जब तक ज़िन्दा हैं: लोकरुचि और सहज ग्राम्य-संवेदना की कहानियाँ
डॉ. राजेन्द्र वर्मासमीक्षित पुस्तक: जब तक ज़िन्दा हैं (कहानी संग्रह)
लेखक: कुँवर दिनेश सिंह
प्रकाशक: हिन्दी साहित्य निकेतन
मूल्य: ₹220.00
वर्तमान स्वरूप में कहानी हिंदी साहित्य में आधुनिक विधा के रूप में ही मान्य है। किन्तु किसी भी आधुनिक भारतीय भाषा का साहित्य और विशेषकर कहानी अथवा व्यापक रूप में कथा साहित्य भी, लोक की गहरी मानवीय संवेदना के संस्पर्श से शून्य नहीं है। यह बात अलग है कि पाश्चात्य साहित्य के प्रभाव और अति-बौद्धिकता की झोंक में अति-उत्साही रचनाकारों ने कविता को अकविता और कहानी को अकहानी कह कर स्वयं को आधुनिकता के अग्रदूत साबित करने का प्रयास किया, किन्तु आधुनिक भारतीय भाषाओं का साहित्य और इसलिए आधुनिक हिंदी साहित्य भी साहित्यिक स्निग्धता लोक के संस्पर्श से ही पाता है। लोक के इस संस्पर्श से बौद्धिकता शीघ्र ही दाएँ-बाएँ मुँह छिपाती फिरती है अथवा उसे लोरी गाकर सुला दिया जाता है। कुँवर दिनेश की ‘जब तक ज़िन्दा हैं’ संग्रह की कहानियाँ ऐसी ही लोकरुचि और ग्राम्य संवेदना की कहानियाँ हैं।
‘जब तक ज़िन्दा हैं’ संग्रह की पहली कहानी में कुँवर दिनेश ने छोटी-छोटी बातों को लेकर लोगों के कोर्ट में पहुँच जाने की ओर ध्यान आकृष्ट करवाया है। आज हम कोर्ट में न्याय में हो रही देरी पर ख़ूब बहस करते हैं, किन्तु इसका वास्तविक कारण स्थानीय स्तर पर लोगों में आपसी विश्वास का अभाव है। ग्रामीण परिवेश में राजस्व विभाग या पुलिस विभाग का अधिकार-भाव अभी भी बड़ी भूमिका निभाता है। वीरेन्द्र द्वारा जीत सिंह के बेटे को छेड़ना अकारण नहीं है, बल्कि उनके घर के वातावरण की ही बानगी है। छोटी-छोटी टस्सल हमें चैन से जीने नहीं देती और यह टस्सल पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती रहती है। ग्राम पंचायत अपनी जगह है किन्तु ग्रामीण परिवेश में अभी भी समझौते और सह-अस्तित्व की भावना के विकास की ज़रूरत है। कहानी की अंतिम पंक्तियाँ हैं—“और दोनों तरफ़ से एफ़.आई.आर. और काउंटर एफ़.आई.आर. दर्ज़ करा दी गई और एक नया मुक़द्दमा शुरू हो गया . . .” ये पूर्ण विराम से पूर्व के निरंतरता सूचक डॉट्स ही कहानी के उद्देश्य की ओर भी संकेत करते हैं। एस.पी. साहब की समझाइश में भी यही संकेत है, जब वे सरला को सचेत करते हुए कहते हैं, “देख माई, इस तरह मुक़दमेबाज़ी में क्या रखा है? अपना क़ीमती वक़्त, सुकून और पैसा, सब वेस्ट हो जाता है मुक़द्दमों में। तीस साल से फँसे हुए हो तुम लोग, क्या मिल गया है? ज़मीन-जायदाद सब यहीं छूट जानी है . . . आपस में प्यार मुहब्बत से रहो . . . बुड्ढे हो गए हो तुम लोग, लड़ते-लड़ते, अब तो चैन की साँस लो . . .” किन्तु चैन की साँस लेना कौन चाहता है। ये लड़ाई-झगड़े, एक दूसरे को नीचा दिखाने की कुत्सित चेष्टाएँ, ये दंभ गाँव से लेकर शहर तक और निम्न-वर्ग से लेकर उच्च-वर्ग तक व्याप्त है। एक और संकेत महत्त्वपूर्ण है कि यदि सरकारी विभागों में अफ़सरों से कोई राफ्ता न हो और पुलिस तक बात पहुँच जाए तो फिर आपका जीना मुहाल है। सत्ता और शक्ति का हर रास्ता भ्रष्टाचार से होकर ही गुज़रता है।
‘मुमूर्षा’ कहानी एक ‘सर्प’ पर केन्द्रित कहानी है। मूमूर्षा केवल मरने की इच्छा की कहानी नहीं है, बल्कि जीने की इच्छा की कहानी भी है। यूँ भारतीय धार्मिक-सांस्कृतिक विचारों में सर्प, काल की अवधारणा से जुड़ा प्रतीक भी है। भारतीय दर्शन-विवेचन में भगवान विष्णु जगत के पालनहार के रूप में पूजित हैं और वे शेषनाग की शैया पर विश्राम करते हैं। शेषनाग काल का प्रतीक है और इस प्रतीकात्मकता से विष्णु कालशेष हैं, काल से परे हैं। किन्तु इस दार्शनिक विचार से दूर कहानीकार इस कहानी में सर्प से भयभीत और जीवन-सम्मोहित लोगों के आपसी वार्तालाप और क्रिया-प्रतिक्रिया के माध्यम से, मूमुर्षा और जिजीविषा के प्रश्न को लोक-जीवन से जोड़ते हुए, बड़ी सहजता से संबोधित करते हैं। जसवंत और उसके परिवार-जन भयभीत हैं कि यह वृद्ध सर्प उन्हें या छोटे बच्चों को नुक़्सान पहुँचा सकता है। किन्तु जिस तरह से बड़ा बूढ़ा सर्प जिसको देशज शब्दावली में खड़पा कहा गया है, जसवंत के घर के पिछवाड़े से उसके चाचा तरसेम सिंह के घर के पास पहुँच जाता है; वहाँ लेखक ने यह संकेतित करने का प्रयास किया है कि खड़पे ने कदाचित् जसवंत के चाचा की उग्रता को भाँप लिया है और जसवंत की माँ उसे शायद मारने न देती। यह भी संकेतित करने का प्रयास है कि सभी जीवों का इस धरा पर साझा भी है और साहचर्य भी; किन्तु मानवातार में तो विष्णु रूप राम और कृष्ण को भी कालगत होना पड़ा था, फिर सर्प की क्या बिसात? कालचक्र ही सनातन है जीव नहीं।
संग्रह की तीसरी कहानी ‘बामण का क़र्ज़’ प्राचीन रीति-नीति, मूल्यपरक जीवन-शैली, सहज-स्वभाव, स्वाभिमान और ईमानदारी की कहानी है। यदि मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो स्कूल के दिनों में एक विद्यार्थी द्वारा दूसरे विद्यार्थी की तख़्ती को तोड़ देना और थोड़ी बहुत लड़ाई सामान्य बात है। किन्तु अपने जीवन के पचासी वर्षों में वैदजी ने जो जीवन मूल्य जिये हैं कदाचित् उसी का प्रभाव था कि एक दिन उन्हें अपने सहपाठी (अब जिन्हें सम्मानपूर्वक सभी पंडितजी कह कर बुलाते हैं) उसी टूटी हुई तख़्ती का तक़ाज़ा करते हुए स्वप्न में दिखाई दिए। वैदजी ने इस स्वप्न को यूँ ही नहीं भुला दिया बल्कि वे उस नुक़्सान को क़र्ज़ समझकर उसे चुकाने के लिए शहर पहुँच जाते हैं। जीवन मूल्यों के प्रति ऐसी आस्था, ऐसी निष्ठा, ऐसा स्वाभिमान ही नए और पुराने जीवन मूल्यों के अंतर को स्पष्ट करते हैं। निस्संदेह कुँवर दिनेश ने ग्राम्य-परिवेश में इन जीवन मूल्यों को अभी भी सजीव देखा है। पंडितजी और वैदजी का एक संवाद ध्यातव्य है, “अरे पंडितजी, आप कैसे भूल रहे हो कि मैं तो घर से बाहर कुछ नहीं खाता-पीता।” घर से बाहर कुछ भी ग्रहण न करना व्यक्तिगत शुचिता और नित-नियम का संकल्प है न की जातीय भावना से परिचालित हठधर्मिता; अन्यथा पंडितजी के घर पर भोजन अथवा पेय पदार्थ के सेवन से भला क्या गुरेज़? गुरेज़ है तो बस इतना कि लोक-व्यवहार में ब्राह्मण से कुछ लिया नहीं जाता जबकि पंडितजी अब कपड़े की दूकान कर रहे हैं न कि ज्ञान-दान कर रहे हैं। और लोक-व्यवहार को हमेशा तर्क की कसौटी पर नहीं कसा जा सकता वह तो आत्मीय-भावना। मानवीय-संवेदना, लोक-परम्परा और जीवन-मूल्यों का ही वाहक है जो लोक को जोड़ता है।
‘चंदू टुंडा’ कहानी भी देवभूमि के लोगों की अपने इष्ट पर आस्था को अलग तरह से अभिव्यक्ति देती है। कहानी की स्वाभाविकता स्वयं उस परिवेश से आती है जिस परिवेश में कहानीकार स्वयं रह रहा है, क्योंकि कहानीकार की स्वयं दैवी-शक्तियों पर गहरी आस्था है। ‘जब तक ज़िन्दा हैं’ कहानी की वस्तु के विपरीत यह कहानी ग्रामीण परिवेश के उस यथार्थ की ओर संकेत करती है, जिसमें गावों में सामान्यतः लोग कोर्ट-कचहरी के चक्र से बचने का प्रयास करते हैं। कारण कदाचित् यह भी कि न्याय जल्दी मिलता कहाँ है? न्याय पाने की प्रक्रिया इतनी बोझिल है कि थोड़ा बहुत अन्याय सहन कर लिया जाए तो ज़्यादा बेहतर। यहाँ भी देव-आस्था अथवा लोक-आस्था ही सत्य की रक्षा करती है। पहाड़ी ग्रामीण परिवेश में सचाई अभी भी यही है जो कहानी के अन्त में देवालय में मौजूद लोग घर की ओर प्रस्थान करते हुए चंदू से कहते हैं, “देवी-देवताओं से खिलवाड़ नहीं करना चाहिए। ज़मीनी अदालत से ऊपर भी एक अदालत होती है। ऊपर वाले से डरना चाहिए। उसकी लाठी में आवाज़ नहीं होती।” धार्मिक और लोक-मान्यताओं के कारण समाज में नैतिकता और मानव-मूल्य आज भी संरक्षित हैं, यही संकेत है। इन धार्मिक मान्यताओं को आधुनिकता के नाम पर अज्ञान अथवा अन्ध-विश्वास कह कर तिरस्कृत करने से लोक-व्यवहार में चालाकी और जटिलताएँ ही बढे़ंगी, कदाचित् यही संकेत है। अतः धार्मिक और लोक-मान्यताएँ जिस अंश तक समाज में जुड़ाव, नैतिकता, न्याय, सहजता और सरलता की पोषक हैं, उस अंश तक इन मान्यताओं को स्वीकार करने में कोई बुराई नहीं। हाँ, यही मान्यताएँ यदि दुर्बल को दबाने का हथियार बन जाए तो उनका परित्याग अवश्यम्भावी है।
‘लच्छी’ इस संग्रह की कदाचित् सबसे सशक्त कहानी है। एक परित्यक्ता, जो परिस्थितियों के वशीभूत, पथभ्रष्ट हो जाती है, के जलते हुए घर की आग को बुझाने के लिए केवल गाँव का उपप्रधान अपने दो नौकरों के साथ प्रयास करता है। उसके साथ मुँह काला करने वाले भी छुपे बैठे हैं, कि उनका सच समाज के सामने न आ जाए। उपप्रधान के व्यक्तित्व को लेकर लेखक लिखता है, “बड़ा ही दयालु व सहकारी प्रवृत्ति का अधेड़ अवस्था का व्यक्ति था पुरुषोत्तम लाला। गाँव में उसकी काफ़ी चलती थी। उसके मिलनसार स्वभाव व ख़ुशमिज़ाजी की वजह से ही लोगों ने उसे उपप्रधान पद पर बिठाया था। वह भी किसी से बातचीत किए बिना और हाल-चाल पूछे बिना नहीं रहता था। यहाँ तक की गाँव वालों की गाय, बैल, भैंस, बकरी और पालतू कुत्तों तक के नाम उसे याद रहते और इंसानों की तरह पशुओं का भी हाल-चाल पूछ लेता था।” यथार्थवाद के वशीभूत आज की कहानी में ऐसे आदर्श पात्र कम ही मिलते हैं, किन्तु जो रचनाकार सामाजिक सौद्देश्यता के साथ सृजनरत हैं वे ऐसे पात्रों के माध्यम से सामाजिक ताने-बाने को सहेजने-सँवारने का कार्य करते हुए सृजन को सार्थक करते हैं। कुँवर दिनेश ऐसे ही सर्जक हैं। समाज में अच्छाई बुराई हमेशा रही है, रहेगी भी। किन्तु एक स्वस्थ समाज में भ्रमित व्यक्ति को राह पर आने के अवसर मिलने चाहिएँ, इस दृष्टि से लच्छी और उप-प्रधान जैसे सशक्त पात्र के माध्यम से लेखक का यह प्रयास स्तुत्य है। लच्छी के व्यक्तित्त्व में आया बदलाव दृष्टव्य है, “इतनी सुबह पाले की ठंड की परवाह किए बग़ैर वह मंदिर के प्रांगण में झाड़ू-पोंछा कर चुकी थी। अभी सीढ़ियों पर पोंछा लगा रही थी। उसने तड़के ही लाला के दिए हुए साफ़ कपड़े पहन रखे थे। और पोंछा लगाते हुए ख़ुद में ही मगन एक भजन गुनगुना रही थी—“शिव कैलाशो के वासी . . . शंकर संकट हरना।” समाज में सेवा और समर्पण के भाव का पोषण भाषणबाज़ी से नहीं बल्कि संवेदनशील व्यवहार से आता है। ‘अध्यात्म’ अपने मूल स्वभाव में लौटने का ही नाम है और आधुनिक परिवेश में यह उपलब्धि दुर्लभ हो सकती है किन्तु अवास्तविक नहीं। लच्छी अपने अतीत को भूल कर, मंदिर में निःस्वार्थ भाव से कार्य जारी रखकर, अपने जीवन को सार्थक करती है, “दो-एक महीने में उसका रहने लायक़ घर भी बन गया। वह वहाँ रहने को गई, पर उसने मंदिर में काम करना नहीं छोड़ा। यह काम उसके लिए अब नौकरी भी थी, पर उससे कहीं ज़्यादा उसका ईश्वर के आगे प्रायश्चित या आत्मसमर्पण या आध्यात्मिक बल प्राप्ति का ज़रिया या शायद भीतरी सुकून पाने का माध्यम हो गया था।” कहना न होगा की सृजन के माध्यम से, यही भीतरी सुकून प्राप्त करना कदाचित् इस संग्रह के सर्जक का भी आत्यंतिक अभिप्रेत है।
‘महत्त्वाकांक्षा’ एक अलग तरह की छोटी सी कहानी है। एक सिरफिरा व्यक्ति जज के सीने में शहर के बाज़ार में सरेआम चाकू घोंपने का प्रयास करता है। तहक़ीक़ात से पता चलता है कि ऐसा ही हमला उसने 10 वर्ष पहले डी.एस.पी. पर भी किया था। कुछ दिनों बाद उसे पागल घोषित कर दिया गया और मनोचिकित्सालय भेज दिया गया। किन्तु जज का इलाज कर रहे डॉक्टर और प्रोफ़ेसर की बातचीत का निचोड़ यह निकला कि “प्रतिभा के बिना मनुष्य की महत्त्वकांक्षा उसे उन्माद की ओर ले जाती है।” शहर में लगी महात्मा गाँधी की मूर्ति के नीचे खड़े रह कर लोगों का ध्यान आकृष्ट करना, विदेशी लोगों के साथ हो लेना, पढ़ाई के लिए विदेश (ज़र्मनी) चले जाना, आवेग और तथाकथित क्रांति से पूर्ण कविताएँ लिखना और तब भी ख्याति न मिले तो डी.एस.पी. पर हमला करना, और सज़ा होने पर फिर फ़ैसला देने वाले जज पर ही हमला कर देना, यह सब एक ऐसी आत्मकेंद्रित मानसिकता की ओर संकेत करता है जो हर हाल में स्वयं को सही ठहराने का प्रयास करती है। ऐसे लोग बात तो क्रांति की करते हैं, किन्तु उनके लक्ष्य विशुद्ध आत्मकेंद्रित और स्वार्थी होते हैं। इस प्रकार कहानीकार ने एक मनोवैज्ञानिक तथ्य को एक कहानी के माध्यम से समझाने का प्रयास किया है। शैल्पिक दृष्टि से यह कहानी संग्रह की दूसरी कहानियों से अलग है, जो इस संग्रह को एक विविध आयाम से संपन्न करती है।
‘ममा’ कहानी एक बच्चे के नज़रिये से मानवीय संवेदना को छूने का प्रयास है। पति की मृत्यु के बाद अखिल की माँ का शृंगार से परहेज़, सामाजिक बाध्यता भी है, किन्तु निशिता इसे अपने पति के प्रति प्रेम और आदर भाव के कारण सहज ही स्वीकार भी कर चुकी है। कहानी का अन्त भाव-विभोर कर देता है जब निशिता का नन्हा सा बेटा अखिल अपने सहपाठी आशीष से अपनी टॉय ट्रेन के बदले शृंगार का सामान-लिपस्टिक, मस्कारा, बिंदियाँ और चूड़ियाँ ले आता है, क्योंकि अखिल को आशीष की माँ का सजा-सँवरा रूप सुंदर लगता था और वह अपनी माँ को भी उसके पूर्व-स्वरूप में देखना चाहता है। ऐसे विषयों पर हिंदी में बहुत सी क्रान्तिकारी कहानियाँ मिल जाएँगी, किन्तु जिस नज़ाकत और संवेदना से कुँवर दिनेश इस विषय को स्पर्श करते हैं, उसमें सामाजिक मर्यादा भी है, नारी का भाव भी है, बच्चे का भोलापन भी और वह समग्रता भी, जिससे मानव-समाज की मर्यादाएँ और रीति-रिवाज़ बने हैं, जो हमारे सामाजिक सह-अस्तित्व को मूल्यवान बनाते हैं। ऐसे जीवन में व्यक्तिगत रूप से कुछ अभाव ज़रूर दिखाई पड़ते हैं, किन्तु निशिता को कुछ नारी-मुक्ति संगठनों का प्रोत्साहन उसके प्रति सहानुभूति से अधिक प्रचारबाज़ी लगता है। अतः निशिता केवल परम्परा के वशीभूत नहीं, बल्कि अपने दिवंगत पति के प्रति आदर और प्रेम के कारण भी शृंगार को महत्त्व नहीं देती और उसका ऐसा सोचना समग्रता में सामाजिक जीवन को गरिमामय और समृद्ध बनाता है। यूँ वह व्यक्तिगत रूप से शृंगार करने का फ़ैसला भी कर सकती थी, दूसरे विवाह का भी सोच सकती थी, किन्तु फिर बच्चे अखिल का क्या? और एक माँ के लिए यह विवशता नहीं, उसके ममत्व की परीक्षा है, जिसमें कम से कम एक सामान्य भारतीय नारी फ़ेल नहीं होना चाहती। कदाचित् कहानीकार का यही अभिप्राय है। बदलते आधुनिक परिवेश में जहाँ स्वकेंद्रित आचरण को व्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ जोड़कर देखा जाता है, वहाँ निशिता का व्यक्तित्त्व नारी के स्वत्व और नारीत्व की पराकाष्ठा है जो माँ को देवतुल्य बनाता है तथा समाज को सजीव, संवेदनशील, मर्यादित और मानवीय। यही मानवीय संवेदना कुँवर दिनेश की कहानियों को नारेबाज़ी और बौद्धिक आख्यान से दूर हृतल का कोमल आधार देती हैं।
आधुनिक जीवन के खोखलेपन को उघाड़ती ‘पुराना मित्र’ लघु कथा भी पाठक को सोचने पर मजबूर करती है। बाह्य तौर पर हम अपने व्यवहार में खुलेपन का प्रदर्शन करते तो हैं, किन्तु वास्तव में वह लगाव, जिससे सामाजिक जीवन पोषित होता है, अब नहीं रहा। शहर में साक्षात्कार के लिए आए विपिन को शहर में ही रह रहा उसका मित्र (?) जतिन बुलाता तो बड़े उत्साह से है; हाल-चाल पूछ कर अपने यहाँ आने का निमंत्रण भी देता है; किन्तु दूसरे ही क्षण अपनी पत्नी के घर से लौटने की बात कह कर उसे असमंजस में डाल देता है। फिर “जगह तो दिल में होती है” कह कर अपना सेल-फोन नंबर भी दे देता है, किन्तु विपिन के साक्षात्कार के लिए बस पकड़ते ही अपना सेल फोन स्विच-ऑफ़ भी कर देता है। मित्रता का यह आधुनिक संस्करण कोई असामान्य, अप्रत्याशित, एकांगी घटना अथवा काल्पनिक कथानक नहीं है, बल्कि आधुनिक जीवन की एक नग्न सचाई है। इस सचाई को संप्रेषित करने के लिए कहानीकार एक बार फिर किसी जटिल बौद्धिक आख्यान का सहारा नहीं लेता, बल्कि बस दो परिचितों को बस अड्डे पर मिलवा देता है और चल-यंत्र किस तरह से, किस दिशा में, हमारे जीवन को चलायमान कर रहा है, उसकी ओर संकेत भर करके, समाज के यथार्थ को प्रत्यक्ष करते हुए पाठक की संवेदना को झकझोरते हुए ‘पुराना मित्र’ शीर्षक में वह व्यंग्यात्मकता भर देता है, कि पाठक कहानी के शीर्षक पर ठिठक कर, अपने भीतर का सच देखने पर मजबूर हो जाता है।
‘पटबाल’ ग्राम्य जीजिविषा की कहानी है। कहानी की मुख्य पात्र बसंती जब कहती है, “पैसे वालों को सब आसान ही लगता है . . . कोई हम ग़रीबों से पूछे . . . किस-किस तरह से एक-एक पैसा जोड़ते हैं हम लोग . . . इतना आसान कहाँ होता है यह सब . . . राशन, कपड़ा-लत्ता, बकरा, ये सब कैसे जोड़ना है, यह तो ग़रीब लोग ही जानते हैं . . .।” कभी बेटे दीपू के दादा की मृत्यु, कभी पीलिये के कारण बड़ी बेटी की मृत्यु, कभी जुआ आदि खेलने के जुर्म में पुलिस छुडवाने के लिए पैसों की भेंट, तो कभी दूसरी बेटी की शादी; देखते ही देखते दीपू 9 वर्ष का हो गया किन्तु उसका पटबाल न करवाया जा सका। कहानी में असली मोड़ तब आता है जब अपनी माँ की घास काटने में मदद करते दीपू को, साँप काट लेता है। साँप ज़हरीला न था और समीप की डिस्पेंसरी में ले जाकर इलाज हो गया, किन्तु फिर ग्राम्य-आस्था पति-पत्नी को नाग-मंदिर में पहुँचा देती है। आख़िर नाग-मंदिर में जाकर पटबाल करवाने की सुखना (मन्नत) जो की हुई थी। जिस दिन दीपू को साँप ने काटा, उस दिन बसंती की दायीं आँख सुबह से ही फड़क रही थी। इस प्रकार इस कहानी में एक बार फिर कहानीकार ने ग्राम्य आस्थाओं और मान्यताओं को केन्द्र में रखा है। कहना न होगा की दीपू को ज़हरीले साँप ने काटा, इसे भी एक चेतावनी के रूप में लिया गया। किन्तु कहानीकार इन मान्यताओं का मज़ाक़ नहीं उड़ाता, क्योंकि ये आस्थाएँ और मान्यताएँ ही गाँव को गाँव बनाती है, अन्यथा आधुनिकता की दौड़ में तो हम कहीं पहुँचते ही नहीं। यहाँ परिवार है, समाज है, जिजीविषा है और है संवेदनाओं का भरा-पूरा संसार!
“मुआवजा” कहानी एक छोटी बच्ची की कहानी है जिसे अशुभ नक्षत्र में जन्म लेने के कारण परिवार के लिए, विशेषकर पिता के लिए हानिकारक मान लिया गया। जन्म के समय माता को बड़ी मुश्किल से बचाया जा सका और दुबारा गर्भ धारण के अयोग्य बता दिया। मेहनत करने पर भी किसानी का कार्य पिता के लिए लाभकारी न रहा तो पंडित जी की भविष्यवाणी को सब ने सच मान लिया। कहानी के प्रारंभ में ही कहानीकार ने इस छोटी बच्ची लक्ष्मी को देवता की ड्योढ़ी पर मन्नत करते हुए दिखाया है—“देओ महाराज, इस बार बापू का कर्ज खत्म करा दो। फसल ठीक-ठाक हो जाए, देवा तेरी किरपा हो जाए।” किन्तु पिता दिन-प्रतिदिन क़र्ज़ में डूबता जा रहा था और इस सब का नज़ला गिर रहा था उस छोटी बच्ची लक्ष्मी पर। लक्ष्मी घर का सब काम निबटा कर स्कूल जाती और इसलिए कई बार देर से भी पहुँचती, किन्तु पढ़ाई में भी आगे रहती। चिंता उसकी यही कि पिता का क़र्ज़ कब टलेगा। प्रतियोगिता के लिए दूर के स्कूल जाकर, दो-दो पुरस्कार जीतकर वह ख़ुश थी कि उस राशि से पिता का क़र्ज़ हल्का हो, किन्तु वापसी में बस की ट्रक के साथ टक्कर और मृत लोगों के परिवार जनों को दो-दो लाख रुपए की राशि के मुआवज़े की घोषणा से वह अपने पिता को क़र्ज़मुक्त कर गई। किन्तु कहानी के अन्त में कहानीकार का कहना कि, “इस एक-मुश्त राशि से लक्ष्मी अपने पिता को ऋणमुक्त कर गई और साथ ही स्वयं भी सभी ऋणों से मुक्त होकर गई।”—इस कहानी को एक अलग व्यंजना देता है, जो सारे तर्क-वितर्क से परे है, किन्तु जिसमें मानवीय जिजीविषा और संवेदना की वह पराकाष्ठा है जो मृत्यु पर ही ठहरती है, किन्तु मात्र कुछ क्षणों के लिए, एक नए जीवन की तलाश में। यहाँ आस्था, जो ग्राम्य जीवन की विशिष्टता भी है, एक गहरी सांत्वना में सिमट जाती है, जिसे ग्राम्य भाषा में सीधे सीधे लेने-देने के सम्बन्ध कहा जाता है और यही सीधापन, यही सहज-बोध जीवन को बिखरने से बचा लेता है।
इस प्रकार कुँवर दिनेश की कहानियाँ गहरे ग्राम्य सहज-बोध की कहानियाँ हैं। वे बुद्धिजीवी हैं, किन्तु अपनी कहानियों की वस्तु का प्रसार करते हुए अपनी बौद्धिकता को कहानियों के कथानक पर आरोपित नहीं करते और यही भाव उनकी कहानियों को एक अलग अर्थवत्ता प्रदान करता है। यह बोध जीवन जैसा है, उसे वैसे ही स्वीकार करने से आता है। सामान्य वार्तालाप में हम सामाजिक रीति-रिवाज़ों, रीति-नीतियों और जीवन की विविध प्रणालियों की कितनी भी आलोचना कर लें, किन्तु वास्तविक सृजन जीवन को उसकी समग्रता में ही देखता है। अच्छाइयाँ हैं तो हैं, बुराइयाँ हैं तो हैं, प्रेम है तो है, घृणा है तो है, ज़िद है तो है—जब तक ज़िन्दा हैं। किन्तु बहुत गहरे में एक परिवर्तन की प्रक्रिया, एक संस्कार चलता रहता है, जिसके हम सब साक्षी भी होते हैं और अपने छोटे-छोटे सकारात्मक प्रयासों से, उसमें अपना योगदान भी देते रहते हैं। ऐसा ही प्रयास इस संग्रह की रचनाओं के माध्यम से कुँवर दिनेश भी करते हैं, बिना किसी नारेबाज़ी अथवा बिना किसी पक्षधरता के, जीवन के प्रति एकनिष्ठ आस्था के साथ।
0 टिप्पणियाँ
कृपया टिप्पणी दें
लेखक की अन्य कृतियाँ
- पुस्तक समीक्षा
-
- उदयाचल: जीवन-निष्ठा की कविता
- ऐसा देस है मेरा: देश के राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक ह्रास पर चिंता और चिंतन का दस्तावेज़
- क्षितिज : आस्तिक मन की सहज अभिव्यक्ति
- चिकन शिकन ते हिंदी सिंदी
- जब तक ज़िन्दा हैं: लोकरुचि और सहज ग्राम्य-संवेदना की कहानियाँ
- पुलिस नाके पर भगवान : जागरण का सहज-स्फूर्त रचनात्मक प्रयास
- विसंगतियों से जूझने का सार्थक प्रयास : झूठ के होल सेलर
- व्यवस्था को झकझोरने का प्रयास: गधे ने जब मुँह खोला
- वफ़ादारी का हलफ़नामा : मानवता और मानवीय व्यवस्था में विश्वास की नए सिरे से खोज का प्रयास
- हवा भरने का इल्म : मौज-मौज में मानव धर्म की खोज
- हिल स्टेशन की शाम— व्यक्तिगत अनुभवों की सृजनात्मक परिणति
- साहित्यिक आलेख
- कविता
- नज़्म
- विडियो
-
- ऑडियो
-