बँटवारा
महेश शर्मा
“एक एक चीज़ का बँटवारा होना चाहिये मामाजी, ज़रा भी पक्षपात नहीं चलेगा,” छोटे बेटे मधुकर ने चिल्लाकर कहा।
“हाँ मामाजी आज तक हमारे साथ बहुत भेदभाव होता रहा है। बड़े भय्या ने हमेशा पक्षपात किया है। आज जब अलग हो रहे हैं तो सूई बराबर चीज़ का भी बँटवारा होना चाहिये,” मधुकर की पत्नी सीमा और तेज़ स्वर में बोल रही थी। तभी बड़े बेटे सुधाकर की पत्नी शान्ति ग़ुस्से में चिल्लाई, “ज़्यादा बोलने की ज़रूरत नहीं है देवर जी, बड़ों से कैसे बात करते हैं ज़रा तमीज़ सीखो।”
पूरे घर में चल रहा महाभारत अपने चरम रूप में आ रहा था तभी मामाजी ने बीच-बचाव करते हुए कहा, “देखो जब तुमने हमको मध्यस्थता के लिये बुलाया है तो तुम सब चुप रहो हम सही बँटवारा ही करेंगे,” मामा ने अपने साथी किशनलाल की ओर देखा जो दोनों बेटों के काका लगते थे। किशनलाल ने सहमति में सिर हलाते हुए घर के सारे सामान की सूची बनानी शुरू कर दी।
नगर के प्रतिष्ठित व संपन्न परिवार में पिछले एक महीने से यह पारिवारिक महासंग्राम चल रहा था। सेठ श्यामलाल जो अब काफ़ी बूढ़े हो चले थे शुगर और अन्य कई बीमारियों को लेकर बिस्तर पर पड़े रहते थे। उनके दोनों बेटों और बहुओं के बीच चल रहा विवाद अब सुलझने की सीमा पार कर चुका था। ऐसे में रिश्तेदारों ने मध्यस्थता कर दोनों भाइयों को समझ-बूझकर अलग-अलग हो जाने की सलाह दे डाली। आनन-फ़ानन में मामा और काका को बुलवाकर उन्हें बँटवारे की जवाबदारी सौंपी गई।
दोनों भाई और उनकी पत्नियाँ जहाँ पूरे चाकचौबन्द होकर बँटवारे की कार्यवाही पर नज़र रखे थीं वहीं बीच के कमरे में पलंग पर सोये बीमार सेठ श्यामलाल और सामने ही दूसरे पलँग पर लेटी उनकी पत्नी कस्तूर बाई की आँखों से आँसू थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे। कस्तूर बाई भी दिल की मरीज़ थी। दोनों ही असहाय थे। दोनों का इलाज चल रहा था। यद्यपि दोनों ने घर में दख़ल देना बन्द कर दिया था पर फिर भी अपने घर-परिवार का ये हश्र देख कर कौन माँ बाप दुखी नहीं होंगे।
ये दोनों बेटे और तीसरा बेटा प्रभाकर तीनों में कितना प्रेम हुआ करता था बचपन में। लेकिन शादी होने के बाद देखते ही देखते ऐसी कुछ हवा चली कि स्वार्थ की धूल भरी परतें रिश्तों की चौखट पर जमती चली गईं और सगे भाइयों के दिलों के द्वार धीरे-धीरे बन्द होने लगे। बाहर से आने वाली बहुओं ने अलगाव के इन द्वारों को बन्द होने में और सक्रिय योगदान दिया। तीसरा बेटा प्रभाकर तो अच्छी नौकरी पाकर विदेश चला गया और वहीं बस गया। बचे दोनों भाई धीरे-धीरे रिश्तों को धुँधला करते एक दूसरे के दुश्मन होते गये। देवरानी, जेठानी की आये दिन होने वाली कलह और भाइयों की कहासुनी से घर का वातावरण नारकीय होता जा रहा था। यद्यपि परिवार की आर्थिक स्थति बुरी नहीं थी। दो-दो व्यवसाय एवं कृषि से पर्याप्त आय होती थी, लेकिन परिवार में सौहार्द्र बनाये रखने के लिये धन की नहीं मन की संपन्नता आवश्यक होती है।
देखते ही देखते सारी संपत्ति की एवं छोटे बड़े सामान की सूची बन गई। दो मकान, कपड़े की व किराने की दो दुकानें एवं 10 बीघा ज़मीन स्थायी संपत्ति के रूप में थी बाक़ी घर में माँ-बाप का बसाया बहुत सारा सामान था। गहने आदि कुछ तो अपने-अपने अलग-अलग ही थे और कुछ संयुक्त परिवार के थे। इस प्रकार सारे सामान का रेकार्ड बनाकर मामा ने दोनों बेटों को अपने सामने बैठाया, “हाँ तो अब ये बताओ बेटा कि इनका बँटवारा किस तरह करना है?”
“बस सारे सामान और संपत्ति के दो हिस्से कर दो बराबर-बराबर,” सुधाकर ने स्पष्ट कहा।
“दो क्यों? प्रभाकर भी तो है ना?” मामाजी चौंके।
“नहीं मामाजी वो तो तीन साल से विदेश चला गया है। उसने बिज़नेस में भी कोई सहयोग नहीं किया और वो कह भी चुका है कि अब वापस नहीं आयेगा,” सुधाकर ने बड़ी दिलचस्पी से सारी जानकारी बयान कर दी। तभी मधुकर ने भी तत्परता से शेष तथ्य भी वर्णन करते हुए बताया कि, उसके पास तो बहुत पैसा है और उसकी दिलचस्पी यहाँ की प्रॉपर्टी में बिलकुल नहीं है।
“अच्छा ठीक है प्रभाकर को तो छोड़ो; लेकिन एक हिस्सा माँ-बाप का तो रखना पड़ेगा ना?” मामा ने फिर प्रश्न रखा।
“कैसी बात करते हो मामा, इतने बुढ़ापे में हिस्सा लेकर क्या करेंगे वो?” सुधाकर ने स्पष्ट किया और मधुकर ने समर्थन करते हुए बात पूरी की, “हम हैं तो सही उनकी देखभाल करने के लिये।”
मामा और काकाजी दोनों आश्चर्यचकित थे, दोनों भाइयों में अचानक बनती सहमति से।
“ठीक है मैं उनसे भी पूछ लेता हूँ।” मामा ने बीच के कमरे में जाकर बहन-बहनोई से चर्चा की। वृद्ध दंपती कुछ भी राय व्यक्त नहीं कर पाये। सिवा इसके कि अब बुढ़ापे में ऐसी अशक्त स्थिति में वे हिस्सा लेकर तो क्या करेंगे उनकी बाक़ी उमर शान्ति से गुज़र जाये बस इतना ही काफ़ी है।
अब कोई समस्या नहीं थी। सभी की सहमति से दोनों भाइयों में एक-एक मकान, पाँच-पाँच बीघा ज़मीन और घर का सारा सामान भी दो भागों में बाँट दिया गया। दुकान पहले से ही दोनों की अलग-अलग थी। कुछ सामानों के बँटवारे में दोनों बहुओं की नोक-झोंक के बावुजूद सारी सम्पत्ति बड़ी व्यग्रता से बँट गई। मामाजी और किशनलाल काका ने संतोष माना कि चलो ज़्यादा विवाद नहीं हुआ। काकाजी ने दोनों भाइयों की पीठ ठोकते हुए कहा कि अब प्रेम से रहना दोनों, ऐसे काम के लिये हमें मत बुलाना। मामा और काकाजी जाने की सोच ही रहे थे तभी बड़ी बहू ने सुधाकर को अन्दर आने का इशारा कर कहा, “आप ज़रा अन्दर आना और मामाजी आप अभी रुकना।” इस हरकत से सभी चौंके! अब क्या बाक़ी रह गया है? बड़ी बहू क्या कहने जा रही है? मधुकर का माथा ठनका। चारों ओर संशय का वातावरण बन गया।
पाँच सात मिनट की खुसुर-पुसुर के बाद बड़ा चिन्ताग्रस्त चेहरा लिये सुधाकर वापस सबके बीच आया “मामाजी अभी एक समस्या और बाक़ी है।”
क्यों और क्या रह गया है बँटवारे के लिये?”
“मामाजी बात ये है कि मैं तो दिन भर दुकान पर चला जाता हूँ घर में कोई बड़ा बच्चा भी नहीं जो घर के काम में हाथ बँटाये, और शान्ति को आप देख ही रहे हो कितनी बीमार रहती है।”
“लेकिन इन बातों का बँटवारे से क्या सम्बन्ध?” काका की समझ में कुछ नहीं आया।
“बात ये है कि . . .” सकुचाते हुए सुधाकर फिर चुप हो गया। तभी शान्ति ने सबके बीच आकर कहा, “साफ़-साफ़ क्यों नहीं कहते इसमें शरम की क्या बात है? जो है वो तो है।”
“पर बात क्या है बहू?” मामा ने शान्ति से पूछा।
सीमा की दोनों चौकन्नी आँखें जेठानी के चेहरे पर जमी थीं।
“बात ये है मामाजी अब आप ही बतायें, मैं अकेली घर का इतना काम भी करूँ दुकान में भी टाइम दूँ, तबियत मेरी हमेशा ख़राब रहती है फिर ऐसे में दो-दो बीमारों को भी सम्हालूँ, कैसे कर पाऊँगी ये सब?”
“दो-दो बीमार!” मामा और काकाजी दोनों चौंके!
“इसका मतलब माँ और बाबूजी से है मामाजी,” सुधाकर ने बात स्पष्ट की।
“तुम कहना क्या चाहते हो? हमारी तो कुछ समझ में नहीं आया।” मामाजी झुँझला गये लेकिन देवरानी सीमा तत्काल समझ गई कि जेठानी क्या कहना चाह रही है।
“मामाजी, बाई व बाबूजी को दिन में तीन-तीन बार दवाइयाँ देना पड़ती हैं। रात में बार-बार उठकर सम्हालना पड़ता है। शान्ति कब तक ये परेशानी उठाये? ये भी तो बेटे-बहू हैं। इनको भी कुछ जवाबदारी समझनी चाहिये,” सुधाकर ने एक साँस में अपने मन की बात कह डाली। उधर सीमा ने खाँसते हुए मधुकर को अन्दर बुला लिया। संभावित मुसीबत से बचने के लिये रणनीति बनाना तत्काल ज़रूरी था। बात को समझते हुए मामाजी और काकाजी दोनों ने ठंडी साँस भरी।
“ठीक है तुम्हारी समस्या सुनी अब तुम क्या चाहते हो ये बताओ?” मामा ने सुधाकर से पूछा।
“चाहना क्या है मामा, जैसे हमने माँ-बाबूजी को बहुत दिनों तक सम्हाला ऐसे ही अब ये दोनोंं भी इनको सम्हालें, इनकी सेवा करें।”
“अरे वाह भैया आप तो ऐसे कह रहे हो जैसे हमने बाबूजी की ज़रा भी सेवा नहीं की हो।” सीमा का तेज़ स्वर गूँजा। दोनों पति-पत्नी की रणनीति तैयार हो चुकी थी।
“मामाजी जितनी सेवा इन्होंने की है उतना ध्यान हमने भी रखा है। और समस्या तो हमारे साथ भी है। सीमा भी इतना सब कैसे सम्हाल पायेगी। हमारे बच्चे भी अभी छोटे हैं, फिर दोनों के इलाज का ख़र्चा में अकेला भी कैसे उठा पाऊँगा?” मधुकर ने अपना पक्ष बड़ी मज़बूती से रखा।
तभी शान्ति बोल पड़ी, “हमारे पास भी अब ज़्यादा पैसा नहीं है ख़र्च करने को। दोनों के इलाज और रख-रखाव पर जो भी ख़र्चा होगा दोनों को बराबरी से करना पड़ेगा ना कम ना ज़्यादा।”
अब इस समस्या का क्या समाधान होगा? मामा और काका दोनों चिंता में पड़ गये। हारकर दोनों ने बेटों से ही पूछा, “तुम्हीं बताओ क्या उपाय है इसका?”
“देखो मामाजी या तो ये मधुकर एक-दो साल इन दोनों को रखे फिर मैं भी वापस एक-दो साल रख लूँगा या . . .”\
“नहीं ऐसा नहीं होगा,” मधुकर ने बड़े भाई की बात काटी, “एक-दो साल बाद का क्या ठिकाना?”
“फिर क्या करें? काका ने फिर पूछा।
तभी छोटी बहू सीमा ने तत्काल उपाय खोज निकाला, “ऐसा करो मामाजी माँ और बाबूजी में से एक को बड़े भैया अपने पास रख लें दूसरे को हम रख लेंगे। इस तरह दोनों का वज़न हल्का हो जायेगा।”
“हाँ ये ठीक रहेगा,” शान्ति को भी बात जँची, “हम माँजी को रख लेंगे, बाबूजी को तुम रख लेना।”
सीमा चौंकी, इतनी जल्दी जेठानी पत्ता फेंक देगी वो समझ नहीं पाई कि किसे रखना फ़ायदेमन्द है। वह कुछ नहीं बोली तभी सुधाकर और मधुकर की नज़रें आपस में मिली। अपनी अति महत्त्वपूर्ण और पारंपरिक जवाबदारी जो एक पवित्रतम और नैसर्गिक पुण्यकार्य में मानी जानी थी उसका इस तरह विभाजन भी उनकी नज़रों में शर्मिन्दगी पैदा नहीं कर पाया था। दोनों तत्काल सहमत हो गये, “हाँ ये फ़ॉर्मूला ठीक रहेगा।” दोनों ने मामाजी और काका को अपनी सहमति से अवगत करवाते हुए कहा, “अब इन दोनों का बँटवारा भी आज ही कर दें।”
मामाजी एवं काका दोनों हतप्रभ थे, कैसे उन दोनों बुज़ुर्गों को निर्जीव सामान की तरह बाँट कर अलग कर दें।
दोनों ने तत्काल इस उलझन वाली सौदेबाज़ी से स्वयं को अलग करते हुए कहा, “भाँजो, प्रॉपर्टी का बँटवारा तो हमने कर दिया है पर माँ-बाप का बँटवारा ना हमने देखा ना सुना है और ऐसा पाप हम करेंगे भी नहीं। ये तुम दोनों ही तय करो कि कौन किसको रखेगा और उन दोनों को तुम ही ख़बर करो।”
“इसमें पाप की क्या बात है मामाजी ये तो व्यवस्था है। हम राज़ी कर लेंगे माँ बाबूजी को। फिर कोई दूरी भी तो नहीं है हम दोनों के घर आमने-सामने ही तो हैं। रोज़ भी मिलते रहेंगे।”
सुधाकर की बात पुरी होते-होते स्तब्ध और दुखी मामा उठकर बाहर चले गये थे।
बीच के कमरे में बैठे सारी चर्चाएँ सुन रहे बूढ़े दंपत्ती के प्राण ये सोच-सोच कर हलक़ में आ रहे थे कि अब इस उमर में अलग-अलग रहना पड़ेगा।
दोनों बेटों ने बड़ी कुशलता से उन्हें समझाना शुरू किया। यद्यपि माँ-बाप ने बहुत विरोध किया कहा भी कि हम तुम्हारा कुछ भी ख़र्च नहीं होने देंगे, हमारा इलाज भी मत करवाना पर हमें एक साथ रहने दो। लेकिन कुशल बेटों ने बड़ी वाकपटुता से दोनों को राज़ी कर लिया। दुखी माँ ने स्मरण भी कराया कि कैसे उन्होंने अकेले ही तीन बेटों और दो बेटियों को पाला पोसा, बड़ा किया, सारी सुख सुविधा दी और आज तीन-तीन बेटों को भी हम बोझ लग रहे हैं।
लेकिन नये ज़माने के बेटों के पास इसका भी जवाब था। मधुकर ने बड़ी चतुराई से समझाया, “बाबूजी पुराने ज़माने की बात अलग थी। अब महँगाई बहुत बढ़ गई है, परिवार चलाना है; थोड़ा आप भी एडजस्ट करो थोड़ा हम तकलीफ़ उठा लेंगे।”
बूढ़े श्यामलाल ने कस्तूरी बाई की ओर देखा। रक्तचाप से पीड़ित कस्तूर बाई कुछ भी बोलने की स्थिति में नहीं थी लेकिन उनकी आँखें आँसुओं से तर थीं, गला अवरुद्ध था। यह सब देख बूढ़े श्यामलाल बिस्तर पर निढाल होकर पड़ गये, “हरि इच्छा,” कहते हुए।
इधर चारों बेटे, बहुएँ बँटवारा योजना पर बहुत ख़ुश थे और सूची अनुसार अपने हिस्से में आया सामान समेट रहे थे।