प्रेम कुमार की कविताओं में अभिव्यक्त मानव मूल्य
पूनम कुमारी
शोधार्थी, पीएच. डी. अनुवाद अध्ययन
अनुवाद अध्ययन विभाग, अनुवाद विद्यापीठ
महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा
ईमेल: poonamkumar।shona@gmail.com
सारांश:
प्रेम कुमार की कविताएँ समकालीन हिंदी कविता में मानवीय सरोकारों की सशक्त अभिव्यक्ति हैं। उनकी काव्य दृष्टि आधुनिक सभ्यता के नैतिक संकट, सामाजिक विडंबनाओं और मानवीय मूल्यों के क्षरण को केंद्र में रखती हैं। उनके द्वारा रचित कविताओं में मानव मूल्यों का विस्तृत, बहुआयामी और गहन चिंतन देखने को मिलता है। सभ्यता और संवेदना का द्वंद्व, स्त्री का आत्मबल, कन्या भ्रूण हत्या, बाल श्रम, किसान जीवन संघर्ष, बढ़ते अपराध, मीडिया की भूमिका, नैतिक साहस, दिव्यांगों का संघर्ष, सामाजिक असहायता, यौन हिंसा तथा पहचान के संकट जैसे विषयों के माध्यम से प्रेम कुमार की कविताएँ केवल यथार्थ का चित्रण नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों की पुनर्स्थापना का गंभीर प्रयास है।
बीज शब्द:
मानव मूल्य, सामाजिक चेतना, संवेदना, स्त्री विमर्श, बाल अधिकार, समकालीन कविता
आलेख विस्तार:
समकालीन हिंदी कविता का प्रमुख उद्देश्य केवल सौंदर्य सृजन करना नहीं है, बल्कि सामाजिक यथार्थ से टकराना और पाठक को आत्मचिंतन के लिए विवश करना है। प्रेम कुमार इसी चेतनाशील काव्य परंपरा के कवि हैं। उनकी कविताएँ समाज के उन पक्षों को सामने लाती हैं, जिन्हें अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है। वे आधुनिक मनुष्य से यह प्रश्न पूछते हैं कि भौतिक प्रगति के इस दौर में क्या मानवीय संवेदनाएँ सुरक्षित रह पाई हैं? इन कविताओं में कवि का स्वर कहीं आक्रोशपूर्ण है, कहीं करुण है, कहीं आत्मस्वीकृति से भरा हुआ है, तो कहीं भविष्य के प्रति आशान्वित। इन सभी भावों के केंद्र में मानव मूल्य हैं-करुणा, न्याय, सम्मान, समानता, उत्तरदायित्व और नैतिक साहस। प्रेम कुमार की कविताओं में ‘सभ्य नगर’ आधुनिक विकास और शहरी चमक-दमक का प्रतीक होते हुए भी एक गहरे विरोधाभास के रूप में उपस्थित होता है। बाहरी तौर पर सुव्यवस्थित, सुरक्षित और प्रगतिशील दिखने वाला नगर भीतर से संवेदनहीन, क्रूर और आत्मविहीन बनता जा रहा है। कवि इसी मृत होती संवेदना पर कुठाराघात करता है और नगर की तथाकथित सभ्यता को कठघरे में खड़ा करता है। इन कविताओं में नगर की सड़कों, ऊँची इमारतों, चमकते मॉल और व्यस्त चौराहों के बीच मनुष्य की पीड़ा अदृश्य हो जाती है। दुर्घटना में तड़पता व्यक्ति, भूखा बच्चा, शोषित स्त्री या हाशिये पर खड़ा श्रमिक। इन सबके प्रति नगर का व्यवहार तटस्थ और निर्मम है। प्रेम कुमार इस उदासीनता को ‘सभ्यता’ का सबसे बड़ा अपराध मानते हैं। उनके लिए संवेदना का मर जाना ही नगर का वास्तविक पतन है।
कवि की भाषा यहाँ तीखी, व्यंग्यात्मक और प्रतीकात्मक है। नगर एक ऐसे जीव के रूप में सामने आता है जिसकी आँखें खुली हैं, पर वह देखता नहीं; जिसके कान हैं, पर वह सुनता नहीं। यह मृत संवेदना कवि को भीतर तक व्यथित करती है। वह प्रश्न करता है कि क्या सभ्यता का अर्थ केवल सुविधाएँ और तकनीक है, या फिर मनुष्य के दुख में सहभागी होना भी सभ्यता का अनिवार्य तत्त्व है? प्रेम कुमार की कविता इस मृत संवेदना को स्वीकार नहीं करती। वह पाठक को झकझोरकर संवेदनशील मनुष्य बनने की चुनौती देती है। इस प्रकार ‘सभ्य नगर’ का मिथक टूटता है और उसके स्थान पर मानवीय करुणा, सहानुभूति और ज़िम्मेदारी की आवश्यकता रेखांकित होती है। प्रेम कुमार की कविता मृत संवेदना के विरुद्ध एक सशक्त कुठाराघात बनकर उभरती है। कवि आधुनिक शहरी जीवन की विडंबना को अत्यंत तीखे शब्दों में अभिव्यक्त करता है। मनुष्य सभ्य नगरों में रहता है, सभ्य भोजन करता है, सभ्य वस्त्र पहनता है, पर उसकी संवेदना मर चुकी है:
“निवास करता है
सभ्य नगरों में
खाता, पहनता, ओढ़ता, बिछाता है
सभ्य भोजन, वस्त्र, पलंग और चादर
तो क्यों?
मर गई है उनकी संवेदना
नगरों में
कौन कर रहा है
हत्या
बलात्कार
लूटपाट”1
यहाँ ‘सभ्य’ शब्द का बार-बार प्रयोग व्यंग्य रचता है। कवि प्रश्न करता है। यदि मनुष्य इतना सभ्य है, तो समाज में हिंसा, बलात्कार और लूटपाट क्यों? यह कविता भौतिक सभ्यता और नैतिक सभ्यता के अंतर को स्पष्ट करती है। मानव मूल्य के रूप में संवेदना यहाँ केन्द्रीय तत्त्व है, जिसके अभाव में समाज अमानवीय हो जाता है। हिंदी कविता में हिंसा का प्रश्न केवल शारीरिक आक्रमण तक सीमित नहीं है, बल्कि वह सत्ता, व्यवस्था, विचारधारा और सभ्यता के भीतर निहित अमानवीय प्रवृत्तियों का व्यापक विमर्श प्रस्तुत करता है। आधुनिक हिंदी कविता ने यह स्पष्ट किया है कि सभ्यता की प्रगति के साथ-साथ हिंसा के रूप भी अधिक सूक्ष्म, संगठित और संस्थागत होते गए हैं। समकालीन हिंदी कविता में सांप्रदायिकता, पितृसत्ता, जाति, युद्ध और पर्यावरणीय विनाश के संदर्भों में हिंसा का प्रश्न और गहरा हुआ है। यहाँ कविता प्रतिरोध का नैतिक उपकरण बनती है। हिंसा के विरुद्ध मानवीय गरिमा, करुणा और न्याय की पुनर्स्थापना का प्रयास करती है। उनकी कविता मानव सभ्यता की आलोचना करते हुए यह प्रश्न उठाती है कि क्या प्रगति बिना करुणा के सम्भव है, और क्या सभ्यता हिंसा को त्यागे बिना सचमुच मानवीय हो सकती है। कवि समाज में व्याप्त हिंसक प्रवृत्तियों को सभ्यता के पतन का प्रमाण मानता है:
“कौन कर रहा है
हत्या बलात्कार लूटपाट
आज
कहाँ पहुँच गई है
मानव सभ्यता”2
कवि द्वारा किया गया यह प्रश्न किसी एक व्यक्ति से नहीं, बल्कि पूरे सामाजिक तंत्र से है। कवि यह संकेत करता है कि जब अपराध सामान्य हो जाएँ, तब समझना चाहिए कि मानव सभ्यता गंभीर संकट में है। यहाँ नैतिक उत्तरदायित्व और सामूहिक चेतना जैसे मानव मूल्य सामने आते हैं। प्रेम कुमार की कविताओं में स्त्री कोई निरीह या करुणा की पात्र नहीं, बल्कि आत्मविश्वास, विवेक और संघर्षशील चेतना से लैस एक सशक्त व्यक्तित्व के रूप में उभरती है। उनकी कविता स्त्री को सामाजिक रूढ़ियों के भीतर क़ैद आकृति के रूप में नहीं, बल्कि परिवर्तन की धुरी के रूप में देखती है, जो प्रश्न करती है, प्रतिरोध करती है और अपने निर्णय स्वयं लेती है। कवि स्त्री के आत्मबल को उसके दैनिक संघर्षों में रचता है। घर, कार्यस्थल और समाज तीनों स्तरों पर स्त्री जिन असमानताओं से जूझती है, उन्हें प्रेम कुमार भावुकता से नहीं, यथार्थ की दृढ़ दृष्टि से प्रस्तुत करते हैं। उनकी स्त्री सहनशील अवश्य है, पर मौन नहीं; संवेदनशील है, पर कमज़ोर नहीं। वह अन्याय को पहचानती है और आवश्यक होने पर उसे चुनौती देती है। यह आत्मबल उसकी चेतना में निहित है, जो उसे टूटने नहीं देता, बल्कि हर ठोकर के बाद और मज़बूत करता है।
प्रेम कुमार की कविताओं में स्त्री की आवाज़ आत्मसम्मान से भरी होती है। वह अपने अस्तित्व को पुरुष पर आश्रित नहीं मानती, बल्कि सह-अस्तित्व और समानता की माँग करती है। कवि स्त्री की देह को नहीं, उसकी चेतना को केंद्र में रखता है, इसलिए उनकी कविताओं की स्त्री कामना की वस्तु नहीं, विचार की सहचर है। जो प्रेम, श्रम और संघर्ष तीनों में बराबरी की साझेदार बनती है। महत्त्वपूर्ण यह भी है कि प्रेम कुमार स्त्री-सशक्तिकरण को नारे के रूप में नहीं, अनुभव के रूप में रचते हैं। डॉ. पुनीत शुक्ल के शब्दों में, “प्रेम कुमार की कविताओं की सशक्त स्त्री कोई असाधारण मिथक नहीं, बल्कि साधारण जीवन से निकली असाधारण इच्छाशक्ति है। वह परंपरा से संवाद करती है, पर आवश्यकता पड़ने पर उससे टकराती भी है। यही टकराव उसे आधुनिक बनाता है और उसकी पहचान को विस्तार देता है।”3 इस प्रकार प्रेम कुमार की कविता में स्त्री का आत्मबल एक सजीव, संघर्षशील और गरिमामय उपस्थिति है। वह कमज़ोर नहीं, सशक्त है, क्योंकि उसकी शक्ति बाहरी नहीं, भीतर से उपजी है; और यही शक्ति उसे अपने समय और समाज में परिवर्तनकारी बनाती है। स्त्री को लेकर समाज में व्याप्त ‘कमज़ोरी’ की धारणा को कवि पूरी तरह नकारता है:
“स्त्री का आत्मबल
चिकनी मिट्टी जैसा होता है
जिसे वो अपने
विश्वास से लेसकर
बनाती है एक
प्यार का घर
जो पानी की
कुछ बूँदों के गिरने से
रेत की तरह बिखरता नहीं
बल्कि महकता है”4
मिट्टी का बिंब स्त्री की सृजनात्मक शक्ति, लचीलापन और स्थायित्व को दर्शाता है। स्त्री अपने विश्वास से प्रेम का घर बनाती है, जो आसानी से टूटता नहीं। यह कविता स्त्री के आत्मसम्मान, धैर्य और सकारात्मक दृष्टि को रेखांकित करती है। यहाँ समानता, सम्मान और विश्वास जैसे मानव मूल्य सशक्त रूप में उभरते हैं। प्रेम कुमार की कविताएँ समकालीन समाज की उन कड़वी सच्चाइयों को उजागर करती हैं, जिन्हें अक्सर सुविधा, परंपरा और स्वार्थ के नाम पर अनदेखा कर दिया जाता है। कन्या भ्रूण हत्या उनके काव्य में केवल एक सामाजिक अपराध नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना, नैतिकता और करुणा के पतन का प्रतीक बनकर उभरती है। कवि इस अमानवीय कृत्य को सभ्यता के मुखौटे के पीछे छिपी क्रूरता के रूप में देखता है और पाठक को आत्ममंथन के लिए विवश करता है। इन कविताओं में कन्या को जीवन से वंचित करने की प्रवृत्ति के सामाजिक और आर्थिक कारणों जैसे पितृसत्ता, दहेज़ प्रथा, वंशवादी सोच और स्त्री को बोझ मानने की मानसिकता पर तीखा प्रहार मिलता है। प्रेम कुमार की भाषा सरल होते हुए भी व्यंग्यात्मक और मार्मिक है, जो गर्भ में पल रही अनकही चीखों को शब्द देती है। कवि का स्वर आरोपात्मक कम और चेतावनीपूर्ण अधिक है; वह समाज को दर्पण दिखाते हुए पूछता है कि प्रगति का दावा करने वाला मानव इतना असंवेदनशील कैसे हो गया?
इन कविताओं में स्त्री को सृजन, जीवन और संतुलन की धुरी के रूप में प्रस्तुत किया गया है। कन्या भ्रूण हत्या को कवि सभ्यता की आत्महत्या कहता है। जहाँ भविष्य को जन्म लेने से पहले ही नकार दिया जाता है। इस संदर्भ में प्रेम कुमार का काव्य केवल शोकगीत नहीं, बल्कि प्रतिरोध का घोष है, जो क़ानून, शिक्षा और नैतिक पुनर्जागरण की आवश्यकता पर बल देता है। कचरे के ढेर में पड़ा नवजात बालिका का भ्रूण कवि को भीतर तक झकझोर देता है:
“किसी भी नवजात बालिका का भ्रूण
पड़ा मिलता है जब कचरे के ढेर में
स्तब्ध रह जाता हूँ मैं
कुछ देर के लिए
फिर खौलने लगता है
मेरे शरीर के भीतर रक्त”5
यह दृश्य सभ्यता पर कलंक है। ऐसे में कवि अत्यंत आवेश में माँ, पिता और डॉक्टर तीनों को कटघरे में खड़ा कर उनसे प्रश्न करता है:
“कौन सी माँ है इतनी मजबूर
जो काटकर फेंक देती है अपना अंग
कौन सा बाप है राक्षस
जिसे नफ़रत हो जाती है इतनी
फाड़कर पत्नी का पेट निकाल फेंकता है अपना अक्ष
कौन सा डॉक्टर है इतना निर्दयी
जो भोंक देता है ब्लेड मासूम के पेट में”6
यह कविता पितृसत्तात्मक मानसिकता, लालच और नैतिक अधःपतन को उजागर करती है। यहाँ जीवन का सम्मान सर्वोपरि मानव मूल्य के रूप में सामने आता है। प्रेम कुमार की कविताएँ भारतीय समाज की उन विडंबनाओं को उजागर करती हैं, जहाँ बचपन किताबों और खेल के मैदानों की बजाय ईंट-भट्टों, कारख़ानों और चाय की दुकानों में क़ैद है। बाल श्रम उनके काव्य में केवल एक सामाजिक समस्या नहीं, बल्कि राज्य, समाज और व्यवस्था की सामूहिक विफलता का सशक्त प्रतीक बनकर सामने आता है। कवि बालक के श्रमरत हाथों और थकी आँखों के माध्यम से विकास के खोखले दावों पर करारा प्रहार करता है। इन कविताओं में बाल श्रमिकों की दयनीय स्थिति के साथ-साथ उसके मूल कारणों ग़रीबी, अशिक्षा, बेरोज़गारी, जनसंख्या दबाव और कमज़ोर सामाजिक सुरक्षा को भी रेखांकित किया गया है।
भूख प्रेम कुमार के काव्य में मौन चीख़ की तरह उपस्थित है। अन्न उगाने वाला किसान स्वयं भूखा है। यह विडंबना कवि के यहाँ तीखे व्यंग्य के साथ उभरती है। भूख केवल पेट की नहीं, सम्मान, सुरक्षा और भविष्य की भूख भी है। किसान का परिवार, विशेषकर बच्चे, इस अभाव की सबसे बड़ी क़ीमत चुकाते दिखाई देते हैं, जिससे कविता में करुणा का स्वर और प्रखर हो जाता है। क़र्ज़ प्रेम कुमार की कविताओं में किसान के गले का फँदा है। साहूकारों, बैंकों और बाज़ार की जटिलताओं में उलझा किसान धीरे-धीरे अपनी ज़मीन, आत्मसम्मान और अंततः जीवन तक हार जाता है। कवि आत्महत्याओं के संदर्भ में मौन नहीं रहता; वह इसे व्यक्तिगत कमज़ोरी नहीं, बल्कि एक अमानवीय आर्थिक ढाँचे का परिणाम बताता है। इस प्रकार प्रेम कुमार का काव्य किसान की त्रासदी को स्वर देते हुए समाज और सत्ता से संवेदनशील, न्यायपूर्ण और मानवीय व्यवस्था की माँग करता है। कवि किसान की त्रासदी को अत्यंत संक्षिप्त लेकिन मार्मिक शब्दों में प्रस्तुत करता है:
“क्या?
हार गया है सूखे की मार से
हार गया है पेट की भूख से
हार गया है क़र्ज़ के बोझ से”7
यह हार व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक एवं आर्थिक व्यवस्था की हार है। यहाँ आर्थिक न्याय और मानवीय गरिमा का प्रश्न उठता है। कवि प्रेम कुमार की जन्मभूमि दिल्ली है। यही कारण है कि उनकी कविताओं में दिल्ली केवल एक भौगोलिक या राजनीतिक इकाई नहीं, बल्कि एक जीवंत अनुभव और गहरी आत्मीय पीड़ा का प्रतीक बन जाती है। अपनी ही जन्मभूमि को ‘जुर्म की राजधानी’ कहना कवि के लिए साधारण कथन नहीं, बल्कि अत्यंत पीड़ादायक और चिंताजनक आत्मस्वीकार है। यह कथन दिल्ली के उस भयावह यथार्थ की ओर संकेत करता है, जहाँ सभ्यता, क़ानून और मानवीय मूल्यों के दावे अपराध की छाया में बौने पड़ते दिखाई देते हैं। प्रेम कुमार की कविताओं में दिल्ली आधुनिक महानगर की चकाचौंध के पीछे छिपे अँधेरे को उजागर करती है। यहाँ सड़कें केवल आवागमन का मार्ग नहीं, बल्कि भय, असुरक्षा और हिंसा की गवाह हैं। स्त्री, बच्चे, बुज़ुर्ग कोई भी अपराध के साए से अछूता नहीं। कवि बलात्कार, हत्या, लूट, अपहरण और संगठित अपराधों को मात्र समाचार की सुर्ख़ियाँ नहीं मानता, बल्कि उन्हें समाज की सामूहिक विफलता के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत करता है।
दिल्ली को ‘जुर्म की राजधानी’ कहना सत्ता, पुलिस। प्रशासन और न्याय प्रणाली पर सीधा प्रश्नचिह्न है। प्रेम कुमार की कविताओं में क़ानून की मौजूदगी होते हुए भी न्याय का अभाव दिखाई देता है। अपराधियों का बेख़ौफ़ घूमना और पीड़ितों की चुप्पी यह विरोधाभास कवि के भीतर गहरे असंतोष को जन्म देता है। कवि यह प्रश्न उठाता है कि जिस राजधानी से पूरे देश के लिए नीति और नैतिकता का मार्गदर्शन होना चाहिए, वही यदि असुरक्षा का प्रतीक बन जाए तो लोकतंत्र की आत्मा कैसे सुरक्षित रह सकती है? इसके साथ ही, प्रेम कुमार का काव्य निराशा में डूबा हुआ नहीं है। भयावह यथार्थ को सामने रखकर वह नागरिक चेतना, सामाजिक ज़िम्मेदारी और मानवीय संवेदनशीलता के पुनर्जागरण का आह्वान करता है। अपनी जन्मभूमि के प्रति प्रेम और चिंता ही उसे इतनी कठोर भाषा अपनाने के लिए विवश करती है। इस प्रकार दिल्ली प्रेम कुमार की कविताओं में केवल अपराध का नगर नहीं, बल्कि आत्मालोचना और परिवर्तन की पुकार बनकर उपस्थित होती है। अतः दिल्ली का जुर्म की राजधानी बन जाना कवि के लिए गहरी चिंता का विषय है:
“आजकल
तेजी से बढ़ रहे हैं
दिल्ली में जुर्म
वह
देश की राजधानी के साथ-साथ
जुर्म की राजधानी भी बन गई है”8
यह कथन लोकतंत्र की सुरक्षा व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगाता है। यहाँ सुरक्षा और न्याय जैसे मानव मूल्य संकट में दिखाई देते हैं। प्रेम कुमार की कविताएँ वर्तमान समय के उस कटु यथार्थ से टकराती हैं, जहाँ लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहलाने वाला मीडिया अपने मूल दायित्वों से भटकता दिखाई देता है। कवि की दृष्टि में दोगले और बिकाऊ मीडियाकर्मी व पत्रकार समाज के सजग प्रहरी नहीं, बल्कि सत्ता, पूँजी और स्वार्थ के साझीदार बनते जा रहे हैं। उनकी कविताएँ इन्हें सीधे कठघरे में खड़ा करती हैं और उनकी विश्वसनीयता पर तीखा प्रश्नचिह्न लगाती हैं।
निष्कर्ष:
प्रेम कुमार की कविताएँ मानव मूल्यों की पुनर्स्थापना का गंभीर साहित्यिक प्रयास हैं। वे समाज की क्रूर सच्चाइयों को उजागर करते हुए करुणा, न्याय, समानता, सम्मान और उत्तरदायित्व की आवश्यकता पर बल देती हैं। उनकी कविताएँ पाठक को केवल संवेदनशील नहीं बनातीं, बल्कि उसे आत्ममंथन और सामाजिक दायित्व के लिए भी प्रेरित करती हैं। उनकी कविताओं की भाषा सहज, चित्रात्मक और करुण है, जो पाठक को भावुक ही नहीं, बल्कि चिंतनशील भी बनाती है। कवि प्रेम कुमार की कविताएँ मानवीय मूल्यों करुणा, समानता और सम्मान की पुनर्स्थापना का आह्वान हैं। वे पाठक को संवेदनशील नागरिक बनने के लिए प्रेरित करती हैं और यह विश्वास जगाती हैं कि आज की हिंदी कविता सामाजिक परिवर्तन का सशक्त माध्यम बन सकती हैं।
संदर्भ:
-
कुमार, डॉ. प्रेम. (2022). पसीज उठती हैं आँखें. नई दिल्ली: न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशंस. पृ. 33
-
कुमार, डॉ. प्रेम. (2022). पसीज उठती हैं आँखें. नई दिल्ली: न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशंस. पृ. 33
-
शुक्ल, डॉ. पुनीत (2024). हिंदी कविता के नवीन हस्ताक्षर. भोपाल: आखर प्रकाशन. पृ. 103
-
कुमार, डॉ. प्रेम. (2022). तैर रहे हैं आँखों में. नई दिल्ली: न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशंस. पृ. 39
-
कुमार, प्रेम. जनकृति अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका(जनवरी 2018). वर्धा. पृ. 17
-
कुमार, प्रेम. जनकृति अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका(जनवरी 2018). वर्धा. पृ. 18
-
कुमार, डॉ. प्रेम. (2022). पसीज उठती हैं आँखें. नई दिल्ली: न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशंस. पृ. 86
-
कुमार, डॉ. प्रेम. (2022). पसीज उठती हैं आँखें. नई दिल्ली: न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशंस. पृ. 17