मन . . . मनु . . .मनुष्य—

01-02-2026

मन . . . मनु . . .मनुष्य—

अनीता रेलन ‘प्रकृति’ (अंक: 293, फरवरी प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

(महाकवि जयशंकर प्रसाद की जयंती पर) 
 
आज हम उन शब्दों को नहीं, 
उस चेतना को प्रणाम करते हैं
जिसने मन को मनुष्य बनाया, 
जिसने संवेदना को दर्शन दिया, 
और कविता को संस्कृति बना दिया। 
यह मेरे मन की वह पुकार है
जो आज शब्द बनकर
आप सब तक पहुँची है। 
आज, 
महाकवि जयशंकर प्रसाद जी की जयंती के सान्निध्य में
मैं अपनी नहीं—
उनकी संवेदना को स्वर दे रही हूँ। 
जिस कवि ने कहा—
“नारी, तुम केवल श्रद्धा हो” 
उसने मुझे लिखना नहीं, 
महसूस करना सिखाया। 
आज हम उनके शब्दों को नहीं—
उनकी आत्मा को स्वर देते हैं। 
 
मन, मनु और मनुष्य—
यह केवल शीर्षक नहीं, 
यह जयशंकर प्रसाद की
भाव-यात्रा है। 
“अरुण यह मधुमय देश हमारा”—
कवि के लिए यह केवल भूगोल नहीं था, 
यह तो वह चेतना-भूमि थी
जहाँ संस्कृति ने आँखें खोलीं
और आत्मा ने भाषा पाई। 
“बीती विभावरी जाग री”—
यह केवल रात्रि का जाना नहीं था, 
यह अज्ञान की छाया का छँटना था, 
जब ऊषा ने
मनुष्य को
स्वयं से परिचित कराया। 
“नारी, तुम केवल श्रद्धा हो”—
यह पंक्ति नहीं, 
यह जीवन-दर्शन है। 
कवि जानता था—
जीवन केवल यथार्थ से नहीं चलता, 
उसे स्वप्न चाहिए, 
उसे सम्भावना चाहिए। 
और तभी—
“वे कुछ दिन कितने सुंदर थे” 
स्मृति मुस्कुराती है, 
आँसू मौन हो जाते हैं, 
क्योंकि अतीत
दुख नहीं देता—संस्कार देता है। 
“अरे! कहीं देखा है तुमने?” 
हाँ कवि, 
हमने देखा है—
मनुष्य को
अपने ही प्रश्नों में उलझा, 
अपने ही उत्तरों से डरता हुआ। 
कामायनी में
मनु खड़ा है
मन और श्रद्धा के बीच, 
और वहीं खड़ा है
हर युग का मनुष्य—
कभी कर्म से भागता, 
कभी करुणा से जुड़ता। 
कवि कहता है—
“सब जीवन बीता जाए”, 
पर यह बीतना व्यर्थ नहीं, 
यह बीतना
अनुभव बन जाता है। 
“जागो जीवन के प्रभात”—
यह केवल सुबह नहीं, 
यह चेतना का आह्वान है, आत्मा की वह घंटी है
जो हर युग में बजती है। 
प्रसाद के यहाँ
आँसू में पीड़ा है, 
पर विलाप नहीं—
क्योंकि उनका दुःख भी
संयम से रोता है। 
उनके यहाँ
ईश्वर मंदिर में नहीं, 
मनुष्य के कर्म में है। 
और सरस्वती
शब्दों के माध्यम से
सभ्यता को सँवारती है। 
जयशंकर प्रसाद—
आप केवल कवि नहीं, 
आप संस्कृति के साक्षी हैं। 
आपके शब्दों में
भारत ने स्वयं को पहचान है
 
मन . . . मनु . . .मनुष्य—
इसी यात्रा का नाम है
जयशंकर प्रसाद। 
आज शब्द नतमस्तक हैं, 
संवेदना सजीव है, 
जो
महाकवि जयशंकर प्रसाद के चरणों में
सादर समर्पित है

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