तलाश
उमेन्द्र निराला
बैठता हूँ
जब दूर कहीं,
कि मिले कोई अपना सा,
जिसे बता सकूँ सब कुछ
और जब मिले तो
वह सुने, समझे, बातें मेरी।
और इस बात से भी
मेरी तलाश पूरी हुई।
बैठता हूँ
जब दूर कहीं,
कि मिले कोई अपना सा,
जिसे बता सकूँ सब कुछ
और जब मिले तो
वह सुने, समझे, बातें मेरी।
और इस बात से भी
मेरी तलाश पूरी हुई।