बादल

उमेन्द्र निराला  (अंक: 293, फरवरी प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

हे बादल! 
अब तो बरसो
भू-गर्भ में सुप्त अंकुर
क्षीण अनाशक्त, 
दैन्य-जड़ित अपलक नत-नयन
चेतन मन है, शांत। 
 
नीर प्लावन ला एक बार
देख प्रकोप हृदय थामेगा संसार, 
तेरी हुंकार से ऊषा होगा
क्षत-विक्षत अंकुर का उद्धार। 
 
गिरि का गौरव है, ऊँचा
दिखा तड़ित आघात-आक्रोश, 
नत-मस्तक होगा सिर उसका
शक्ति-प्रभाव से फूट अंकुर वृक्ष होगा। 
 
आतंक-भवन ढहाने को
लाओ उनमें नया उन्माद, 
अर्ध-क्षुधित, निरस्त्र, शोषित-जन
शक्ति का रस भार। 
 
ताप-ऊमस की भीषणता का प्रतिकार
तुझे बुलाता सहमा श्रमिक, 
प्लावन को उत्तेजित कर
नव-जीवन का हो ख़ुशहाल। 

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