लीलाधर गोकुल जा पहुँचे
डॉ. अंकेश अनन्त पाण्डेय
जो विधान सृष्टि के लिए नियत,
है लिखित!
कष्ट में मनुज, जब हो प्रकाश से रहित!
वेदना की हो चरम, जो परम को भेद दे!
अष्टमी की वो तिथि काल में,
निहित रचित!
स्वार्थ अर्थ के लिए, हस्तगत जो शस्त्र थे!
रक्त सम्बन्ध, वो बेड़ियों में बद्ध थे!
किस आशा में बँधे हुए,
किस हेतु रहे जीवित!
निज शिशुओं की चीख़ के निमित्त,
प्रतिबद्ध थे!
यदि, स्वप्न दृष्टिगत दृश्य हुआ था,
शेषनाग की करवट का!
धर्म जहाँ लज्जित हो जाए,
फिर तो देह ही धरनी थी!
अर्घ दे रहे थे जिस हेतु अपने,
निज शिशु की!
चक्र सुदर्शन की गति को सुन गए थे,
निश्चित ही!
बोध अब अबोध बन आ रहे थे मिट्टी में!
उच्च के नक्षत्र ग्रह सब, नाच गए सृष्टि में!
जन्म हुआ फिर निशा मध्य में,
वृष्टि हुई गगन से!
माया के बंधन कट गए,
लीलाधर गोकुल जा पहुँचे!
“लीलाधर गोकुल जा पहुँचे”