पद्मश्री रमेशचन्द्र शाह का कुमाउनी कविता को योगदान
डॉ. पवनेश ठकुराठी
रमेशचन्द्र शाह का जन्म सन् 1937 में वैशाखी त्रयोदशी को अल्मोड़ा, उत्तर प्रदेश में हुआ। इन्होंने राजकीय इंटर कॉलेज अल्मोड़ा से इंटरमीडिएट और प्रयाग विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा पाई। अंग्रेज़ी साहित्य में एमए, पीएचडी की उपाधि पाने के पश्चात श्री शाह ने हमीदिया कॉलेज, भोपाल के अंग्रेज़ी विभाग में सेवाएँ दीं। आप भोपाल में ‘निराला सृजनपीठ’ के निदेशक भी रहे। रमेशचंद्र शाह हिंदी के ऐसे साहित्यकार हैं, जिन्होंने अपनी बहुमुखी रचनाधर्मिता से हिंदी साहित्य को समृद्ध किया है। वे साहित्य के उन गिने-चुने लेखकों में हैं, जिन्होंने साहित्य की हर विधा को अपनी लेखनी से सुशोभित किया हैं।
वे कवि, उपन्यासकार, नाटककार, कहानीकार, निबंधकार और आलोचक आदि कई रूपों में हमारे सामने आते हैं। हिंदी में उनकी तीन दर्जन से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हैं। साहित्य सेवा हेतु इन्हें पद्मश्री और ‘विनायक’ उपन्यास हेतु साहित्य अकादमी पुरस्कार (2014) से सम्मानित किया गया है।
कुमाउनी कवि के रूप में रमेश चंद्र शाह का एक कुमाउनी कविता संग्रह ‘उकाव हुलार’ (1993 ई) शीर्षक से प्रकाशित हैं। इस कविता संग्रह में कुल 45 कविताएँ संगृहीत हैं, जो क्रमशः गिदारि और भैरूपी, निहुणी काल और घर पुजबेर जै कुल तीन खंडों में विभाजित हैं। रमेशचंद्र शाह की कुमाउनी कविताएँ समय की सच्चाई को व्यक्त करती हैं और जीवन के प्रति सकारात्मक चिंतन प्रस्तुत करती हैं। डॉ. शाह अपनी ‘बोलिक बार में’ कविता में अपनी बोली, अपनी मातृभाषा की विशेषता का चित्रण करते हुए लिखते हैं:
“हमर बोलि में द्यो जस द्यो भै
हमर बोलि में ह्यूं जस ह्यूं भै
पालंग लै जां चुपड़ है जां
हमर बोलि उ असल घ्यू भै।”1
इनकी ‘नंदेबिक परसाद’ कविता में मंदिर में बकरियों की बलि देखकर बाल मन पर पड़े प्रभाव का चित्रण किया गया है:
“नंदेबिक थान !
मैं एक्कै बखत गेछीं भितेर
उ लै सैत इजा दगड़
रस्त में नागंण पड़छी
बाकरनै खूनै गाड़
नि जै सकीं फिर वां मैं
दुहर बखत।”2
इनकी ‘भैरूपी’ कविता में कुमाऊँ की उस लोक परंपरा का चित्रण हुआ हैं, जिसमें बहुरूपिया (भैरूपी) वेश बदलकर गाँव-बाज़ार में जाकर लोगों को जीवन की वास्तविकता का ज्ञान कराता है:
“जम्मै कौतिक छन यो घट में
मैसैकि एक्कै ज्यून भै लला
कर ल्हे जे करण छु- मैल कै
बण ल्हे जे बणन छु, तीकणि योई जनम में
दुहर जनम कैल देख राखौ।”3
शाह जी ने अपनी कविताओं में कुमाऊँ अंचल में मदिरा के बढ़ते चलन का भी चित्रण किया है। मदिरा ने यहाँ की महिलाओं के जीवन को भी प्रभावित किया है। शराबी पति के व्यवहार से यहाँ की महिलाएँ दुखी रहती हैं। इसीलिए तो ‘ओ कमला बौज्यू’ कविता में पहाड़ी महिला कहती है:
“जधिन बै ऐ यो सुरा अभाणी
उधिनै बै हैगै सबनै निखाणी।”4
इनकी ‘निहुणी काल’ कविता यह बताती है कि जीवन में सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पक्ष होने ज़रूरी हैं। जब अँधेरा होगा, तभी उजाला होगा। अगर अँधेरा नहीं होगा, तो उजाला भी नहीं होगा। अगर धरती नहीं होगी, तो आकाश भी नहीं होगा। अगर देवता नहीं होंगे, तो आदमी भी नहीं होंगे:
“आग किणी पुज हमूल पैलिक
द्यो लै अघाक द्याप्तै छि यो
मैसा बिजार द्याप्त लै कां ह्वाल ?
द्याप्त नि हो, त मैस लै नि हो !”5
शाह जी की कुछ कविताएँ आशा और विश्वास की कविताएँ हैं। कवि घनघोर अँधेरे में भी रोशनी की किरण देखता है। वह उम्मीद करता है कि हाँ उसके पास भी एक दिन अपना द्वार, अपना दीप होगा:
“एक दिन आल जब
मेर पा लै एक आफुणि देलि होलि
एक दिन आल जब
मेर पा लै एक आफुण दि होल।”6
शाह जी की दार्शनिक कविताओं का भाव अत्यंत गहन और नवीन है। इनकी कुमाउनी कविताओं में आधुनिक भावबोध स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। कवि मानता है कि मनुष्य के भीतर उजाले का होना अत्यंत ज़रूरी है। भीतर धूप होने पर ही मनुष्य को आत्मज्ञान होता है:
“ह्युं किं के नाम पर धरछा?
तुमार भितेर घामै न्हा।
तुम को छा ? ऊ को छु?
तुमुन किं के फामै न्हा।”7
आधुनिक मानव के स्वभाव और उसकी प्रवृत्तियों को आधुनिक कुमाउनी कविता ने बख़ूबी उद्घाटित किया है। शाहजी की कविताओं में भी आधुनिक मानव के खोखलेपन का यथार्थ चित्रण हुआ है। कवि जानते हैं कि आज का इंसान बाहर से चाहे कितना ही दिखावा करे, किन्तु भीतर से वह खोखला होता जा रहा है:
“छन मैसै हम निमैसी गयां
छन द्याप्तै हम रकसी गयां
भ्यार भै देखनेर हमुन कैं को कौल
भितेर-भितेरै कस कपसि गयां।”8
इनकी ‘उकाव-हुलार’ कविता यद्यपि छोटी है, तथापि वह जीवन के रहस्य का उद्घाटन करने में समर्थ है। मनुष्य के जीवन में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। सुख और दुख दोनों का संगम ही जीवन है। कवि कहता है मनुष्य के जीवन में ऐसे भी मोड़ आते हैं, जब उसे आगे बढ़ने का कोई रास्ता नहीं सूझता:
“हाय! यो के भै? कत्थै जां आब
अघिलौक कंई बाटै नि देखीन
पछिल लै उस्सी धुरमंड है रै
छार फोकि रौ, माटै नि देखीन।”9
रमेश चंद्र शाह जी की कविताएँ उदात्त भाव की कविताएँ हैं। इनकी कुमाउनी कविताएँ आधुनिक कुमाउनी कविता की सामर्थ्य की अभिव्यक्ति करती हैं। शाह जी अपनी ‘कच्यारा भितेर बै’ कविता के माध्यम से लोगों से कहते हैं कि मनुष्य को कमल पुष्प की भाँति रहना चाहिए। जिस प्रकार से कमल कीचड़ में खिलता है, किन्तु उसकी दृष्टि सदैव सूर्य की ओर रहती है। इसी प्रकार मनुष्य की चेतना सदैव उर्ध्वमुखी होनी चाहिए:
“दुनि में रौ
जासि पाणि में कमल
कच्यार बटी ठाड़ हैबेर लै
सूरजै देखौ, सूरजै पियौ
कच्यार उज्याण
बिल्कुल नि चौ।”10
रमेशचंद्र शाह मानवतावादी चेतना के कवि हैं। उनके लिए इंसानियत सबसे बड़ी है। इसीलिए तो वे अपनी कविता में मनुष्य से प्रश्न पूछते हैं:
“कधिन पछाणला तुम
आफुणै जसि दुहरै पराणि
कधिन देख्यौल तुमुकिं
दुहरक यो फुड़फुड़ाट?”11
कवि रमेशचंद्र शाह ने आधुनिक कुमाउनी कविता को आधुनिक भाव बोध दिया। उनकी कविताएँ आधुनिक मानव के सत्य को उद्घाटित करने के साथ-साथ उदात्त भावों और मूल्यों का समर्थन करती हैं। शाह निराशा के घुप्प अँधेरे के मध्य भी आशा की किरण को देखने वाले कवि हैं, यही कारण है कि इनकी कविताओं का भाव बोध इन्हें कुमाउनी के अब तक के कवियों से भिन्न बनाता है और उन्हें उदात्त भाव बोध का एक चिंतनशील और आशावादी कवि बनाता है।
संदर्भ:
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उकाव-हुलार, रमेश चंद्र शाह, अल्मोड़ा बुक डिपो, अल्मोड़ा, 1993, पृ. 4
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वही, पृ. 12
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वही, पृ. 22
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वही, पृ. 28
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वही, पृ. 30
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वही, पृ. 35
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वही, पृ. 45
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वही, पृ. 46
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वही, पृ. 47
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वही, पृ. 53
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वही, पृ. 63
—डॉ. पवनेश ठकुराठी,
लोअर माल रोड, तल्ला खोल्टा, अल्मोड़ा,
उत्तराखंड। पिन-263601
ईमेल-drpawanesh@gmail.com