बासंती सी पवन चलती
डॉ. अनुराधा प्रियदर्शिनी
बासन्ती सी, पवन चलती, क्यारियाँ हैं बुलातीं।
खेतों में जो, फ़सल पकती, स्वर्ण सी है लुभाती॥
मिट्टी में है, कनक उपजा, देखता है ज़माना।
बाग़ों में है, मधुर सुन लो, कोकिला का तराना॥
साँसों की जो, स्वर लहरियाँ, आप ही को सँवारें।
शोभा भारी, हरित धरणी, प्यार के हैं नज़ारे॥
माता देखो, हर दिन यहाँ, ले रही है बलाएँ।
आओ देखो, चमन महका, छा गई हैं घटाएँ॥
गाना गाएँ, कृषक ख़ुश हो, स्वप्न साजे सुहाने।
आओ देखो, सरल मन से, वो भरेंगे ख़जाने॥
आते सारे, मिल-जुल चलें, देख लो ये क़तारें।
झूमे सारी, सुरभि घुलती, प्यार की हैं बहारें॥