अवार्ड का राज़
आकांक्षा यादव
पूरे ऑफ़िस में चर्चायें आरंभ हो गई थीं कि इस साल बेस्ट परफ़ॉर्मेन्स का अवार्ड किसे मिलेगा? बात सिर्फ़ अवार्ड की नहीं थी, उसके साथ प्रमोशन भी तो जुड़ा था। हर कोई जुगत लगाने में लगा था कि किसी प्रकार यह अवार्ड उसे मिल जाए।
उसे तो आए हुए अभी ज़्यादा दिन भी नहीं हुए थे, पर उसके कार्य करने के तरीक़े व ईमानदारी की चर्चा सर्वत्र थी। जब भी कोई र्मीटंग होती तो बॉस उसे शाम को रोक लेते और वह बड़े क़रीने से सभी एजेंडों के लिए नोट्स लिखकर फ़ाइनल कर देता। बॉस भी उसकी कार्य-शैली व तत्परता से प्रभावित थे। उसे लगता कि अवार्ड तो उसे ही मिलेगा।
पर जब अवार्ड की घोषणा हुई तो उसका नाम नादारद था। उसे मन ही मन बहुत बुरा लगा। शाम को बुझे मन से वह घर जाने के लिए उठा। जब वह बॉस के चैम्बर के सामने से गुज़रा तो अंदर से आ रही आवाज़ सुनने के लिए अनायास ही ठिठक गया।
” . . . जबसे मैं यहाँ आया हूँ, तुमने हमारी बहुत सेवा की है। तुम भी तो हमारी जाति के हो। तुमसे तो हमारी धर्मपत्नी और बच्चे भी बहुत ख़ुश रहते हैं। जब भी उन्हें मार्केटिंग इत्यादि के लिए जाना होता है, तुम्हीं को याद करते हैं। आख़िर कुछ तो ख़ूबी है तुममें . . . और हाँ, पिछले महीने निरीक्षण के लिए आई टीम की तुमने इतनी अच्छी आवाभगत की, कि वह तो होटल के कमरों से बाहर निकले ही नहीं और वहीं पर निरीक्षण की खानापूर्ति कर चले गए . . . अच्छा यह बताओ, सारे बिल तो मैनेज हो गए . . . अगले महीने बेटे का बर्थडे है, उसके लिए भी तो तुम्हें ही प्रबंध करना है।”
यह कहते हुए बॉस ने ज़ोरदार ठहाका लगाया। अब उसे अवार्ड का राज़ समझ में आ चुका था।