कृष्ण जन्म - एक युग की आकांक्षा
डॉ. अंकेश अनन्त पाण्डेयआवाज़ व्योम की सुन कर
रुक न पाया, बोला
कंस दंभ में महाकाल के
शाश्वत व्रत को भूला
जब भी आह निकलती है
धरती पर निर्बल की,
धारण करते हैं नारायण भी
ये काया मिट्टी की
जो मुझको मारेगा
जन्म ना लेने दूँगा
अभी देवकी वासुदेव को
मृत्युदंड दे दूँगा
तत्काल भगवती विराज गयी,
वासुदेव के मुख में
बोले कंस तुझको हम
अपने हर शिशु को सौंपेंगे,
ये प्राण छोड़ कर, प्रण ले ले
इससे न कभी मुकरेंगे
जब कारागृह में जन्म मरण
हो गया सप्त शिशुओं का,
क्षुब्ध रहे पञ्च तत्त्व फिर
हर्षित हुये भुवन में
आ पहुँची प्रचंड योग की
पुण्य तिथि इस युग में
बंधन खुले, पहरे सो गए
अनुकूल हुए सब ग्रह भी
लीला भी आ कर छाई
लीलाधर से पहले,
अर्द्ध रात्रि को धर्म जगा
थी निशा घनेरी चरम पे,
पुण्य प्रकाशित हुया सत्य सा
नीरज मध्य कर्दम में
वासुदेव जब जगतपति को
पहुँचाने गोकुल निकले,
यमुना जल बढ़ आया, फिर
चरण कृष्ण के छूने
शेषनाग भी छत्र बनाकार
चलते पीछे पीछे
युगों युगों के संकल्पित
सत्कर्म योग बन आये
विमुखित विस्मृत जनमानस में
कृष्ण, विश्वगुरु बन आये
विफल हुए षडयन्त्र सभी
परमज्ञान के सन्मुख
माया ख़ुद निर्देशित होती
जिनकी मन की गति से
आज प्रेम ख़ुद प्रकट हुआ
मथुरा की नगरी में
कृष्ण जन्म सा प्रेम प्रकट हो
काट के माया बंधन
धर्म विजित हो
हर युग में
गीता बसे ह्रदय में!