आत्मबोध
उमेन्द्र निराला
अपनों में ही गिराने की आज़माइश है,
यह जानकर सँभलना चाहिए था।
भाग कर आया है जहाँ से,
उसे तो ठहर जाना चाहिए था।
राह में हौसला-शिकन होंगे मगर,
टूटे हुए मन से लड़ना चाहिए था।
परेशान रहा यूँ ही मुसीबतों से,
हक़ीक़त जानकर मुस्कुराना चाहिए था।
इंतज़ार हो जब तुम्हारी हार का,
वहीं से जीत जाना चाहिए था।
जो बदलाव चाहते हैं दूसरों पर,
एक बार ख़ुद को बदलना चाहिए था।