विसंगतियों से जूझने का सार्थक प्रयास : झूठ के होल सेलर

01-09-2020

विसंगतियों से जूझने का सार्थक प्रयास : झूठ के होल सेलर

डॉ. राजेन्द्र  वर्मा

समीक्ष्य पुस्तक: ‘झूठ के होल सेलर’ (व्यंग्य-संग्रह)
लेखक: अशोक गौतम
प्रकाशक: लोकहित प्रकाशन, दिल्ली- 110093
मूल्य: रुपए 300/- केवल

व्यंग्य किसी भी भाषा की ज़िन्दादिली और जीवंतता का प्रतीक होता है। किन्तु हिंदी में अक़्सर इसके पूर्व में हास्य शब्द जोड़ कर इसे एक हल्का रूप देकर और समीक्षा के समय उसी भावना की आलोचना कर इसे विशुद्ध साहित्य के स्थान से बाहर धकेलने के प्रयास होते हैं। कई बार तो यह धारणा भी बनती देखी गई है कि यह एक नकारात्मक योजना है। इस प्रकार व्यंग्य को रचनात्मक साहित्यिक विधा मामने से ही इंकार किया जाता रहा है तथा व्यंग्य लेखक तक को हीन-ग्रंथि का शिकार व्यक्ति ठहराया जाता है। किन्तु वास्तव में व्यंग्यकार अपनी साहित्यिक प्रतिभा और रचनात्मकता से जीवन को रचनात्मक और सुंदर बनाने का प्रयास करता रहता है। सभी प्रकार की सामाजिक व्यवस्था और यथास्थितिवादी मूल्य-पद्धतियाँ तथा आत्मतुष्ट और आत्मनिष्ठ अथवा स्व-केंद्रित व्यक्ति उसका निशाना होते हैं।

व्यंग्य लिखना कितना कठिन कार्य है इसकी एक बानगी गौतम जी के व्यंग्य के माध्यम से इस प्रकार व्यक्त हुई है- ‘देखो गुरु! जिस तालाब में रहना उसमें रहते मगरमच्छों से बैर दूर की बात, मच्छरों तक से बैर कम से कम मैं नहीं ले सकता। ये सार्थक ऊटपटांग लिखना मेरे बस का नहीं। बसों में घूम-घूम के केले, संतरे बेच ही पेट भर लूँगा पर।’

वर्तमान समय के यथार्थ को अभिव्यक्ति देते हुए लेखक कहता है- ‘आज का दौर झूठ का दौर है। जो जितना बड़ा झूठ जितनी संजीदगी से बोल सके वह उतना ही इंटेलिजेंट। आज का दौर झूठ सीना चौड़ा कर कहने का दौर है। जिसने सच कहने की दुम दबाकर भी गलती की, उसे भगवान भी नहीं बचा सकते। सच की दुकानों का बाजार तो जैसे आज सिमट कर रह गया है। हर सच की दुकान का रंग-प्लास्टर सब उखड़ा हुआ। आजकल सच बेचने वाले तो अपनी दुकानों पर रात को ताले भी नहीं लगाते। कोई गलती से सच चुरा कर ही ले जाए तो कम से कम दुकान का गंद तो निकले।’ गौतम जी के अनुसार ‘असल में, अपने को अपने कद से ऊंचा दिखाने की होड़ ने ही इस बाजार को शिखर पर ला खड़ा किया है।’ और यह भी कि ‘झूठ के बाजारों के शेयरों में पैसा लगाने पर उसके मरने के चांस आज की तारीख में जीरो हैं।’

डॉक्टर को आज भी लोग भगवान मानते हैं। किन्तु आपा-धापी के इस युग में नैतिकता कही ढूँढ़ें नहीं मिलती। हो भी क्यों न, एक तो मेडिकल में एडमिशन ही मुश्किल, ऊपर से शिक्षा के प्राइवेट हाथों में जाने के बाद भरी भरकम फ़ीस। ऐसे में यह पाक प्रोफ़ेशन भी व्यवसाय बन कर रह गया है। मास्टर जी का इस धरा पर समय पूरा होने के बाद जब यमराज और चित्रगुप्त उसको यमलोक लेने के लिए पहुँचते हैं तो यमराज एक गली में से गुज़रते हुए एक कुत्ते का शिकार हो जाते हैं। किन्तु अस्पताल में पैर धरते ही इस धरा के यमराज उर्फ़ डॉक्टर से उनका पाला पड़ जाता है और उनको टेस्टों की एक लम्बी लिस्ट थमा दी जाती है। डॉक्टर का निर्देश हुआ कि–

‘बाहर सामने पी के टेस्ट लैब है। मेरा नाम लेना कि डॉक्टर वर्मा ने भेजा है’ और जब बिल बना तो यमराज हैरान– ‘दस हजार!’

उधर से– ‘हाँ तो दस हजार। आपकी किडनी का, लीवर का, ब्लड का, हार्ट का, दिमाग का टेस्ट होना है।’

‘मतलब!’

‘मतलब ये कि– कटी टांग को मारो गोली। आपका तो हार्ट बढ़ गया है। देखो तो, दाईं किडनी श्रिंक हो गई है। और ये लीवर– पेट में पता नहीं फिट कैसे है? ये तो इतना बढ़ गया है कि– और ये बीपी– कुछ महसूस कर रहे हो?’

‘आओ रोग कैश करें’ में भ्रष्टाचार के इसी प्रश्न को डॉक्टर और दवाई कंपनियों के नैक्सस के माध्यम से उठाया गया है। आम आदमी भी दूध का धुला नहीं और वह भी छोटे-छोटे प्रलोभनों के कारण यदि मौक़ा मिले तो अपने स्वार्थ साधने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। किन्तु डॉक्टर का मरीज़ को प्रलोभन देते हुए यह कहना कि– ‘एमवे के प्रॉडक्ट्स आजकल पूरे देश में धूम मचाए हैं। उनको लेने वाला साठ में भी आठ का ही लगता है। तुम चाहो तो– रोग को कैश कर सकते हो ! डरो मत ! आजकल हर ईमानदार से ईमानदार कर्मचारी तक ऐसा ही कर रहा है। बिना रीइम्बर्समेंट के आज किसी का गुजारा नहीं। इसलिए समझदार लोग रोग से घबराते नहीं बल्कि उसके लगने पर जश्न मनाते हैं।’– न केवल हमारी नैतिकता पर क़रारा तमाचा है बल्कि नैतिक पतन की पराकाष्ठा को नग्न रूप में अभिव्यक्त करता है।

इधर किसानों की आत्महत्या को लेकर ख़ूब राजनीति हो रही है। सभी राजनीतिक पार्टियाँ अपने आप को किसानों का मसीहा बताने में मीडिया में होड़ करती हैं, किन्तु किसानों द्वारा आत्महत्या की घटनाएँ कम होने का नाम ही नहीं ले रही। इस भयावह स्थिति की ओर ध्यान खींचते हुए व्यंग्यकार कहता है– ‘वैसे भी साहब का रखा है किसानी में ? दिन रात मिट्टी के साथ मिट्टी बनो, आखिर में हाथ आता क्या है साला? यहाँ तो किसान सबका नरम चारा है। पटवारी का नजराना और दस्तूरी न दें तो गाँव में रहना मुश्किल। जमींदार के चपरासी और उसके कारिंदों का पेट न भरें तो निबाह न हो। कानिसटिबिल और थानेदार तो हम गाँव वालों के दामाद होते ही हैं सरकार ! गाँव में आजकल तो एक न एक हाकिम रोज बढ़ते जाते हैं। सबकी जोरू किसान।’

इन बदली हुई परिस्थितियों में गाँव की दुर्दशा पर ‘कॉफी विद कृष्णा’ नामक व्यंग्य में लेखक ने गहरी चुटकी ली है। वृन्दावन जा कर रेहड़ी वाले को भी जब पैकेट बंद दूध से चाय बनाते देखा तो लेखक द्वारा व्यंग्य के एक पात्र के रूप में कृष्ण को कैफ़े में जाकर ब्लैक कॉफ़ी पीने का आमंत्रण देना बहुत ही व्यंजक है। इसी व्यंग्य में यमुना के प्रदूषित जल को देख कर कृष्ण से पूछना कि ‘ये यमुना में जो काला जल दिख रहा है, ये कालिया के विष से ही हुआ होगा? कितना भयंकर था वह? आजतक जल साफ नहीं हुआ।’– हमारे स्वच्छता अभियान का ही नहीं बल्कि हमारी प्रदूषित मानसिकता की भी पोल खोल देता है। वास्तव में हमारी सोच कालिया नाग के विष से भी विषैली है। इसी व्यंग्य में धार्मिक स्थानों पर व्याप्त भ्रष्टाचार की भी कलई खोली गई है। कृष्ण का नास्तिक व्यक्ति को यह कहना कि ‘असल में नास्तिक से नास्तिक भी जब तक तीर्थों पर जाकर अपने को पंडों से ठगवाता नहीं, लुटवाता नहीं, उसे स्वर्ग नहीं मिलता। इसलिए तुम चाहो तो– मथुरा वृन्दावन आने का मैं तुम्हें– मैं साथ रहूँगा तो पंडों से ठगने की संभावना जरा कम हो जाएगी।’– धर्म और आस्था के सवाल को बड़ी शिद्दत के साथ उठाने का प्रयास है।

इधर धर्म के नाम पर भेड़चाल भी व्यंग्यकार के निशाने पर है। एक और धार्मिक कोटि के व्यंग्य में नवरात्रों के अवसर पर किस तरह से मंदिरों में भीड़ उमड़ पड़ती है, कैसे नौ दिन के लिए लोग उपवास रख लहसुन, प्याज तक का परित्याग कर धार्मिक स्थलों पर रेलमपेल के लिए कमर कस लेते हैं, धार्मिक हो जाते हैं; इसी प्रवृत्ति पर व्यंग्य करते हुए व्यंग्यकार लिखते हैं–‘जिधर देखो लगता है सतियुग आ गया। सब भगवान का गुणगान करने में जुटे हैं।’ अपने व्यंग्य-बाण को और तीखा कर छोड़ते हुए वे कहते हैं– ‘देखो तो भक्तों के साथ-साथ रतजगा कर भगवान की आँखें भी कितनी सूज गई हैं।’ भगवान को सांत्वना देते हुए और लोगों की मानसिकता पर कटाक्ष करते हुए लेखक आगे कहता है– ‘कोई बात नहीं भगवन! नौ दिन की ही तो बात है। उसके बाद तो मंदिर में भक्तों के दर्शन को आँखें तरस जाएंगी।’ धर्म-परिवर्तन के ज्वलंत मुद्दे पर ‘ठगड़ा राम बाकलम खुद बनाम पेट युद्ध’ नामक व्यंग्य में लेखक ने इसकी असलियत को उघाड़ा है जब धर्म परिवर्तन करने वाला व्यक्ति कहता है– ‘यार हमें क्या लेना धर्म-कर्म से? बिना हाथ चलाये पेट भरता रहे बस ! शार्ट में कहें तो माल जिधर से मिला, हम उसी के हो लिए। उन्होंने सुबह परांठे खिला दिए तो अमर हो गए। इन्होंने लंच करा दिया तो अनवर हो गए। शाम को उन्होंने डिनर करवा दिया तो..’ इस प्रकार धर्म के नाम पर ढकोसले-बाज़ी इस व्यंग्य-संग्रह में व्यंग्यकार के निशाने पर है ।

राजनीति तो हमेशा से ही व्यंग्य लेखकों के निशाने पर रही है क्योंकि भारत के सन्दर्भ में कभी धर्म और संस्कृति जीवन के हर पहलू को प्रभावित करती थी किन्तु वर्तमान में तो चहुँ ओर राजनीति का ही बोलबाला है । ‘मैं जसदेव सिंह बोल रहा हूँ’ नामक व्यंग्य में विधानसभाओं और संसद में अक़्सर होने वाले हंगामों पर क़रारा व्यंग्य किया गया है और अंदाज़ भी अलग– ‘अब लीजिए, सत्ता पक्ष और विपक्ष द्वारा एक दूसरे की मेजों पर रखे कागजों की बौछार होनी शुरु हो गई है। सभी एक-दूसरे पर बड़बड़ा रहे हैं। सच कहूँ तो इतनी तनावपूर्ण स्थिति तो दंगे-फसाद के समय भी नहीं होती जितनी विधानसभा के भीतर देखने को नसीब हो रही है। वाह ! किस शिद्दत के साथ सभी एक दूसरे पर भारी पड़ने की फिराक में हैं। एक दूसरे के कपड़े फाड़ने की ताक में हैं।’ और राजनीतिज्ञों अथवा नीति-निर्माताओं के स्वार्थ-प्रेरित, अगंभीर आचरण को शब्द देते हुए आँखों देखा हाल सुनाने वाला हैरान हो कर कहता है कि– ‘इन सब के मल्लयुद्ध को देख कर ऐसा लगता है जैसे में आपको किसी विधानसभा का नहीं, किसी मेले के दंगल का आँखों देखा हाल सुना रहा हूँ।’

‘ईमानदारी पर सर्वे’ और ‘मैया मोरी में नहीं संसद जायो’ नामक व्यंग्यों में भी राजनीति ही केन्द्र में है। एक बानगी देखिए स्वर्ग के देवताओं ने आपातकालीन सत्र बुला कर निर्णय लिया कि– ‘जम्बूद्वीप में नेताओं की ईमानदारी की गुणवत्ता पर ईमानदारी से सर्वे करवाया जाए ताकि जम्बूद्वीप की लुप्त होती ईमानदारी के संरक्षण हेतु एहतियातन कदम समय रहते उठाये जा सकें, उसका असली दवाइयों से इलाज करवाया जा सके। बैठक में सर्व-सम्मति से यह भी तय हुआ कि सर्वे में सैंपल नेताओं के ही लिए जाए। जनता की ईमानदारी के सैंपल लेने की जरूरत नहीं। उनमें पहले ही न के बराबर खून बचा है।’ इस प्रकार व्यंग्यकार दुखती रग पर हाथ तो रख देता है। किन्तु स्थितियाँ तो तभी बदलेंगी जब सभी इस अन्याय और अतिवाद का प्रतिकार करें। किन्तु आम लोगों की बेचारगी और लाचारी को भी लेखक ने एक बहुचर्चित प्रशासनिक अधिकारी की दुर्गति के माध्यम से प्रत्यक्ष किया है। जब उनका पड़ोसी हैरानी से उनके छयालिसवें तबादले पर कहता है– ‘हमारे पड़ोसी खेमका भाई साहब का फिर तबादला हो गया है। यह सुन गुस्सा भी आया, ये बंदा भी न! जब देखो बोरिया बिस्तर बांधे ही रखता है। सिस्टम सुधारने की न जाने कैसी कसम खाई है इसने भी अरे पगले सिस्टम को छोड़ अपने को सुधार तो बार-बार के तबादले के आदेशों से मुक्ति मिले मेरी तरह।’ कहने की आवश्यकता नहीं है कि आम आदमी इसी तरह लाचार है। सच तो यह है की स्थितियाँ तो इच्छाशक्ति और संकल्प से ही बदलेंगी। किन्तु यह इच्छाशक्ति और संकल्प भी शक्ति-सूत्र से ही जुड़े हैं और इस सूत्र को तार-तार करने के लिए ही तो लोग राजनीति के अखाड़े में उतरते हैं।

फिर भी ‘झूठ के होल सेलर’ का लेखक केवल व्यंग्य कर ही अपने कर्तव्य की इतिश्री नहीं मान लेता बल्कि समाधान देने का भी प्रयास करता है। दीपावली के अवसर पर दिये जलाने से पहले दशहरे के अवसर पर पहले अधर्म के प्रतीक के रूप में रावण, कुम्भकरण और मेघनाद के पुतले जलाए जाते हैं। ऐसे ही प्रत्येक धर्म में ऐसी बहुत सी परम्पराएँ हैं यथा– शैतान को पत्थर मारना इत्यादि-इत्यादि। इसी परिपाटी पर व्यंग्य करते हुए लेखक ने क्या ख़ूब कहा है– ‘अपने भीतर के इंसान के गले में तो हर कोई मरता मरता भी अंगूठा दे मारता है पर अपने हाथ में हथियार होने के बाद भी अपने भीतर के शैतान को मारना बड़ा मुश्किल काम है। हे खुदा, कहाँ हो तुम! अपना हथियार वापस ले लो। माफ करना मुझसे यह सब न हो पायेगा ! मैं सब कुछ कर सकता हूँ पर शैतान की हत्या को अपने सर लेने का जुर्म नहीं कर सकता।’ यही है वह वास्तविकता जिसके कारण परिवर्तन घटित नहीं होता। क्या हम परिवर्तन चाहते भी हैं ? व्यक्तिगत सुविधा और स्वार्थ ऐसे तत्व हैं जो समाज को हर असुविधा और अन्याय झेलने पर मजबूर करते हैं। व्यंग्यकार इन्हीं अन्तर्निहित विसंगतियों से जूझने का सार्थक प्रयास कर रहा है।


डॉ. राजेन्द्र वर्मा
संपर्क: “श्यामकला” ग्राम: कठार, 
पत्रालय: बसाल, तहसील व ज़िला सोलन,
हिमाचल प्रदेश- 173213

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