रामजी की फोटो
महेश शर्मा
दरअसल ग़लती मेरी ही थी। यदि उस दिन मेले में जाकर माँ के लिये रामजी का फोटो पसन्द करके मैं ना लाता तो घर में इतना बखेड़ा ही ना होता। रामजी के फोटो को लेकर घर में घमासान मचा हुआ था। माँ और छोटा बन्टी एक तरफ़ थे, तो बिन्नी और उसकी मम्मी यानी श्रीमती एक तरफ़। और मैं? मैं किधर था? माँ की तरफ़? बेटी की तरफ़ या श्रीमती की तरफ़? मैं तो सब तरफ़ था, हर तरफ़ था। यद्यपि मैं कोई देवता नहीं था, जो हर तरफ़ हो, सब की तरफ़ हो। लेकिन मैं अकेला कहाँ था मैं बेटा भी था, मैं बाप भी था और मैं पति भी था। अब यदि इन सारे स्वरूपों में ही युद्ध होने लग जाये तो बेचारा ‘मैं’ कहाँ जाये?
ख़ैर बात विस्तार से बताना होगी तभी आपको भी समझ में आयेगी।
होता यूँ है कि गाँव से माँ आई हुई है; महीने दो महीने साथ रहने के लिये। नयी बात नहीं है साल में दो-तीन बार आती है। मेरे यहाँ रहना उसे अच्छा लगता है। पत्नी को भी कोई परेशानी नहीं होती। सास-बहू दोनों में अच्छा सामंजस्य है, और बच्चे तो दादी के प्रति बहुत स्नेह भी रखते हैं, और उसे ज़्यादा से ज़्यादा अपने साथ रखना चाहते हैं। क्योंकि मैं तो व्यस्त रहता हूँ ऑफ़िस कार्य में और वाइफ़ व्यस्त रहती है घरेलू काम में। अब इनका दिन भर का साथ देने वाली तो दादी ही थी, तो बड़ा बेटा गोलु, बिन्नी और छोटा बन्टी तीनों दादी से प्यार भी करते थे और उसका साथ भी पसन्द करते थे। लेकिन यहाँ एक पेंच अक्सर फँस जाता था। बिन्नी यानी मेरी दस साल की बेटी और माँ के बीच यानी दादी और पोती के बीच। वैसे ये आम घरों की कहानी है कि दादी-पोती में प्यार भी बहुत होता है लेकिन बहस और ज़िद भी बहुत होती रहती है। मेरे यहाँ भी बिन्नी अपनी दादी से प्यार भी बहुत करती है उसका ध्यान भी बहुत रखती है लेकिन अपनी बात मनवाने या ऊपर रखने में कोई समझौता नहीं करती बल्कि दादी से भी पूरी टक्कर लेती थी। अक्सर दादी पोती में बहस और विवाद होता रहता था। विवाद के कारण वही कुछ जो पीढ़ियों के अंन्तर या विचारधारा का फ़र्क़ पुराने रहन-सहन का ढंग और नयी पीढ़ी की नफ़ासत भरी लाइफ़ स्टाइल। माँ अपने सिरहाने प्लास्टिक के तीन-चार छोटे-छोटे डब्बे रखती थी जिनमें उसकी दवाई गोली, खाने का कुछ आइटम बिस्किट वग़ैरा रखती थी। बिन्नी इस बात की ज़िद करती कि ये डब्बे यहाँ अच्छे नहीं लगते इनको अन्दर रखो; माँ नहीं मानती। माँ शाम पाँच बजे से कल सुबह पहनने के कपड़े अपने सिरहाने रख लेती—बिन्नी इस बात पर बहुत ग़ुस्सा होती कहती, “दादी ने बैठक रूम की बारा बजा दी है।” और माँ का कहना था कि “ईमें कंई ग़लत हे?”
बिन्नी के कपड़े आजकल की फ़ैशन के अनुसार थोड़े शॉर्ट होते माँ कहती, “अच्छा नी लगे।” ऐसी कई छोटी-छोटी बातें बहस का रूप ले लेतीं। और इन सभी बहसों का अन्त होता माँ के इस वाक्य पर कि “वा म्हके कँई करनो जैसो तमारे अंच्छो लगे वैसो करो।” इतना कह कर माँ चुप होकर सो जाती। माँ को नाराज़ जान कर थोड़ी देर बाद ख़ुद बिन्नी ही दादी के गले लग जाती उसे मना लेती और माँ नॉर्मल हो जाती।
इसी तरह दिन भर में घर में कोई ख़ास घटना होती, रिश्तेदारों का कोई पत्र या जानकारी पता चलती तो शाम को जब मैं ऑफ़िस से घर आता तब दादी और पोती में इस बात की होड़ मचती कि सबसे पहले वो सारी बातें मुझे कौन बताये।
मेरे घर में घुसते ही माँ शुरू करना चाहती तभी उसकी बात काट कर बिन्नी सुनाने लग जाती लेकिन माँ उसे तत्काल डाँटती, “चुप चुप रे तू म्हके बताने दे।” दोनों में बहस छिड़ जाती ऐसी बहस का अन्त इस स्तर तक आ जाता कि बिन्नी ज़ोर से कहती, “मेरे पापा हैं मैं बताऊँगी उनको।” लेकिन माँ उससे ज़्यादा ज़ोर से चिल्लाकर कहती कि “म्हारो भी छोरो है वो, मैं बतउँगा उके।”
और मैं किंकर्तव्यविमूढ़-सा दोनों के बीच खड़ा इस बाल–वृद्ध बहस का अन्त होने का इन्तज़ार करता। ऐसे में थर्ड पार्टी के रूप में श्रीमती का आगमन होता। कुछ बिन्नी को डाँट कुछ माँ को उलाहना देकर दोनों योद्धाओं को अलग-अलग कर देती और दोनों ही थोड़ा-थोड़ा ग़ुस्सा लिये चुप हो जाते। हालाँकि चलती बहस के दौरान ही दोनों ज़ोर-ज़ोर से बोल-बोल कर संबधित घटना का पूरा ब्योरा मुझे बता भी देते।
ऐसी कई छोटी-मोटी खट्टी-मीठी बातें होती रहतीं। सभी घरों में होती रहती हैं।
लेकिन इन्हीं के बीच मैं जिस समस्या में उलझा वो बात आगे बढ़ाते हैं। नगर में लगे मेले में हम पति-पत्नी और बच्चे इन्जाय करने गये थे। वहीं एक फोटो एवं पेंटिंग्स की दुकान पर मैं ठिठक गया। वहाँ बहुत से धार्मिक फोटो के अलावा फ़िल्म स्टार के और प्राकृतिक दृश्यों के फोटो रखे थे। लेकिन मेरी नज़र एक क्षण में ही सामने रखे एक बड़े फोटो पर टिक गई जिसमें भगवान श्री राम, सीता और लक्ष्मण का चित्र पूरी खड़ी मुद्रा में दर्शित था तथा उनके चरणों में हनुमान जी बैठे थे। फोटो बहुत सुन्दर पुरातन एवं प्रभावी था। फोटो का साईज़ भी काफ़ी बड़ा था। लगभग साढ़े तीन फ़ुट ऊँचा और ढाई फ़ुट चौड़ा था फोटो का चित्रांकन तुलसी की रामायण में वर्णित प्राचीन शैली का होकर बड़ा मोहक और श्रद्धा जाग्रत करने वाला था।
मुझे पता था माँ बहुत धार्मिक स्वभाव की है तथा श्रीराम उसके आराध्य हैं जिन्हें वो अन्य सभी भगवानों से ज़्यादा स्मरण करती है। मेरे दिमाग़ में आया कि ये फोटो माँ को बहुत अच्छा लगेगा और पूजा घर की सुन्दरता में भी अभिवृद्धि होगी।
मैंने श्रीमती को बताया वो भी सहमत थी। मोल-भाव करके फोटो घर ले आये। फोटो घर ले जाते समय रास्ते में मैं स्वयं को बहुत प्रफुल्लित महसूस कर रहा था माँ यह फोटो देख कर बहुत ख़ुश होगी ये एहसास था।
वैसे भी जीवन की वास्तविक ख़ुशी का सार ही यह होता है कि हम किसी अपने प्रिय या अपने स्वजन के लिये कुछ करते हैं जिससे वो ख़ुश होता हे तथा उसे ख़ुश देखकर उसकी ख़ुशी का कारण स्वयं को मानकर हम भी ख़ुश होते है और ख़ुद में ही कुछ बड़प्पन महसूस करते हैं।
घर पहुँचते-पहुँचते रात के दस बज चुके थे। माँ लगभग सो चुकी थी मैं बैचेन था माँ को रामजी का फोटो बताने के लिये लेकिन मुझे रात को उसे उठा कर फोटो बताने के बजाय सुबह बताना ही ठीक लगा।
माँ हमेशा हमारे बैठक रूम में रखी शैट्टी पर ही सोती थी। दो बेडरूम किचन डायनिंग और गेस्ट रूम यही कुछ था हमारे निजी मकान में। एक बेडरूम में हम पति पत्नी दूसरे में बच्चे और कोई गेस्ट आये तो गेस्ट रूम में।
मैंने माँ से कहा कि वो गेस्टरूम में आराम से सोया करे, लेकिन माँ का कहना था कि अलग कमरे में उसे बिलकुल भी अच्छा नहीं लगेगा। मैं तो आगे बैठक में ही सोऊँगी और दिन भर बैठूँगी भी।
मैंने उसकी व्यवस्था बैठक रूम में ही रखी शैट्टी पर कर दी थी। अब वो रात में वहीं सोती और दिन में भी ज़्यादातर समय वहीं गुज़ारती। हालाँकि कभी-कभी मित्रों या अन्य मिलने वालों के आने पर वहीं बैठ कर बातें करना थोड़ा असहज सा लगता था लेकिन मैंने इन स्थितियों को स्वीकार कर लिया था। अगर किसी तरह की असहज स्थिति को बदल ना पाये तो उसे उसी रूप मैं स्वीकार कर लेना चाहिये, फिर वही स्थिति सामान्य लगने लगती है।
दूसरे दिन प्रातः उठते ही मैंने राम जी का फोटो माँ को दिखाया फोटो देखते ही माँ गद्गद् हो गई, “अरे वाह बेटा कितना सुन्दर फोटो लाया है, कितना भव्य और मोहक।” तत्काल ही माँ ने फोटो में स्मित हास्य बिखेरते भारतीय जनमानस के हृदय नायक श्रीराम लक्ष्मण सीता और उनके चरणों में बैठे हनुमान जी के आगे श्रद्धा से सिर झुका दिया।
हम पति, पत्नी, बन्टी, बिन्नी और गोलु बहुत अभिभूत थे माँ को इतना प्रसन्न और आह्लादित देख कर लेकिन इन आह्लादकारी क्षणों के तत्काल बाद आने वाली एक छोटी किन्तु गम्भीर समस्या का किसी को भान नहीं था।
भीगी पलकें और गहराती श्रद्धायुक्त आवाज़ में माँ बोली, “सुबह उठते ही ऐसे रामजी के फोटु का दर्शन रोज कर लो तो जीवन धन्य हो जाये सब पाप मिट जाये।”
हम सब ने बिना उनकी बात का आशय समझे सहमति में सर हिलाया। पत्नी किचन में जा चुकी थी बच्चे भी उनके कामों में व्यस्त हो गये थे। मैं माँ के पास ही बैठा था अचानक माँ बोली, “बेटा एक काम कर दे तु आज।”
“क्या माँ?” मैंने माँ की आँखों की ओर देखा।
“ये राम जी का फोटो तु लाया है ना इसको सामने दीवार पर लगा दे। ऐसा लगा कि मैं सुबह उठूँ तो आँख खोलते ही राम जी के दर्शन हों।”
मैं चौंका, “यहाँ? ड्राइंग रूम में? रामजी का फोटो? माँ ये फोटो बहुत बड़ा है यहाँ अच्छा नहीं लगेगा।”
“क्यों अच्छा क्यों नहीं लगेगा? भगवान का फोटो है इसमें अच्छा, नी अच्छा क्या?”
“ठीक है देखेंगे माँ,” मैंने बात ख़त्म करने की ग़रज़ से कहा और जाना चाहा तभी माँ का स्वर फिर गूँजा, “तो आज बाज़ार से बड़ी बिरंजी लेते आना और शाम को लगा देना फोटो।”
माँ की बात पूरी होते ना होते बिन्नी बाहर आई, “क्या हुआ दादी? बिरंजी किसलिये बुला रही हो?”
“अरे ये रामजी का फोटो लगाना है यहाँ दीवार पर। अच्छा लगेगा ना बिन्नी?”
“यहाँ दीवार पर? ड्राइंग रूम में, रामजी का फोटो?” बिन्नी हँसने लगी।
माँ के चेहरे का रंग बदलने लगा! “
क्यों हँसी क्यों?”
“अरे दादी भगवान का इतना बड़ा फोटो कोई ड्राइंगरूम में लगाता है क्या?”
“भगवान का नी लगाय तो किनका फोटु लगाय? ये पहाड़ का जंगल का और नदी का फोटु लगाय और भगवान का फोटु लगाने में शरम आये वाह रे जमाना।”
क्या-क्या हुआ, दिन भर; दोनों दादी–पोती में बहस होती रही फोटो लगाने के लिये। ओफ़्फ़ मेरा माथा ठनका। श्रीमती फिर बोली, “माँजी ने तो ग़ज़ब ही कर दिया बन्टी से बाज़ार से बिरंजी बुलवा ली और मुझसे कहने लगी की बहू तू ही ठोक दे बिरंजी दीवार में और टाँग दे रामजी की फोटो।”
“फिर?” मैं आश्चर्यचकित था।
फिर क्या इधर से बिन्नी बोली उधर से माँजी बोलती रही। मैंने तो कह दिया, “माँजी आप जानो और आपका बेटा जाने में तो कुछ नहीं करूँगी। तब से माँजी आपका रास्ता देख रही हैं।”
“माँ ने खाना खा लिया क्या?”
“हाँ माँजी ने तो खा लिया है मगर ये बिन्नी ने नहीं खाया है इसे मना कर खाना खिलाओ।”
मैंने बिन्नी को गुदगुदी की और अपनी गोद में छुपा लिया मगर वो नाराज़ होती हुई बोली, “पापा मैं ग़लत कह रही हूँ क्या? इतना बड़ा रामजी का फोटो ड्राइंगरूम में अच्छा लगेगा क्या? दादी समझती क्यों नहीं। दिन भर मुझसे लड़ती रही बहस करती रही।”
मैंने उसे समझाया, “बेटा बड़े-बूढ़ों का स्वभाव ऐसा ही होता है जो बात उन्हें ठीक लगती है वो उसी पर टिके रहते हैं।”
“लेकिन आप बताओ ग़लत है ना फोटो वाली बात?”
“हाँ-हाँ ठीक है; हम देख लेते हैं क्या करना है,” मैंने बिन्नी को भी टालते हुए कहा।
तभी श्रीमती बोली, “देखना आप भी माँजी की बात में मत आ जाना। रामजी का फोटो पूजाघर में ही लगाओ उनको बोलो कि रोज़ सुबह पूजाघर में रामजी के दर्शन कर लिया करें।”
हमारी बातें सुन रहा छोटा बन्टी बीच में बोल पड़ा, “पापा जब दादी इतनी ज़िद कर रही हैं तो भगवान का फोटो ड्राइंगरूम में ही लगा दो ना।”
“तू चुप रह बन्टी,” बिन्नी ने बन्टी को डाँटा तो बन्टी ने भी जवाब दिया, “तू चुप रह सुबह से दादी से लड़ाई कर रही है।”
“चलो सब चुप हो जाओ,” मैंने बात ख़त्म करते हुए पत्नी से खाना लगाने का कहा।
खाना खाकर आगे ड्राइंगरूम में माँ के पास बैठा और उसके हाथ पर हाथ रखा।
“खाना खा लिया बेटा?”
“हाँ माँ खा लिया है,” मैंने जवाब दिया।
“तो अब वो फोटो लगा दे ना बेटा।”
“हाँ माँ देखता हूँ,” मैंने कुछ ठण्डे-ठण्डे गोलमाल जवाब दिया।
“देखता हूँ, देखता हूँ? कँई देखता हूँ?” माँ बिस्तर पर बैठी हो गई, “तू भी इनकी बात में उलझी गयो शायद थारो मन भी नी हे फोटो लगाने को।” माँ अब खुलकर सामने आ गई थी।
“माँ आजकल ड्राइंगरूम में ऐसे बड़े फोटो कोई नहीं लगाता,” मैंने विरोध शुरू किया
“कोई से कई मतलब अपने अच्छो लगे तो लगानो हे बस। भगवान को फोटो अपना घर में लगाने में कंई शरम की बात। रोज़ सुबह उठी ने भगवान का दर्शन अच्छो रे बेटा,” माँ ने फिर भावुकता का हथियार उपयोग किया।
“ठीक है माँ तुझे सुबह-सुबह आँख खुलते ही रामजी के दर्शन करना है ना?”
“बस बेटा एक ही इच्छा है।”
“ठीक है हो जायेंगे सुबह भगवान के दर्शन।”
“तो रात में लगायगो कंई, चुपचाप? जब सब सो जायेगा तब,” माँ ने बड़े राज़दार अन्दाज़ में पूछा।
’हाँ माँ, तुमको सुबह भगवान के फोटो के दर्शन हो जायेंगे बस,” माँ को आश्वासन देकर मैं बेडरूम में आ गया। बच्चे अपने कमरे में पढ़ाई कर रहे थे। श्रीमती अभी जाग रही थी। मुझे देख मुस्कुराती हुई बोली, “क्या वादा करके आये हो अपनी माँ से श्रवण कुमार जी?”
“कुछ नहीं,” मैंने ठण्डे स्वर में कहा और लेट गया। पत्नी समझ गई कुछ ठीक नहीं है अभी। मेरी नज़र दीवार पर लगी घड़ी पर गई रात के दस बज रहे थे। मेरा दिमाग़ इस समस्या का समाधान सोच रहा था। कुछ राह नज़र भी आ रही थी लेकिन पत्नी और बच्चों का सोना भी ज़रूरी था। साढ़े ग्यारह होते-होते सभी सो चुके थे मुझे भी नींद आने लगी थी लेकिन जागना ज़रूरी था। बारह बजे मैं उठा डायनिंग हाल में लगे पूजाघर के सामने कुर्सी पर बैठा सामने ही रामजी का फोटो रखा हुआ था मैं रामजी की तरफ़ प्रश्नवाचक नज़रों से देखने लगा।
प्रभुजी क्या करूँ आप ही कोई रास्ता सुझाओ। माँ को ख़ुश करूँ या बिन्नी की मानूँ?
रामजी भी मुस्कराये मुझे लगा कह रहे हों, “वाह बेटा मेरी दुनिया में रहके मज़े मार रहा है और तेरे ड्राइंगरूम में मेरे फोटो के लिये भी जगह नहीं।”
अब मैं कैसे बताता रामजी को कि भगवानों के फोटो से दीवारें भरने का फ़ैशन अब नहीं रहा। ड्राइंगरूम में भगवान का इतना बड़ा फोटो बेहूदा लगेगा। मेरा मन भी यही मानता था बिन्नी सही थी लेकिन माँजी की आस्था भी तो सही थी।
ऐसे में माँ को भी तो दो टूक नहीं कहा जा सकता कि फोटो नहीं लगा सकते। फिर भी कुछ तो करना होगा।
मैं उठा कुछ उपाय सोच चुका था। आगे ड्राइंग रूम में देखा माँ जिस शैट्टी पर सोई थी उसके सामने दीवार से लगी जगह ख़ाली थी। मैंने डायनिंग टेबल की एक कुर्सी खिसका कर दीवार से सटाकर लगाई उस पर रामजी का फोटो दीवार के सहारे इस प्रकार रखा कि सुबह उठते ही माँ की नज़र उस फोटो पर ही जाये। फोटो गिरे नहीं इसका भी इंतज़ाम किया। फिर आश्वस्त होकर अपने बेडरूम में आकर लेट गया।
मुझे मालूम था माँ सुबह पाँच बजे उठ जाती है, जबकि श्रीमती और बच्चे सुबह साढ़े छह तक उठते हैं। अब मुझे सुबह माँ के उठ कर बाथरूम जाने के बाद और श्रीमती के उठने के पहले फोटो वापस पूजाघर में रखना था। चिन्ता के मारे नींद भी बड़ी मुश्किल से आई लेकिन सुबह पाँच बजे ही खुल भी गई।
माँ के राम-राम भजने की आवाज़ आ रही थी। मैं उठ कर ड्राइंगरूम में गया माँ बहुत ख़ुश थी उसने सुबह उठ कर बैठते ही रामजी के हाथ जोड़ कर दर्शन किये थे।
“वाह बेटा बहुत अच्छा किया तूने सुबह-सुबह रामजी के दर्शन हो गये बस ऐसे ही रोज़ दर्शन होते रहें तो बेड़ा पार है।”
“माँजी अब मैं रामजी को वापस पूजाघर में रख रहा हूँ।”
“क्यों?” माँ चौंकी।
“ऐसा हे माँ यहाँ भगवान का फोटो दिन भर रखा तो आते-जाते सब टकरायेंगे लात लगायेंगे भगवान को।”
“ठीक है बेटा,” कहते हुए माँ तो बाथरूम जा चुकी थी मैं राम जी का फोटो पूजाघर में रख कर वापस बिस्तर पर आकर बाक़ी नींद पूरी करने की कोशिश करने लगा।
सुबह आठ बजे वापस नींद खुली। घर में बड़ी शान्ति थी। पत्नी ने बताया सुबह-सुबह बहुत ख़ुश थी माँजी और बिन्नी को चिढ़ा भी रही थी कि उसने तो सुबह पाँच बजे रामजी के फोटो के दर्शन किये थे यहीं बिस्तर पर बैठे-बैठे। बिन्नी मानने को तैयार नहीं थी लेकिन माँजी बहुत ख़ुश थी। “तो ये कौन सा फ़ार्मूला चलाया मेरे जादूगर पतिदेव कि माँ भी ख़ुश है और बेटी भी?” पत्नी ताना मार रही थी।
ख़ैर मैं भी ख़ुश हुआ ये जानकर कि फ़िलहाल माँजी और बिन्नी दोनों ख़ुश हैं। मैंने दूसरे दिन भी यही फ़ार्मूला अपनाया। देर रात को रामजी का फोटो आगे ड्राइंगरूम में दीवार के सहारे कुर्सी पर रखा और सुबह-सुबह चिन्ताकर पाँच बजे उठ कर वापस पूजाघर में। फिर तीसरी रात भी साढ़े बारह पर रामजी वापस ड्राइंग रूम में।
इन तीन दिनों में मेरी नींद बहुत गड़बड़ा चुकी थी। वैसे भी मैं बहुत आरामी जीव रहा हूँ रोज़ाना आराम से उठने वाला! लेकिन पिछली तीन रातों से मेरी नींद पूरी नहीं हो पा रही थी। तबियत बिगड़ने लगी थी। रात को रामजी का फोटो ड्राइंगरूम में ले जाते हुए मेरी नज़र रामजी पर पड़ी।
मुझे लगा वो भी परेशान हो रहे हैं उनकी भी रोज़ाना परेड हो रही है। कभी पूजाघर तो कभी ड्राइंगरूम। मैंने असहाय नज़रों से उन्हें देखा, क्या करूँ मैं भगवान? आप ही कुछ करो शायद मेरी याचना उन तक पहुँचे।
चौथी रात मैं रामजी का फोटो ड्राइंग रूम में जमा कर बिस्तर पर लैटा था। लेटते ही नींद आ गई। सुबह लगा कोई मुझे उठा रहा है आँखेंं खोली तो देखा बिन्नी मुझ पर झुकी हुई मुझे झिंझोड़ रही थी।
“पापा उठो पापा उठो।”
“क्या हुआ बिन्नी?” मैं आधी-अधूरी नींद में ही था।
“उठो मैं आपसे बहुत नाराज़ हूँ पापा।”
“क्यों बेटा?” मेरी नींद उड़ चुकी थी, “क्या हुआ बिन्नी?”
“पापा वो रामजी का फोटो?”
“अरे बाप रे!” मैं उठ कर भागा घड़ी की तरफ़ नज़र डाली सात बज रहे थे। ओफ़्फ़ आज मैं चूक गया। ड्राइंगरूम में पहुँचा। रामजी वहीं मेरा इन्तज़ार कर रहे थे। मैंने तत्काल फोटो उठाया और पूजाघर में रखने चला तभी बिन्नी ने मुझे रोक दिया मेरा हाथ पकड़ लिया।
“क्या हुआ बिन्नी?” मैंने बिन्नी की ओर देखा, बिन्नी की आँखोंं में आँसू तैर रहे थे।
“आप मेरे पापा हो ना? मैं तो नादान बच्ची हूँ कोई बेवुकूफ़ी की बात करूँ तो आप मुझे डाँट भी सकते हैं; रोक भी सकते हैं।”
“हाँ तो क्या हुआ?”
“मम्मी ने मुझे सब बता दिया है। आप तीन दिन से देर रात तक जाग कर रामजी का फोटो दादी के लिये ड्राइंगरूम में कुर्सी पर जमाते हो और सुबह हमारे उठने से पहले उठकर वापस पूजाघर में रखते हो।”
“हाँ, तो क्या हुआ बिन्नी? ये कौन सी बड़ी बात है?”
“पर क्यों? आप मेरी ज़रा सी ज़िद के लिये तीन दिन से सो नहीं पा रहे हैं। मैं जानती हूँ आपको सुबह देर तक सोने की आदत है। क्या आप मुझे डाँट कर रोक नहीं सकते थे? क्या मेरी ज़िद मेरे पापा की नींद से भी बढ़कर है? आपने ऐसा क्यूँ किया पापा?” बिन्नी की आँखोंं से आँसू बह रहे थे, आवाज़ भर्रा रही थी। वो फिर बोली, “सॉरी पापा, सॉरी दादी मुझे माफ़ करो। पापा आप रामजी की फोटो आज ही आगे ड्राइंगरूम में दीवार पर लगा दो।”
“अरे बिन्नी ऐसी कोई बात नहीं है वो तो मैं ख़ुद भी यही सोचता था।”
“नहीं पापा आप अभी लगाओ यह फोटो,” बिन्नी रामजी के फोटो की ओर बढ़ी।
“ठीक है चलो तुम कहती हो तो . . .”
मेरी बात पूरी भी नहीं हो पाई थी कि मैंने अपनी पीठ पर माँ के हाथ का स्पर्श महसूस किया। सारी बातचीत के दौरान माँ वहीं हमारे पीछे ही खड़ी थी।
“अरे रुक बेटा, पता है आज रामजी आये थे मेरे सपने में।”
“क्या?” मैं ग़ौर से देखने लगा। माँ की आँखेंं कुछ भीग रही थीं, आवाज़ कुछ भारी हो रही थी।
“रामजी कह रहे थे मुझे तुम्हारे ड्राइंगरूम में अच्छा नहीं लगता है मैं पूजाघर में ही ठीक से रह सकूँगा। तो अब तू उनका फोटो आज से पूजाघर में ही रखा रहने दे . . . माँ मुश्किल से अपनी बात पूरी कर पाई।
मैं समझ रहा था माँ ऐसा क्यों बोल रही है। मैंने उसका विरोध करते हुए कहा, “अरे नहीं माँ मैं अभी ड्राइंगरूम में यह फोटो लगाता हूँ।”
“नहीं बिलकुल नहीं। मैंने कहा ना रामजी की इच्छा पूजाघर में ही रहने की है। मेरा क्या? मैं सुबह उठ कर दो कदम चल कर पूजाघर में ही उनके दर्शन कर लूँगी। तू पूजाघर में ही सजा दे रामजी की फोटु।”
“माँ तू ख़ुश तो है ना?” मैंने माँ की और देखा, फिर बिन्नी की ओर देखा और फिर बिन्नी और माँजी के बीच खड़ा रामजी के फोटो की ओर देखने लगा। रामजी मुस्कुरा रहे थे शायद कह रहे थे, “अब तो ठीक है ना?”
मैंने बिन्नी को और माँ को अपने गले से लगा लिया।