वो बातें मन की थीं, और कमाल थीं
डॉ. अंकेश अनन्त पाण्डेय
वो बातें मन की थीं, और कमाल थीं
खेतों में क़िस्मत खोजते, अपने किसान की
फ़सल का जो दाम उसे, दस टका मिला
बोरा वही बिका, पर क़ीमत हज़ार की!
वो कह रहे थे सब्र कर, सारे हिसाब का
मैं कर रहा हूँ बात, तेरे ही काम की,
देख कर चारा ज़रा सा, आया समंदर में
पढ़ने लगीं मछलियाँ सिफ़त काँटे-जाल की!
उठ गया जब कारवां, सब पूछने लगे
ये देश क्यों रूखा सा है, बसंती बयार थी,
उस धूप का दिल तो, अभी ना जाने का था
क्यों रवि ढला, अभी तो दो-पहर ही थी!
जो कर न पाए, उसे चस्पा ही क्यों किया,
रह गई बातें कई, ऐसी मलाल की!
वो बातें मन की थीं और कमाल थीं!
वो बातें मन की थीं, और कमाल थीं!