प्रसादम
डॉ. सुरभि दत्त
509 फ़्लैट में रह रही श्रीमती लहरी ने मणिद्वीप पूजा रखी थी। दो महीने पहले ही फ़्लैट में शिफ़्ट हुए थे। इकलौता बेटा छुट्टी लेकर आया हुआ था। मिलने आने वालों की चहल-पहल थी।
लम्बे समय से रहते हुए आंध्रप्रदेश और तेलंगाना के कुछ पर्वों से, लक्ष्मी पूजा, बतुकम्मा और मंगला गौरी देवी पूजा विधियों से काफ़ी कुछ परिचित हो गई थी। आज पता चला नए घर में गृहप्रवेश पूजा के बाद, घर की सुख-समृद्धि के लिए मणिद्वीप पूजा भी की जाती है। गैंदे, चामंती, गुलाब और जवाकुसुम पुष्पों को समर्पित करते हुए ग्यारह बार सस्वर देवी स्रोत का पाठ किया जाता है। हर पाठ के बाद आरती होती है। आज मणिद्वीप पूजन में सम्मिलित होने का मौक़ा मिला। पाठ का आनंद उठाया और पारम्परिक व्यंजन का प्रसाद भी ग्रहण किया।
घर आकर सुस्ता ही रही थी कि डोर बैल बजी। घड़ी देखी, शाम के चार बजकर दस मिनट हुए थे। इस समय कौन? सोचते हुए दरवाज़ा खोला। देखा, वाचमैन सीनू की पत्नी मंगमा थी सुबह-शाम छोटे बड़े कामों में हाथ बँटा जाती है। बड़ी सहायता मिलती है।
वे लंबाड़ा समुदाय से हैं। इसीलिए कई दिनों तक उसकी तेलुगू समझने में सिर खपाना पड़ा। अब कुछ कुछ समझ पा रही हूँ। हिन्दी बोलने की वो भी कोशिश करती है।
मैंने कहा, “अरे मंगमा इप्पडु! तोंदरगा वोच्च्चिना (अभी! इतनी जल्दी) पांँच भी नहीं बजे!”
उसने कहा, “अम्मा मनम आछा नहीं लागता (मन को अच्छा नहीं लग रहा था)।”
देखा, उसके चेहरे पर उदासी थी।
पूछने पर कि क्या हुआ? मंगमा की आँखों में आँसू भर आए, बोली, “509 अम्मा के इल्लू (घर) उदयम नुनदि (सुबह से) जो काम बोला, मैं भरता (पति) मिल कर किया। नेनु आलोचिमचानु (मैंने सोचा) प्रसादम के लिए बुलाते, नहीं बुलाए।
“मीरू (आप) कुर्चियाँ दिए, उनके घर में रख दो, लोगों के वास्ते। मुझे साहब दरवाज़े के बाहर रखने को बोले। अंदर भी नहीं आन दिए। नक्को-नक्को (नहीं-नहीं) बोले। आज घर में खाना भी नहीं पकाए अम्मा। तीन बजे तक रस्ता देखे। वेट चेसी-चेसी अन्नम बनाया (इंतजार कर-कर के चावल बनाए)।
“अम्मा मीरू (आप) कभी ऐसा नहीं किए। वो अम्मा?”
उसके चेहरे पर तिरस्कृत किए जाने की पीड़ा थी। मेरा मन भी भर आया! शब्द नहीं थे। उसे ढाढ़स भी नहीं बँधा सकी।