे समाज और मनुष्य के बीच संवाद का सेतु बनाया।

हिंदी की प्रतिष्ठित साप्ताहिक पत्रिका धर्मयुग और उसके यशस्वी संपादक धर्मवीर भारती का नाम हिंदी साहित्य के इतिहास में विशेष सम्मान के साथ लिया जाता है। उस समय धर्मयुग में प्रकाशित होना किसी भी रचनाकार के लिए राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक स्वीकृति प्राप्त करने जैसा था। कहा जाता है कि पत्रिका में प्रकाशित रचनाओं पर देशभर में चर्चाएँ होती थीं और साहित्यिक बहसें जन्म लेती थीं।

इसी संदर्भ में 13 सितम्बर 1980 को धर्मयुग में प्रकाशित मयंक श्रीवास्तव की चर्चित ग़ज़ल—"अपनी तो इस मँहगाई में डूब गयी है लुटिया बाबू, / लेकिन कैसे बने तुम्हारे ऊँचे ठाठ मुगलिया बाबू” ने उन्हें व्यापक पहचान प्रदान की। यह शेर केवल महँगाई का उल्लेख नहीं करता; यह स्वातंत्र्योत्तर भारत की आर्थिक विषमता, राजनीतिक विफलताओं और सामाजिक असंतुलन का तीखा दस्तावेज़ है। 1962 के भारत-चीन युद्ध और 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद भारतीय समाज जिन चुनौतियों— भूख, ग़रीबी, बेरोज़गारी और भ्रष्टाचार—से जूझ रहा था, उस सामूहिक पीड़ा को मयंक श्रीवास्तव ने अपनी रचनाओं में प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त किया।

मयंक श्रीवास्तव : रचनाकार, संपादक और सांस्कृतिक-कर्मी

11 अप्रैल 1942 को उत्तर प्रदेश के आगरा जनपद (वर्तमान फिरोजाबाद) के ऊंदनी ग्राम में जन्मे मयंक श्रीवास्तव का साहित्यिक व्यक्तित्व बहुआयामी है। उन्होंने मध्यप्रदेश माध्यमिक शिक्षा मंडल, भोपाल में विभिन्न पदों पर कार्य करते हुए दिसंबर 1999 में सहायक सचिव के पद से सेवानिवृत्ति प्राप्त की। किंतु उनकी वास्तविक पहचान एक संवेदनशील कवि, गीतकार, ग़ज़लकार और संपादक की रही।

उनके प्रकाशित गीत-संग्रह— सूरज दीप धरे (1975), सहमा हुआ घर (1983), इस शहर में आजकल (1997), उँगलियाँ उठती रहें (2007), ठहरा हुआ समय (2015) और समय के पृष्ठ पर (2019), उनकी दीर्घ साहित्यिक साधना के प्रमाण हैं। रामवती (2011) उनके ग़ज़ल-लेखन का महत्त्वपूर्ण पड़ाव है।

मयंक श्रीवास्तव की रचनाओं को किसी एक विधागत खाँचे में बाँधना कठिन है। उनकी ग़ज़लों में गीत की आत्मीयता है, गीतों में नवगीत की सामाजिक चेतना है और नवगीतों में लोकजीवन की गहरी जड़ें हैं। स्वयं रचनाकार कभी विधागत आग्रहों में नहीं उलझे। यह स्थिति तुलसीदास की प्रसिद्ध उक्ति की याद दिलाती है—“जाकी रही भावना जैसी, / प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।” अर्थात् पाठक अपनी संवेदना और अनुभव के आधार पर रचना से अर्थ ग्रहण करता है। मयंक की रचनाएँ भी बहुस्तरीय अर्थ-संभावनाओं से सम्पन्न हैं।

सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने प्रेसमेन साप्ताहिक के साहित्य संपादक के रूप में उल्लेखनीय कार्य किया। उनके संपादकत्व में छंदबद्ध कविता पर केंद्रित कई महत्त्वपूर्ण विशेषांक प्रकाशित हुए। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा—“साहित्य सृजन एवं संपादन मनुष्य और समाज को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए, किसी कुत्सित और मानवताविरोधी विचारधारा को केंद्र में रखकर नहीं।” यह कथन उनके संपूर्ण साहित्यिक व्यक्तित्व की कुंजी है।”

रामवती : एक स्त्री नहीं, एक सामाजिक रूपक

डॉ. शरद सिंह की मार्मिक पंक्तियाँ—“काश! पूछता कोई मुझसे, सुख-दुख में हूँ, कैसी हूँ? / जैसे पहले खुश रहती थी, क्या मैं अब भी वैसी हूँ?”— भारतीय स्त्री के उस मौन इतिहास को स्वर देती हैं जिसे समाज ने सदियों तक सुनने की अपेक्षा नियंत्रित करने का प्रयास अधिक किया है। यही प्रश्न मयंक श्रीवास्तव के ग़ज़ल-संग्रह रामवती की मूल संवेदना के रूप में उभरता है। संग्रह की केंद्रीय पात्र रामवती केवल एक स्त्री नहीं, बल्कि भारतीय समाज में उपेक्षित, पीड़ित और संघर्षरत स्त्री-अस्तित्व का व्यापक प्रतीक बन जाती है। कवि लिखता है—“चेहरा लिए हुए फिरती है सूखी हुई नदी जैसा, / कभी हज़ारों में लगती थी सबसे प्यारी रामवती।”

यहाँ ‘सूखी हुई नदी’ का बिंब अत्यंत अर्थगर्भित और बहुस्तरीय है। नदी सामान्यतः जीवन, प्रवाह, उर्वरता, सृजन और निरंतरता का प्रतीक मानी जाती है। उसका सूख जाना केवल जल का अभाव नहीं, बल्कि जीवन की संभावनाओं, सपनों और ऊर्जा का क्षीण हो जाना है। रामवती का चेहरा सूखी नदी जैसा इसलिए है क्योंकि उसके जीवन से इच्छाओं, आकांक्षाओं, आत्मविश्वास और स्वतंत्र अस्तित्व का प्रवाह धीरे-धीरे समाप्त कर दिया गया है। वह कभी “हज़ारों में सबसे प्यारी” थी, अर्थात् जीवन से भरी हुई, आशाओं से संपन्न और आत्मविश्वास से युक्त; किंतु सामाजिक परिस्थितियों, पारिवारिक दबावों और पितृसत्तात्मक संरचनाओं ने उसके व्यक्तित्व को भीतर से क्षत-विक्षत कर दिया है।

समकालीन स्त्रीवादी आलोचना की दृष्टि से रामवती किसी एक स्त्री का चरित्र नहीं, बल्कि उस सामूहिक स्त्री-अनुभव का रूपक है जिसमें सपनों का क्षरण, मौन की विवशता और अस्तित्व की निरंतर संघर्षशीलता एक साथ उपस्थित हैं। इस प्रकार रामवती व्यक्तिगत न रहकर सामाजिक यथार्थ का सशक्त प्रतीक बन जाती है।

मौन की राजनीति और स्त्री की चुप्पी

रामवती की अत्यंत मार्मिक पंक्ति—“कहते-कहते रुक जाती है कुछ बेचारी रामवती”— स्त्री-अनुभव के उस पक्ष को उद्घाटित करती है, जिसे समकालीन स्त्री-विमर्श ‘मौन की राजनीति’ के रूप में देखता है। यहाँ रामवती का रुक जाना मात्र भावुकता या संकोच का परिणाम नहीं है, बल्कि उस सामाजिक संरचना की देन है जिसने स्त्री को बोलने से अधिक सहने की शिक्षा दी है। उसका मौन उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि उसके ऊपर हुए दीर्घकालिक दमन, उपेक्षा और असमानता का साक्ष्य है। वह सब कुछ कहना चाहती है, किंतु उसके अनुभव इतने गहरे और जटिल हैं कि शब्द बीच में ही ठहर जाते हैं।

रूसी कवयित्री मरीना त्स्वेतायेवा का कथन यहाँ स्मरणीय है—“बहुत दूर की बात छेड़ता है कवि, / बहुत दूर की बात खींच ले जाती है कवि को।” मयंक श्रीवास्तव भी रामवती की चुप्पी के पीछे छिपे सामाजिक यथार्थ को पहचान लेते हैं। वे समझते हैं कि यह केवल एक स्त्री की व्यक्तिगत व्यथा नहीं, बल्कि उस सामूहिक स्त्री-अनुभव की अभिव्यक्ति है जिसे पितृसत्तात्मक समाज ने लंबे समय तक दबाए रखा है।

इस प्रकार रामवती का मौन एक मूक प्रतिरोध भी बन जाता है। वह बिना कुछ कहे समाज से प्रश्न करती है कि आख़िर ऐसी कौन-सी परिस्थितियाँ थीं जिन्होंने उसके जीवन से सपनों, विश्वास और अभिव्यक्ति का अधिकार छीन लिया। इसलिए यह चुप्पी पराजय का नहीं, बल्कि सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध एक गहरे आरोपपत्र का रूप ग्रहण कर लेती है। मयंक श्रीवास्तव की संवेदनशील दृष्टि इस मौन को भाषा प्रदान करती है और उसे भारतीय स्त्री-अस्मिता के व्यापक प्रतीक में रूपांतरित कर देती है।

‘बीमार पुरुष’ और पितृसत्ता का विमर्श

रामवती की सबसे महत्वपूर्ण पंक्तियों में से एक है—“जिस दिन वह बीमार पुरुष से ब्याही गई, / उसी दिन से कर बैठी थी विधवा होने की तैयारी रामवती।” इन पंक्तियों का अर्थ केवल इतना नहीं है कि रामवती का पति शारीरिक रूप से अस्वस्थ था। समकालीन आलोचना की दृष्टि से ‘बीमार पुरुष’ एक व्यापक सामाजिक और सांस्कृतिक रूपक है। यह उस पुरुषवादी मानसिकता का प्रतिनिधि है जो स्त्री को स्वतंत्र व्यक्तित्व के रूप में स्वीकार नहीं करती, बल्कि उसे अपने अधिकार, नियंत्रण और उपभोग की वस्तु समझती है। यहाँ बीमारी शरीर की नहीं, बल्कि विचारों, मूल्यों और सामाजिक चेतना की बीमारी है। ऐसी व्यवस्था में विवाह साझेदारी का संबंध न होकर स्त्री के आत्मसमर्पण का माध्यम बन जाता है। इसलिए विवाह के साथ ही रामवती के सपनों, इच्छाओं और स्वतंत्र अस्तित्व का क्षय प्रारम्भ हो जाता है। ‘विधवा होने की तैयारी’ वस्तुतः उसके जीवंत व्यक्तित्व की सामाजिक मृत्यु का संकेत है।

इसी संदर्भ में कवि लिखता है—“बूढ़े अनुशासन ने इतना सख़्त लगा डाला पहरा, / अपने नये-पुराने सारे सपने हारी रामवती।” यहाँ ‘बूढ़ा अनुशासन’ उन जड़ और अप्रासंगिक सामाजिक मान्यताओं का प्रतीक है जो परंपरा और मर्यादा के नाम पर स्त्री की स्वतंत्रता को नियंत्रित करती रही हैं। यह अनुशासन इतना पुराना है कि उसकी उपयोगिता समाप्त हो चुकी है, किंतु उसका प्रभाव अब भी बना हुआ है। परिणामस्वरूप रामवती अपने नए सपनों के साथ-साथ पुराने अरमानों से भी हाथ धो बैठती है। कवि यहाँ किसी एक स्त्री की निजी त्रासदी का चित्रण नहीं कर रहा, बल्कि उस पितृसत्तात्मक सामाजिक संरचना की आलोचना कर रहा है जिसमें स्त्री का जीवन अक्सर उसके अपने निर्णयों से नहीं, बल्कि दूसरों द्वारा निर्मित नियमों से संचालित होता है। इस प्रकार रामवती का संघर्ष व्यक्तिगत न रहकर समूची स्त्री-अस्मिता के संघर्ष का प्रतीक बन जाता है।

स्त्री का वस्तुकरण और सामाजिक दृष्टि का संकट

रामवती की त्रासदी केवल उसके निजी जीवन तक सीमित नहीं है; वह समाज की विकृत दृष्टि का भी शिकार है। कवि लिखता है—“जब-जब भी गुज़री बस्ती से मन अपना विक्षिप्त लिए, / मैंने देखा टेर रहे थे कई जुआरी रामवती।” इन पंक्तियों में ‘जुआरी’ शब्द अत्यंत प्रतीकात्मक है। यहाँ जुआरी केवल कुछ व्यक्तियों का संकेत नहीं करता, बल्कि उस पुरुषवादी मानसिकता का प्रतिनिधित्व करता है जो स्त्री को एक स्वतंत्र व्यक्तित्व के रूप में स्वीकार करने के बजाय उसे आकर्षण, उपभोग और मनोरंजन की वस्तु के रूप में देखती है। रामवती मानसिक पीड़ा और सामाजिक उपेक्षा से गुज़र रही है, किंतु समाज उसकी वेदना को समझने के बजाय उसे अपनी दृष्टि का विषय बना देता है।

समकालीन स्त्री-विमर्श की दृष्टि से यह स्त्री के वस्तुकरण (Objectification) की स्थिति है, जहाँ उसके व्यक्तित्व, संघर्ष और मानवीय संवेदनाओं की उपेक्षा कर उसे केवल ‘देखे जाने योग्य वस्तु’ में बदल दिया जाता है। रामवती के पीछे पुकारते जुआरी उस संवेदनहीन समाज का रूपक हैं जो स्त्री की अस्मिता के बजाय उसके बाह्य अस्तित्व में अधिक रुचि रखता है। इस प्रकार यह शेर केवल एक स्त्री की व्यथा का चित्रण नहीं करता, बल्कि उस सामाजिक मानसिकता की आलोचना भी करता है जो स्त्री को बराबरी के मनुष्य के रूप में स्वीकार करने में अब भी असफल रही है। मयंक श्रीवास्तव यहाँ स्त्री-अस्मिता पर होने वाले इस सूक्ष्म सामाजिक आक्रमण को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से उजागर करते हैं।

मर्यादा और आत्मसम्मान

रामवती की एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण पंक्ति है—“मर्यादा की एक पुजारिन है यह नारी रामवती।” यहाँ ‘मर्यादा’ शब्द को उसके पारंपरिक अर्थों तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए। कवि के यहाँ मर्यादा किसी दमनकारी सामाजिक अनुशासन या स्त्री पर लगाए गए बाहरी नियंत्रण का प्रतीक नहीं है, बल्कि आत्मसम्मान, नैतिक दृढ़ता और मानवीय गरिमा का पर्याय है। रामवती जीवन के अनेक संघर्षों, अभावों, अपमानों और मानसिक यातनाओं से गुजरती है, किंतु वह अपने मूल मानवीय मूल्यों को नहीं छोड़ती। यही उसकी वास्तविक शक्ति है।

समकालीन स्त्री-विमर्श के संदर्भ में यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि रामवती की मर्यादा उसकी निष्क्रियता का नहीं, बल्कि उसकी आंतरिक शक्ति का परिचायक है। वह परिस्थितियों के आगे पूरी तरह टूट नहीं जाती, बल्कि अपने आत्मबोध और नैतिक चेतना को बचाए रखती है। उसके भीतर की यह गरिमा उसे केवल एक पीड़ित स्त्री के रूप में नहीं, बल्कि संघर्षशील और स्वाभिमानी व्यक्तित्व के रूप में स्थापित करती है। इस प्रकार रामवती का चरित्र यह संकेत करता है कि आत्मसम्मान मनुष्य की सबसे बड़ी संपत्ति है। जीवन की कठिनतम परिस्थितियों में भी जो व्यक्ति अपनी मानवीय गरिमा और नैतिक आधार को सुरक्षित रखता है, वही वास्तव में विजयी होता है। मयंक श्रीवास्तव ने रामवती के माध्यम से स्त्री की इसी आंतरिक शक्ति, धैर्य और स्वाभिमान को अत्यंत संवेदनशीलता के साथ अभिव्यक्त किया है।

माँ: भविष्य की चिंता और राष्ट्र का रूपक

रामवती में माँ का चित्र केवल पारिवारिक संवेदना तक सीमित नहीं रहता, बल्कि व्यापक सामाजिक और राष्ट्रीय सरोकारों का रूप धारण कर लेता है। कवि लिखता है—“बच्चों के भावी जीवन से डरी हुई है मेरी माँ, / ज़िंदा होकर भी लगती है मरी हुई है मेरी माँ।” इन पंक्तियों में माँ की चिंता केवल अपने बच्चों के वर्तमान तक सीमित नहीं है; वह उनके भविष्य को लेकर आशंकित है। बदलते सामाजिक परिवेश, बढ़ती असमानता, नैतिक मूल्यों के क्षरण और संवेदनहीन होती व्यवस्था ने उसके भीतर गहरा भय पैदा कर दिया है। इस अर्थ में माँ यहाँ राष्ट्र की सामूहिक चेतना का प्रतीक बन जाती है, जो आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को लेकर चिंतित है।

यह चिंता आगे और अधिक गहरी हो जाती है जब कवि कहता है—“कोई नहीं सुनेगा तेरी अब मत और पुकार नदी।” और—“मौसम का दिल तो पत्थर से और अधिक हो गया कड़ा, / इसके आगे अश्रु बहाना है तेरा बेकार नदी।” यहाँ ‘नदी’ जीवन, संवेदना और लोकचेतना का प्रतीक है। कवि को लगता है कि समाज इतना संवेदनहीन हो चुका है कि अब पीड़ा की पुकार भी अनसुनी रह जाती है। आँसू, करुणा और विनय का भी कोई प्रभाव नहीं पड़ता। ये पंक्तियाँ ऐसे समय का चित्र प्रस्तुत करती हैं जहाँ मनुष्य तकनीकी रूप से प्रगतिशील तो है, किंतु मानवीय संवेदनाओं के स्तर पर लगातार कठोर होता जा रहा है। मयंक श्रीवास्तव इस मार्मिक चित्रण के माध्यम से न केवल सामाजिक विडंबना को उजागर करते हैं, बल्कि संवेदनशील और मानवीय समाज की आवश्यकता की ओर भी संकेत करते हैं।

प्रतिरोध और नारी-शक्ति

मयंक श्रीवास्तव की काव्य-दृष्टि केवल करुणा और सहानुभूति तक सीमित नहीं है; उसमें प्रतिरोध और परिवर्तन की आकांक्षा भी समान रूप से उपस्थित है। वे स्त्री को केवल पीड़ा सहने वाली या संरक्षण की अपेक्षा रखने वाली सत्ता के रूप में नहीं देखते, बल्कि उसे अपने अधिकारों और अस्मिता के लिए संघर्ष करने वाली सक्रिय चेतना के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं। इसी भावभूमि में वे लिखते हैं—“तुझको अपनी इज़्ज़त की रक्षा खुद ही करनी होगी, / इसके लिए थामने होंगे हाथों में हथियार नदी।” इन पंक्तियों में ‘हथियार’ शब्द का अर्थ केवल भौतिक अस्त्र-शस्त्र नहीं है। समकालीन स्त्री-विमर्श की दृष्टि से यह शिक्षा, आत्मनिर्भरता, जागरूकता, संगठन, आत्मविश्वास और वैचारिक शक्ति का प्रतीक है। कवि यह स्पष्ट संकेत देता है कि स्त्री-मुक्ति का मार्ग किसी बाहरी कृपा या संरक्षण से नहीं, बल्कि स्वयं स्त्री की चेतना और सक्रिय भागीदारी से प्रशस्त होगा। अपनी गरिमा और अधिकारों की रक्षा के लिए उसे स्वयं आगे आना होगा।

यहाँ ‘नदी’ का प्रतीक भी महत्वपूर्ण है। नदी जीवनदायिनी है, किंतु आवश्यकता पड़ने पर चट्टानों को काटकर अपना मार्ग भी बना लेती है। कवि स्त्री में इसी ऊर्जा, साहस और आत्मबल को देखता है। वह उसे दया की पात्र नहीं, बल्कि संघर्ष की नायिका के रूप में प्रस्तुत करता है। इस प्रकार ये पंक्तियाँ स्त्री को निष्क्रिय सहनशीलता से आगे बढ़कर आत्मसम्मान, स्वाधिकार और प्रतिरोध की दिशा में सक्रिय होने का प्रेरक संदेश देती हैं। यही रामवती की प्रगतिशील और समकालीन चेतना का महत्वपूर्ण पक्ष है।

स्त्री का बहुआयामी स्वरूप

मयंक श्रीवास्तव की पंक्तियाँ स्त्री के बहुआयामी व्यक्तित्व, उसकी जटिल जीवन-संरचना और उसके अस्तित्वगत वैभव का अत्यंत सशक्त काव्यात्मक रूपायन करती हैं। कवि स्त्री को किसी एक निश्चित परिभाषा, भूमिका या सामाजिक पहचान में सीमित नहीं करता, बल्कि उसे जीवन और सृष्टि के विविध आयामों के साथ जोड़कर देखता है। जब वह कहता है—“यह लहर है, यह भँवर है, यह किनारा है, / नाव है, लेकिन कहीं मँझधार है औरत” — तब वह स्त्री को जीवन-यात्रा के समूचे गतिशील तंत्र के रूप में प्रस्तुत करता है। यहाँ लहर उसकी ऊर्जा, सृजनशीलता और जीवंतता का प्रतीक है; भँवर उसके भीतर छिपे संघर्षों, द्वंद्वों और जटिल मनःस्थितियों का; किनारा उसकी आश्रयदात्री एवं संरक्षक भूमिका का; नाव उसके वहनशील और सहायक स्वरूप का; और मँझधार उसकी अपनी असुरक्षाओं, अनिश्चितताओं तथा अस्तित्वगत संघर्षों का संकेत है। यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि कवि स्त्री को केवल दूसरों के लिए संघर्षरत सत्ता के रूप में नहीं देखता, बल्कि यह भी स्वीकार करता है कि वह स्वयं भी अनेक बार जीवन की मँझधार में खड़ी होती है। इस प्रकार स्त्री यहाँ केवल सहारा देने वाली नहीं, बल्कि संघर्ष करने वाली चेतना के रूप में भी उपस्थित है।

इसी प्रकार “एक मंदिर, एक पूजा, एक श्रद्धा है, / एक प्रतिमा का लिए आकार है औरत” में कवि भारतीय सांस्कृतिक मानस में स्त्री के प्रति निहित आदर और आस्था को अभिव्यक्त करता है। मंदिर, पूजा और श्रद्धा जैसे शब्द केवल धार्मिक प्रतीक नहीं हैं, बल्कि वे उन मानवीय मूल्यों के द्योतक हैं जिनके आधार पर समाज का नैतिक और सांस्कृतिक ढाँचा निर्मित होता है। स्त्री को मंदिर कहना उसके भीतर निहित पवित्रता, धैर्य और करुणा को रेखांकित करना है; पूजा कहना उसके प्रति सम्मान और समर्पण की भावना को व्यक्त करना है; और श्रद्धा कहना उसके अस्तित्व को मानवीय विश्वास का केंद्र स्वीकार करना है। वहीं “प्रतिमा” का बिंब स्त्री के आदर्श रूप का संकेत देता है, किंतु कवि यहाँ उसे जड़ मूर्ति के रूप में नहीं, बल्कि उन मूल्यों की जीवित अभिव्यक्ति के रूप में देखता है जिन पर समाज की सभ्यता और संस्कृति टिकी हुई है।

कवि आगे कहता है —“एक पर्वत, एक चोटी, एक तिनका है, / एक आँगन, एक देहरी द्वार है औरत”— इस शेर में स्त्री की शक्ति और संवेदनशीलता का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। पर्वत उसकी दृढ़ता, साहस और अडिग संकल्प का प्रतीक है; चोटी उसकी उपलब्धियों, ऊँचाइयों और जीवन में प्राप्त उत्कृष्टता का; जबकि तिनका उसके कोमल, भावुक और संवेदनशील पक्ष का प्रतिनिधित्व करता है। इसी प्रकार आँगन, देहरी और द्वार जैसे बिंब भारतीय पारिवारिक एवं सांस्कृतिक जीवन के केंद्र हैं। आँगन वह स्थान है जहाँ जीवन की पहली किलकारियाँ गूँजती हैं, जहाँ संबंधों का पोषण होता है; देहरी घर और संसार के बीच का वह सांस्कृतिक सेतु है जो मर्यादा, परंपरा और संबंधों को जोड़ता है; और द्वार वह बिंदु है जहाँ से जीवन की यात्राएँ आरंभ होती हैं और लौटकर पुनः घर में प्रवेश करती हैं। कवि इन प्रतीकों के माध्यम से यह संकेत करता है कि स्त्री केवल परिवार की सदस्य नहीं, बल्कि वह समूचे सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन की आधारशिला है।

समकालीन स्त्री-विमर्श की दृष्टि से इन पंक्तियों का महत्त्व और भी बढ़ जाता है, क्योंकि यहाँ स्त्री को न तो केवल त्याग और समर्पण की मूर्ति बनाकर प्रस्तुत किया गया है और न ही केवल पीड़िता के रूप में। वह शक्ति भी है, संवेदना भी; संघर्ष भी है, आश्रय भी; परंपरा भी है, परिवर्तन भी। वह जीवन की निरंतरता का आधार है और भविष्य की संभावनाओं का भी केंद्र है। इस प्रकार ये पंक्तियाँ स्त्री को संबंधों की सीमित परिधि से मुक्त करके उसे एक स्वतंत्र, बहुआयामी और पूर्ण मानवीय सत्ता के रूप में प्रतिष्ठित करती हैं। यहाँ स्त्री किसी एक भूमिका में बँधी हुई नहीं, बल्कि स्वयं एक संपूर्ण संसार, एक जीवित संस्कृति और एक गतिशील सभ्यता के रूप में उपस्थित है। यही इन पंक्तियों की सबसे बड़ी काव्यात्मक और वैचारिक उपलब्धि है।

लोकजीवन और प्रतिनिधि चरित्र

रामवती की एक महत्वपूर्ण विशेषता उसके जीवंत और प्रतिनिधि चरित्र हैं। रामवती, चंपा, रामरतन, नीलकंठ और चौधरी जैसे पात्र केवल किसी ग़ज़ल के पात्र नहीं हैं, बल्कि भारतीय लोकजीवन और सामाजिक यथार्थ के प्रतीक हैं। इन चरित्रों के माध्यम से मयंक श्रीवास्तव गाँव, कस्बे और सामान्य जनजीवन की उन अनुभूतियों को अभिव्यक्ति देते हैं जो प्रायः मुख्यधारा के विमर्श से बाहर रह जाती हैं। इस दृष्टि से उनका काव्य लोक-संवेदना और सामाजिक यथार्थ का महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ बन जाता है।

विशेष रूप से ‘चंपा’ का चरित्र कवि की व्यापक सामाजिक दृष्टि को उद्घाटित करता है। वह लिखते हैं—“हो गया है देश ही बीमार जब अपना, / कौन आये देखने बीमार चंपा को।” यह शेर व्यक्तिगत पीड़ा को राष्ट्रीय संकट से जोड़ देता है। चंपा की बीमारी केवल एक व्यक्ति की बीमारी नहीं रह जाती, बल्कि वह उस समाज की स्थिति का रूपक बन जाती है जो स्वयं अनेक सामाजिक, आर्थिक और नैतिक संकटों से ग्रस्त है। जब पूरा देश ही असमानता, भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी और संवेदनहीनता जैसी समस्याओं से जूझ रहा हो, तब किसी एक व्यक्ति का दुख अनदेखा रह जाता है। इस प्रकार कवि व्यक्तिगत अनुभव को व्यापक सामाजिक संदर्भ प्रदान करता है।

इन चरित्रों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे किसी विशेष वर्ग के नहीं, बल्कि सामान्य भारतीय जनजीवन के प्रतिनिधि हैं। उनके माध्यम से कवि समाज की विडंबनाओं, संघर्षों और आशाओं को स्वर देता है। यही कारण है कि रामवती के पात्र पाठक को परिचित और आत्मीय लगते हैं तथा संग्रह को लोकधर्मी संवेदना से समृद्ध बनाते हैं।

पर्यावरणीय चेतना और सांस्कृतिक स्मृति

समकालीन हिंदी आलोचना में पर्यावरणीय विमर्श (इको-क्रिटिसिज़्म) एक महत्त्वपूर्ण अध्ययन-दृष्टि के रूप में उभरा है। प्रकृति और मनुष्य के संबंधों में बढ़ती दूरी, पर्यावरणीय संकट और पारिस्थितिक असंतुलन ने साहित्य को भी नए ढंग से सोचने के लिए प्रेरित किया है। मयंक श्रीवास्तव की संवेदना इस प्रश्न से अछूती नहीं है। वे लिखते हैं—“इन हाथों ने पेड़ बहुत काटे, / पेड़ लगाने की कुछ बातें हों।” यहाँ कवि केवल वृक्षारोपण का संदेश नहीं दे रहा, बल्कि मनुष्य और प्रकृति के बीच टूटते हुए आत्मीय संबंधों की ओर संकेत कर रहा है। आधुनिक विकास की अंधी दौड़ में प्रकृति का लगातार दोहन हुआ है, जिसके परिणामस्वरूप पर्यावरणीय संकट गहराता गया है। कवि इस स्थिति के प्रति आत्मालोचन का भाव व्यक्त करते हुए संतुलन और संरक्षण की आवश्यकता पर बल देता है।

इसी प्रकार उनकी पंक्तियाँ—“कोमल और हरे पत्तों का गिरना बंद नहीं होता, / देख चुका है अब तक लेकर हर करवट पीपल का पेड़।” प्रकृति को सांस्कृतिक स्मृति और समय-बोध से जोड़ देती हैं। भारतीय जीवन में पीपल का वृक्ष केवल एक पेड़ नहीं, बल्कि परंपरा, आस्था और लोक-संस्कृति का जीवंत प्रतीक रहा है। यहाँ पीपल का पेड़ समय के साक्षी के रूप में उपस्थित है, जिसने जीवन के अनेक उतार-चढ़ाव, पीढ़ियों के परिवर्तन और समाज की बदलती करवटों को देखा है। गिरते हुए पत्ते जीवन की निरंतरता, परिवर्तन और क्षरण की प्रक्रिया का संकेत देते हैं।

इस प्रकार मयंक श्रीवास्तव प्रकृति को केवल सौंदर्य के विषय के रूप में नहीं देखते, बल्कि उसे सांस्कृतिक स्मृति, ऐतिहासिक चेतना और मानवीय अस्तित्व से जोड़कर प्रस्तुत करते हैं। उनकी ये पंक्तियाँ पर्यावरण-संरक्षण के साथ-साथ प्रकृति के प्रति संवेदनशील और उत्तरदायी दृष्टिकोण विकसित करने का भी संदेश देती हैं।

प्रेम, सहकार और मानवीय भविष्य

मयंक श्रीवास्तव की काव्य-दृष्टि का सबसे महत्त्वपूर्ण आधार प्रेम, सहकार और मानवीय संवेदना है। सामाजिक विडंबनाओं, स्त्री-पीड़ा, संघर्ष और प्रतिरोध के विविध चित्र प्रस्तुत करने के बावजूद वे निराशा के कवि नहीं हैं। उनके भीतर मनुष्य और मानवता के प्रति गहरा विश्वास विद्यमान है। यही विश्वास उनकी पंक्तियों में व्यक्त होता है—“प्यार बहुत है मान लिया लेकिन, / प्यार जताने की कुछ बातें हों।” कवि यहाँ केवल भावनात्मक प्रेम की बात नहीं कर रहा, बल्कि उन मानवीय संबंधों की ओर संकेत कर रहा है जिनका आधार आत्मीयता, संवाद और परस्पर सहयोग है। केवल प्रेम का दावा पर्याप्त नहीं; उसे व्यवहार और कर्म में भी व्यक्त होना चाहिए।

इसी भावभूमि को आगे बढ़ाते हुए वे लिखते हैं—“ज़िंदगी का तुम्हें असली पता मिल जाएगा, / मेरी ग़ज़लों को तरन्नुम में तो गाकर देखो।” और—“मुझमें लहरा रहे सागर का संग चाहो तो, / दिल में एक प्यार का पौधा तो उगाकर देखो।” इन पंक्तियों में प्रेम जीवन की सृजनात्मक शक्ति बनकर उभरता है। कवि का विश्वास है कि मनुष्य के भीतर करुणा, सहानुभूति और प्रेम का पौधा जीवित रहे तो जीवन अधिक अर्थपूर्ण और सुंदर बन सकता है। परिवर्तन केवल संघर्ष और प्रतिरोध से ही नहीं, बल्कि संवेदनशीलता और मानवीय सहयोग से भी संभव है।

इसी संदर्भ में वरिष्ठ कवि राम सेंगर की पंक्तियाँ स्मरणीय हैं—“छुप-छुपकर रोना मत ओ रे क़ंदील, / पिघलेगी दुख की यह जमी हुई झील।” यह आशा, धैर्य और सकारात्मक भविष्य का संदेश है। वस्तुतः रामवती का अंतिम स्वर निराशा का नहीं, बल्कि प्रेम, विश्वास और मानवीय पुनर्निर्माण का स्वर है। मयंक श्रीवास्तव मानते हैं कि मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति उसकी संवेदना है, और इसी के सहारे एक अधिक मानवीय और सुंदर समाज की रचना संभव है।

निष्कर्ष

रामवती को केवल एक ग़ज़ल-संग्रह के रूप में पढ़ना उसके साहित्यिक और वैचारिक महत्त्व को सीमित कर देना होगा। यह संग्रह वस्तुतः समकालीन भारतीय समाज के बहुआयामी यथार्थ का काव्यात्मक दस्तावेज़ है, जिसमें स्त्री-अस्मिता, लोकजीवन, सामाजिक विषमता, सांस्कृतिक स्मृति, पर्यावरणीय चेतना, मानवीय संबंधों और प्रतिरोध की विविध धाराएँ एक साथ प्रवाहित होती हैं। मयंक श्रीवास्तव ने अपनी ग़ज़लों के माध्यम से न केवल अपने समय की विडंबनाओं और अंतर्विरोधों को स्वर दिया है, बल्कि उन मानवीय मूल्यों को भी पुनर्स्थापित करने का प्रयास किया है जिनके बिना किसी भी सभ्य समाज की कल्पना संभव नहीं है।

संग्रह की केंद्रीय पात्र रामवती किसी एक स्त्री का नाम नहीं रह जाती; वह भारतीय स्त्री के सामूहिक अनुभव, संघर्ष और अस्मिता का प्रतीक बन जाती है। उसके माध्यम से कवि पितृसत्तात्मक व्यवस्था, सामाजिक रूढ़ियों, आर्थिक विषमताओं और संवेदनहीन होती मानवीय प्रवृत्तियों पर गंभीर प्रश्न उठाता है। साथ ही रामरतन, चंपा, नीलकंठ और चौधरी जैसे पात्रों के माध्यम से वह लोकजीवन के उन चेहरों को सामने लाता है जो सामान्य होते हुए भी अपने भीतर पूरे समाज की कहानी समेटे हुए हैं। इस प्रकार रामवती का संसार व्यक्तिगत अनुभवों से आगे बढ़कर सामूहिक सामाजिक चेतना का संसार बन जाता है।

विशेष रूप से उल्लेखनीय यह है कि मयंक श्रीवास्तव केवल करुणा के कवि नहीं हैं। उनकी कविता में पीड़ा है, किंतु वह निष्क्रिय नहीं है; उसमें प्रतिरोध की ऊर्जा भी है। वे स्त्री को दया की पात्र नहीं, बल्कि संघर्ष और आत्मनिर्णय की क्षमता से संपन्न सत्ता के रूप में देखते हैं। यही कारण है कि उनकी कविता करुणा से होकर प्रतिरोध तक और प्रतिरोध से होकर पुनर्निर्माण तक की यात्रा करती है। उनकी दृष्टि में परिवर्तन का मार्ग केवल संघर्ष से नहीं, बल्कि प्रेम, सहकार और मानवीय संवेदना से भी होकर जाता है।

संग्रह का एक अन्य महत्त्वपूर्ण पक्ष इसकी पर्यावरणीय और सांस्कृतिक चेतना है। पेड़, नदी, पीपल, गाँव और लोकजीवन से जुड़े बिंब केवल सौंदर्यपरक तत्व नहीं हैं; वे उस सांस्कृतिक स्मृति के वाहक हैं जिसे आधुनिकता और उपभोक्तावाद के दबाव में लगातार विस्मृत किया जा रहा है। मयंक श्रीवास्तव इन प्रतीकों के माध्यम से मनुष्य और प्रकृति, अतीत और वर्तमान तथा लोक और आधुनिकता के बीच संवाद स्थापित करते हैं। इस दृष्टि से रामवती समकालीन हिंदी साहित्य में पर्यावरणीय और सांस्कृतिक विमर्शों से भी जुड़ती दिखाई देती है।

नामवर सिंह का यह कथन अत्यंत प्रासंगिक है कि “साहित्य का काम केवल यथार्थ का चित्रण करना नहीं, बल्कि मनुष्य की संभावनाओं को बचाए रखना भी है।” रामवती इसी अर्थ में एक महत्त्वपूर्ण कृति है। यह संग्रह समाज के अंधकारमय पक्षों को उजागर करता है, परंतु निराशा का आख्यान नहीं रचता। इसके भीतर आशा, विश्वास, प्रेम, संघर्ष और पुनर्निर्माण की संभावनाएँ निरंतर सक्रिय रहती हैं। यही कारण है कि इसकी ग़ज़लें पाठक को केवल भावुक नहीं करतीं, बल्कि उसे सोचने, प्रश्न करने और बेहतर समाज के निर्माण के लिए प्रेरित भी करती हैं।

अंततः कहा जा सकता है कि रामवती हिंदी ग़ज़ल परंपरा की उन उल्लेखनीय कृतियों में है जो अपने समय के यथार्थ से गहरे स्तर पर संवाद करती हैं। यह संग्रह स्त्री-विमर्श, लोकचेतना, सामाजिक आलोचना, पर्यावरणीय संवेदना और मानवीय मूल्यों के समन्वय से एक व्यापक जीवन-दृष्टि निर्मित करता है। मयंक श्रीवास्तव अपने समय के केवल साक्षी नहीं, बल्कि उसके सजग व्याख्याकार, संवेदनशील इतिहासकार और मानवीय भविष्य के विश्वासी कवि हैं। यही रामवती की स्थायी प्रासंगिकता और उसकी सबसे बड़ी साहित्यिक उपलब्धि है।

संदर्भ: श्रीवास्तव मयंक, रामवती. भोपाल: पहले पहल प्रकाशन, 2011


लेखक के बारे में

कवि, आलोचक, अनुवादक डॉ. अवनीश सिंह चौहान हिंदी भाषा एवं साहित्य की वेब पत्रिका— 'पूर्वाभास' और अंग्रेज़ी भाषा एवं साहित्य की अंतर्राष्ट्रीय शोध पत्रिका— 'क्रिएशन एण्ड क्रिटिसिज़्म' के संपादक हैं। संपर्क : 36, गोधूलिपुरम, वृन्दावन बांगर, वृन्दावन, मथुरा-281121 (उ.प्र.) भारत। मो. 9456011560, ईमेल : abnishsinghchauhan@gmail.com

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