सफ़र

शशि महाजन (अंक: 296, मई प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

ऐसी फ़र्स्ट क्लास डब्बे में जैसे ही साधना ने अपना पर्स सीट पर रखा, गाड़ी चल पड़ी, उसने नीचे खड़े युवक को हाथ हिला दिया। 

युवक चुपचाप जाती हुई गाड़ी को देखता रहा। साधना ने कुछ पल बाहर देखा, और फिर सामने बैठी हमउम्र महिला से कहा, “हैलो, मेरा नाम साधना है।”

“जी,” दूसरी महिला ने आगे खिसकते हुए कहा, “मेरा नाम निशि है।”

साधना के चेहरे पर यकायक एक हल्की सी मुस्कुराहट आ गई। 

निशि ने उसे कौतूहल की दृष्टि से देखा और पूछा, “क्या हुआ?”

“कुछ नहीं, मुझे अपने बचपन की सहेली याद आ गई।”

निशि ने साधना को एक पल के लिए ग़ौर से देखा और कहा, “साधना बाबूराम?”

“हाँ!” साधना ने लगभग चिल्लाते हुए कहा, “निशि रामगोपाल?”

“हाँ।” निशि ने पूरा मुँह खोल उल्लासपूर्वक कहा।

फिर तो दोनों सहेलियाँ गले मिलीं और एक ही सीट पर आकर बैठ गईं। 

“मैंने सपने में भी नहीं सोचा था, तुम मुझे इस तरह ट्रैन में मिल जाओगी,” निशि ने कहा।

“मुझे भी विश्वास नहीं हो रहा, कितना सुखद अनुभव है यह,” साधना ने कहा।

“और सुना, ज़िन्दगी कैसी रही, हमारी बचपन की बाक़ी सहेलियाँ कहाँ हैं; राज अमृतराय, सुनीता महादेव?”

इसके बाद दोनों ही हँस दीं, “देख अभी तक सबके पिताजी के नाम भी याद हैं।”

निशि ने कहा, “वही तो सबसे मज़बूत यादें हैं।” 

फिर दोनों सहेलियाँ कौन आजकल किधर है, क्या करता है की बातें करती रहीं। उसमें अध्यापक, शहर की दुकानें, रामलीला, पड़ोसी, भिखारी, कुत्ते, सब की बातें आ गई।

“सच, बहुत अच्छा लग रहा है, ऐसा लग रहा है बहुत दिनों बाद अपनी ज़मीन को छू रही हूँ, कुछ ऐसा जो मेरा है, वहाँ अमेरिका में अपने घर बैठ कर कई बार लगता रहा, जैसे भटक रही हूँ, और यहाँ चलती गाड़ी में तेरे साथ बैठ कर लग रहा है जैसे स्थिरिता फिर से मिल गई है, बीच के पचास साल कितनी तेज़ी से बीत गए,” साधना ने अपने सीने पर हाथ रख मुस्कुराते हुए कहा। 

कुछ पल दोनों शांत रहीं, फिर निशि ने बातचीत की बागडोर अपने हाथ में लेते हुए कहा, “तो तू शादी के बाद अमेरिका रही?”

“अरे नहीं, पहले मुंबई में थी, फिर वहाँ से मेरे हस्बैंड को वर्ल्ड बैंक में नौकरी मिल गई, फिर हम भटकते रहे दुनिया भर, कभी अफ़्रीका, तो कभी ऑस्ट्रेलिया, अब पिछले सात सालों से अमेरिका में हैं, वाशिंगटन डी सी।” 

“अच्छा अब तू बता, क्या किया ज़िन्दगी भर?”

“कुछ ख़ास नहीं, उसी छोटे शहर में रहे ज़िन्दगी भर, मेरे हस्बैंड का अपना बिज़नेस है, मैं रिटायर्ड प्रिंसिपल हूँ। एक बेटा है, एक बेटी है, बेटा हैदराबाद में सॉफ़्टवेयर इंजीनियर है, अभी बेटा हुआ है उसका, वहीं से आ रही हूँ, बेटी कैलिफ़ोर्निया में सॉफ़्टवेयर इंजीनियर है, तलाक़ हो चुका है, फिर से लड़के की तलाश है, कुछ अच्छा नहीं लगता। ज़िन्दगी भर मेहनत और ईमानदारी से जिए, फिर भी ज़िन्दगी ऐसे मोड़ पर आ गई,” थोड़ी देर रुककर निशि ने फिर कहा, “और तुम्हारे बच्चे?”

“बेटा और बेटी। बेटे की पत्नी की कुछ समय हुआ एक्सीडेंट में मौत हो गई, वह अभी उससे उभरा नहीं है, बेटी लिविंग इन में है, एक अमेरिकन के साथ।” 

“तो तुम्हें बहुत फ़िक्र होगी उसकी।” 

“पहले थी, अब छोड़ दी है। बदलते वक़्त को हम बाँध नहीं सकते, और जो उसके साथ बहना चाहते हैं, हम उन्हें रोक नहीं सकते। बेटे की शादी पूरे रीति-रिवाज़ से एक भारतीय लड़की से की थी, क्या हुआ, हम ज़िन्दगी भर भटकते रहे कि अच्छे से सेटल हो सकें, पर कभी पैर कहीं टिके ही नहीं, और यदि टिक भी जाते तो क्या हो जाता, टूट तो यहाँ भी रहा है।” 

थोड़ी देर दोनों चुप अपने ख़्यालों में बैठी रही, मानो ज़िन्दगी का हिसाब लगा रही हों, फिर निशि ने अपने मोबाइल से फोटो निकालते हुआ कहा, “यह देखो मेरी बेटी, आभा।”

“वाह, बहुत प्यारी है। साधना ने मुस्कुराते हुए कहा।

“इसे अपने बेटे से मिला दो, तुझे तो मैं अपनी बेटी आँख बंद करके दे सकती हूँ। अब तुझसे नज़दीक मुझे कौन मिलेगा?”

“ज़रूर।” साधना ने कहा, “मैं अपने बेटे से बात करूँगी।” 

रात हो गई थी, दोनों अपनी-अपनी जगह पर सोने चली गईं। साधना सोच रही थी, बचपन की यह मित्रता आज भी कितनी तरोताज़ा है, जैसे हमारे मन अभी भी बच्चे हों। 

निशि सोच रही थी, साधना तो मेरी अपनी है, अगर दोनों बच्चे मान जाएँ तो हम सब सुखी हो जाएँ। 

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