अनाथ

आकांक्षा यादव (अंक: 291, जनवरी प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

रातों-रात शहर में सांप्रदायिक दंगा फैल गया था। कई दिनों तक यह चलता रहा। लाशें ऐसे गिरतीं मानो विकेट गिर रहे हों। हर संप्रदाय के नेता दूसरे को नीचा दिखाने में लगे रहे। 

किसी तरह मामला शांत हुआ तो जाँच पर बात आकर अटकी। लाशों पर राजनीति भारी पड़ रही थी। दोनों पक्ष के लोगों ने अपनी बात रखी और मरने वालों हेतु मुआवज़े की माँग की। 

एक पक्ष के 17 लोग मरे थे तो दूसरे पक्ष के 13 लोग पर अभी भी एक का अंतर दिख रहा था। दोनों पक्ष के लोग हैरान कि यह कौन शख़्स हो सकता है? 

दोनों पक्षों ने लाश देखी तो वह अनाथ बालक था, जो घूम-घूम के गुब्बारे बेचता था। अब दोनों पक्ष के लोग आपस में निर्णय नहीं कर पा रहे थे कि उस अनाथ को हिंदू माना जाए या मुसलमान? सरकारी अधिकारी अपनी आँकड़ेबाज़ी दुरुस्त करने में लगे थे। 

हिंदू या मुसलमान के निर्णय में उस अनाथ बालक की आत्मा अभी भी भटक रही थी। 

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